अंधों को दृष्टि देना

दिन 17: अंधों को दृष्टि देना—एक नई पहचान और दृष्टि

अंधों को दृष्टि देना

कल हमने जाना कि कैसे यीशु हमारी बीमारियों और दुर्बलताओं को अपने ऊपर ले लेते हैं। आज हम उनके एक ऐसे चमत्कार पर गौर करेंगे जो न केवल चिकित्सा विज्ञान से परे है, बल्कि यह हमारे जीवन के सबसे बड़े अंधेरे—आत्मिक अंधकार—को दूर करने का प्रतीक है।

यीशु केवल बाहरी आँखों को ठीक करने नहीं आए थे, बल्कि वे हमें वह दृष्टि देने आए थे जिससे हम परमेश्वर के राज्य को देख सकें।

यूहन्ना के सुसमाचार में एक जन्म के अंधे मनुष्य की कहानी है। यीशु ने मिट्टी सानकर उसकी आँखों पर लगाई और उससे एक अनोखी बात कही:

“और उससे कहा, ‘शीलोह के कुण्ड में जाकर धो ले’ (शीलोह का अर्थ है ‘भेजा हुआ’)। सो उसने जाकर धोया, और देखता हुआ लौट आया।” (यूहन्ना 9:7)


1. “जाकर धो ले” (The Act of Obedience)

अंधे व्यक्ति के लिए कुण्ड तक जाना आसान नहीं था, लेकिन चंगाई के लिए आज्ञाकारिता आवश्यक थी।

  • विश्वास का कदम: चंगाई अक्सर तब होती है जब हम मसीह के शब्दों पर विश्वास करके कदम बढ़ाते हैं। उस व्यक्ति ने तर्क नहीं किया, उसने बस आज्ञा मानी।
  • शीलोह (भेजा हुआ): यीशु स्वयं पिता की ओर से ‘भेजे हुए’ हैं। जब हम अपने जीवन की गंदगी को ‘भेजे हुए’ (यीशु) के पास जाकर धोते हैं, तभी हमें असली दृष्टि मिलती है।

2. “देखता हुआ लौट आया” (Restoration)

उसने अपनी पूरी ज़िंदगी अंधेरे में बिताई थी। उसने कभी सूरज की रोशनी या अपनों के चेहरे नहीं देखे थे।

  • असंभव का संभव होना: जन्म के अंधे को ठीक करना मसीह के ईश्वर होने का सबसे बड़ा प्रमाण था।
  • नया संसार: दृष्टि मिलने का अर्थ केवल देखना नहीं था, बल्कि उसके लिए एक पूरी तरह से नया जीवन और नई दुनिया खुल गई थी।

3. आत्मिक दृष्टि बनाम शारीरिक दृष्टि

इस कहानी के अंत में यीशु स्पष्ट करते हैं कि असली अंधापन वह है जब हम सत्य (मसीह) को सामने देखकर भी उसे नहीं पहचानते।

  • सत्य की पहचान: जिस व्यक्ति की आँखें खुलीं, उसने अंततः यीशु को दंडवत किया और कहा, “प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ।”
  • अंधेरे से उजाले में: यीशु हमारी बुद्धि के पर्दों को हटाते हैं ताकि हम समझ सकें कि हम कौन हैं और परमेश्वर हमसे कितना प्रेम करता है।

4. इसका आपके जीवन के लिए क्या अर्थ है?

  1. भ्रम का अंत: क्या आप अपने जीवन के उद्देश्यों को लेकर भ्रमित हैं? यीशु से कहें कि वे आपकी आत्मिक आँखों को खोलें। वह आपको वह ‘विजन’ (Vision) देगा जो दुनिया नहीं देख सकती।
  2. सत्य का सामना: कभी-कभी हम अपने पापों या अपनी परिस्थितियों के प्रति अंधे बने रहते हैं। मसीह की ज्योति हमें वास्तविकता दिखाती है, जो शुरू में कड़वी लग सकती है लेकिन अंततः आज़ाद करती है।
  3. गवाही की सामर्थ्य: उस अंधे व्यक्ति ने विद्वानों से बहस नहीं की, उसने बस इतना कहा, “मैं अंधा था, अब देखता हूँ।” आपके जीवन का बदलाव ही मसीह की सबसे बड़ी गवाही है।

निष्कर्ष

यीशु मसीह ‘दृष्टि देने वाले’ हैं। यदि आज आपको अपना भविष्य धुंधला दिख रहा है या आप आत्मिक रूप से शून्य महसूस कर रहे हैं, तो ‘शीलोह’ (यीशु) के पास आएं। वह आपके जीवन के रंग लौटा देगा। वह आपको केवल रास्ता नहीं दिखाएगा, बल्कि वह आपको वह ‘आँखें’ देगा जिससे आप हर परिस्थिति में परमेश्वर की महिमा देख सकें।


आज के लिए मनन और प्रार्थना

आज यूहन्ना अध्याय 9 को पूरा पढ़ें। विचार करें कि आपकी आत्मिक दृष्टि में कौन सी बाधाएं (डर, शक, संसारिकता) हैं जिन्हें मसीह को हटाना चाहिए।

प्रार्थना:

“हे प्रभु यीशु, तू जगत की ज्योति है और तू ही अंधों को दृष्टि देता है। प्रभु, मेरी आत्मिक आँखों को खोल ताकि मैं तुझे और तेरे सत्य को स्पष्ट देख सकूँ। मेरे मन के हर अंधकार और भ्रम को दूर कर। मुझे वह दृष्टि दे कि मैं संकटों में भी तेरी उपस्थिति को देख सकूँ। जैसे तूने उस अंधे व्यक्ति को चंगा किया, वैसे ही मुझे भी एक नई दृष्टि और नया जीवन दे। आमीन।”

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