दिन 9: पापियों का मित्र—अदभुत अनुग्रह का हाथ

पापियों का मित्र Matthew 11:19

मसीह पर केंद्रित हमारी यात्रा के नौवें दिन में आपका स्वागत है। कल हमने यीशु की नम्रता और उनके कोमल हृदय के बारे में सीखा। आज हम उनके स्वभाव के एक ऐसे पहलू पर गौर करेंगे जिसने उनके समय के धार्मिक नेताओं को हैरान और परेशान कर दिया था, लेकिन हमारे लिए वह ‘अतुलनीय अनुग्रह’ का संदेश है।

यीशु ने खुद को केवल संतों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि वे उन लोगों के बीच पाए गए जिन्हें समाज ‘अछूत’ या ‘त्यागा हुआ’ मानता था।

जब फरीसियों और शास्त्रियों ने यीशु की आलोचना की कि वह किस तरह के लोगों के साथ उठते-बैठते हैं, तो यीशु ने स्वयं के विषय में यह शब्द कहे:

“…मनुष्य का पुत्र खाते-पीते आया, और वे कहते हैं, ‘देखो, पेटू और पियक्कड़ मनुष्य, महसूल लेने वालों और पापियों का मित्र‘।” (मत्ती 11:19)


1. एक “बदनाम” उपाधि (A “Scandalous” Title)

उस समय ‘पापियों का मित्र’ होना कोई सम्मान की बात नहीं थी। यह एक ताना (Insult) था।

  • बहिष्कृत लोग: महसूल लेने वाले (Tax collectors) धोखेबाज माने जाते थे और पापी वे थे जो व्यवस्था का पालन नहीं करते थे।
  • यीशु का चुनाव: जहाँ धार्मिक लोग दूरी बनाए रखते थे, यीशु ने उनके साथ मेज साझा की। वे उनके पास इसलिए नहीं गए कि वे उनके पापों में शामिल हों, बल्कि इसलिए कि वे उन्हें चंगा कर सकें।

2. वह हमें हमारे पापों में नहीं छोड़ता

यीशु का ‘मित्र’ होना केवल सहानुभूति दिखाना नहीं है, बल्कि उद्धार देना है।

  • बीमार और वैद्य: यीशु ने कहा था कि “भले चंगों को वैद्य की आवश्यकता नहीं, परन्तु बीमारों को है।” (मत्ती 9:12)।
  • बदलाव की दोस्ती: जक्कैय (Zacchaeus) और सामरी स्त्री जैसे लोगों से जब यीशु ने दोस्ती की, तो उनका जीवन हमेशा के लिए बदल गया। उनकी दोस्ती हमें स्वीकार करती है, लेकिन हमें वैसा ही नहीं रहने देती।

3. निशर्त प्रेम (Unconditional Love)

यीशु की मित्रता किसी ‘योग्यता’ पर आधारित नहीं है।

  • पहुँच के भीतर: आपको यीशु का मित्र बनने के लिए पहले खुद को ‘साफ’ करने की ज़रूरत नहीं है। आप जैसे हैं वैसे ही उनके पास आ सकते हैं। वे अकेलेपन, शर्म और अपराधबोध के अंधेरे में आपके पास आते हैं।

4. इसका आपके जीवन के लिए क्या अर्थ है?

  1. शर्म से मुक्ति: क्या आप अपने अतीत या अपनी कमियों के कारण परमेश्वर से दूर भाग रहे हैं? याद रखें, आपका उद्धारकर्ता ‘पापियों का मित्र’ है। वह आपसे नफरत नहीं करता, वह आपसे प्रेम करता है।
  2. दूसरों के प्रति नजरिया: यदि यीशु ने पापियों से दोस्ती की, तो हम दूसरों का न्याय करने वाले कौन होते हैं? यह दिन हमें उन लोगों तक पहुँचने की प्रेरणा देता है जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया है।
  3. गहरी संगति: यीशु के साथ आपकी दोस्ती सबसे सुरक्षित रिश्ता है। आप अपनी हर कमजोरी उन्हें बता सकते हैं क्योंकि वे आपको जानते हैं और फिर भी आपसे प्यार करते हैं।

निष्कर्ष

यीशु मसीह ‘पापियों के मित्र’ हैं, इसका मतलब है कि मेरे और आपके लिए आशा है। वे हमारे पास न्याय की तलवार लेकर नहीं, बल्कि मित्रता का हाथ बढ़ाकर आए हैं। आज उनकी इस दोस्ती में गर्व करें और अपनी सारी शर्म को उनके चरणों में छोड़ दें।


आज के लिए मनन और प्रार्थना

आज लूका 15 अध्याय को पढ़ें (खोई हुई भेड़, खोया हुआ सिक्का और उड़ाऊ पुत्र की कहानी)। देखें कि कैसे यीशु एक पापी के पश्चात्ताप करने पर स्वर्ग में उत्सव मनाते हैं।

प्रार्थना:

“हे प्रभु यीशु, मेरा सबसे अच्छा मित्र होने के लिए तेरा धन्यवाद। मैं तेरा आभारी हूँ कि तूने मुझे तब अपनाया जब मैं अपने पापों में खोया हुआ था। प्रभु, मुझे क्षमा कर जब मैं दूसरों का न्याय करता हूँ। मुझे अपना हृदय दे ताकि मैं भी दूसरों के लिए वही प्रेम और करुणा रख सकूँ जो तूने मेरे लिए दिखाई। मेरी कमजोरी में मेरी सामर्थ्य बन। आमीन।”

Leave a Comment

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Scroll to Top