
कल हमने यीशु के प्रार्थनापूर्ण जीवन और उनके पिता के साथ गहरे संबंध को देखा। आज हम उस गुण पर गौर करेंगे जो उस संबंध का सबसे बड़ा प्रमाण है—आज्ञाकारिता।
संसार में ‘आज्ञाकारिता’ को अक्सर मजबूरी या कमजोरी माना जाता है, लेकिन यीशु के जीवन में यह उनकी सबसे बड़ी शक्ति और गरिमा थी। उन्होंने पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए अपनी प्रतिष्ठा और यहाँ तक कि अपने प्राणों को भी तुच्छ समझा।
प्रेरित पौलुस फिलिप्पियों की कलीसिया को मसीह के स्वभाव की वह पराकाष्ठा बताता है जिसने स्वर्ग और पृथ्वी को हिला दिया:
“और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली।” (फिलिप्पियों 2:8)
1. “अपने आप को दीन किया” (The Descent of Humility)
आज्ञाकारिता हमेशा नम्रता की कोख से जन्म लेती है।
- अधिकार का त्याग: यीशु, जो स्वयं परमेश्वर थे, उन्होंने अपनी ईश्वरीय शक्तियों का उपयोग अपनी सुख-सुविधा के लिए नहीं किया। उन्होंने एक ‘दास’ का रूप धारण किया।
- स्वेच्छा से: उन पर किसी ने दबाव नहीं डाला था। उन्होंने पिता के प्रेम और मानव जाति के उद्धार के लिए स्वेच्छा से नीचे उतरने का चुनाव किया।
2. “यहाँ तक आज्ञाकारी रहा” (Obedience to the Utmost)
यीशु की आज्ञाकारिता ‘आंशिक’ (Partial) नहीं थी। उन्होंने तब भी आज्ञा मानी जब रास्ता फूलों का था, और तब भी जब रास्ता काँटों और कीलों का था।
- चरम परीक्षा: गेथसमनी के बगीचे में जब उन्हें पता था कि आगे क्या होने वाला है, तब भी उन्होंने कहा, “मेरी नहीं, तेरी इच्छा पूरी हो।”
- क्रूस की मृत्यु: उस समय क्रूस की मृत्यु सबसे अपमानजनक और दर्दनाक मानी जाती थी। यीशु ने उस अपमान को सहा क्योंकि पिता की आज्ञा यही थी कि जगत का उद्धार इसी मार्ग से होगा।
3. आज्ञाकारिता का परिणाम: महिमा
पौलुस आगे (आयत 9 में) कहता है कि इसी कारण परमेश्वर ने उन्हें अति ऊँचा भी किया।
- स्वर्ग का नियम: जो मसीह में खुद को झुकाता है और आज्ञाकारी रहता है, परमेश्वर उसे ही ऊँचा उठाता है। यीशु की आज्ञाकारिता ने मृत्यु को हरा दिया और हमारे लिए स्वर्ग का द्वार खोल दिया।
4. इसका आपके जीवन के लिए क्या अर्थ है?
- प्रेम का प्रमाण: यीशु ने कहा, “यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे” (यूहन्ना 14:15)। आज्ञाकारिता केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि मसीह के प्रति हमारे प्रेम की अभिव्यक्ति है।
- कठिन समय में वफादारी: आज्ञा मानना तब आसान होता है जब सब कुछ ठीक चल रहा हो। असली परीक्षा तब होती है जब परमेश्वर की इच्छा हमारी अपनी इच्छा के विपरीत होती है। क्या हम तब भी ‘क्रूस’ तक आज्ञाकारी रह सकते हैं?
- सुरक्षा: पिता की आज्ञा के दायरे में रहना ही सबसे सुरक्षित स्थान है। यीशु ने दिखाया कि पूर्ण आज्ञाकारिता ही पूर्ण विजय की ओर ले जाती है।
निष्कर्ष
यीशु मसीह ‘आज्ञाकारी पुत्र’ हैं, इसका अर्थ है कि उन्होंने हमारे लिए वह आज्ञाकारिता पूरी की जो हम कभी नहीं कर सकते थे। आज जब हम आज्ञा मानने में संघर्ष करते हैं, तो हम उनकी सामर्थ्य मांग सकते हैं। याद रखें, आज्ञाकारिता के बिना मसीह का अनुसरण संभव नहीं है।
आज के लिए मनन और प्रार्थना
आज अपने जीवन के उस क्षेत्र के बारे में सोचें जहाँ आपको परमेश्वर की आज्ञा मानना सबसे कठिन लग रहा है। क्या आप आज उस क्षेत्र को उसकी इच्छा के सामने झुकाने के लिए तैयार हैं?
प्रार्थना:
“हे प्रभु यीशु, मैं तेरी उस अद्भुत आज्ञाकारिता के लिए तेरा धन्यवाद करता हूँ जिसने मुझे मौत के फंदे से छुड़ा लिया। प्रभु, मुझे भी वैसा ही हृदय दे जो पिता की इच्छा में आनंद ले सके। मुझे क्षमा कर जब मैं अपनी मनमानी करता हूँ। मुझे सामर्थ्य दे कि मैं छोटी-छोटी बातों में भी तेरे प्रति वफादार रहूँ, चाहे उसकी कीमत कुछ भी क्यों न हो। आमीन।”