आरंभिक कलीसिया Persecution in India

आरंभिक कलीसिया से सीख- विश्वासियों का सताव में डटे 02

आरंभिक कलीसिया से सीख- विश्वासियों का सताव में डटे रहना

विश्वास की परीक्षा (Persecution) में डटे रहना  आरंभिक कलीसिया का महान साहस था। जब वे कठिनाइयों, विरोधों, और उत्पीड़न का सामना कर रहे थे, तब भी उनका विश्वास अडिग और मजबूत बना रहा। उनकी हिम्मत इसी विश्वास से आती थी कि परमेश्वर हर स्थिति में उनके साथ है और उनकी रक्षा करेगा (यूहन्ना 16:33)।

यह साहस उन्हें उनके मिशन को पूरा करने में मदद करता था, चाहे कितनी भी बाधाएँ आएं। प्रेरितों के काम में यह वर्णित है कि उन्होंने प्रेम और विश्वास के साथ विपरीत हालातों में भी प्रचार जारी रखा (प्रेरितों 4:29-31)। आज भी, आरंभिक कलीसिया के इन साहसी विश्वासियों से हमें यह सीखना चाहिए कि कठिनाइयों के बीच भी ईश्वर पर पूर्ण भरोसा बनाए रखना चाहिए। यही विश्वास वास्तविक मसीही जीवन की पहचान है।

आरम्भिक कलीसिया का सताव

बाइबल में नए नियम को पढ़ते हैं तो कलीसिया के इतिहास के विषय में हम प्रेरितों के काम नामक किताब में पढ़ते है। जहाँ पर आरंभिक कलीसिया की शुरुआत के विषय में पढ़ते हैं। इसके साथ हम ये भी पढ़ते हैं की किस तरह से कलीसिया ने सताव का सामना किया था। जब पिंटेकुस्ट के दिन जब पवित्र आत्मा आया था तब से लेकर अब तक कलीसिया को सताया जा रहा हैं। विश्वासियों अपनी जान तक देने के लिए तैयार थे। और उन्होंने ने ऐसा किया भी। 

आरंभिक कलीसिया Persecution
Christian Persecution in Roman Times. Origin: Amsterdam. Date: 1690. Object ID: RP-P-1896-A-19368-832.

उस समय इसराइल के लोग यीशु मसीह के पीछे चलने वालों को इस पंथ के कह कर बोलते थे (प्रेरितों के काम 13:34; 20:35; 22:4; 24:3; 24:14; 27:17) इस पंथ अर्थात जो लोग यीशु मसीह के शिक्षा को मानने वाले हैं। आरंभिक कलीसिया के विश्वासियों को मसीही (Christian) नहीं कहा जाता था। उनको बार अंतकिया नामक जगह में “मसीही” यानी Christian करके पुकारा गया। उससे पहले हम कहीं भी मसीह करके शब्द नहीं मिलता हैं। 

इस तरह की कुछ जानकारी हम तो बाइबिल में मिलती है परंतु इसी के साथ साथ हमको ये भी सीखने को मिलता है कि इस तरह से जब वहाँ के धार्मिक अगवों ने मसीही विश्वासियों को सताया था तब उन्होंने इस तरह से उसका सामना किया।

जैसे ही कलीसिया की शुरुआत हुई उस समय पतरस और युह्नना ने यीशु मसीह के नाम से प्रचार करना प्रारंभ किया और जब वे लोग प्रचार कर रहे थे तब वहाँ के धार्मिक अगुवों ने उनको पकड़कर, वहाँ की धार्मिक सभा यानि अदालत के सामने लेकर गए।

वहाँ पर उनको पकड़कर बहुत डराया गया और उनको ये हिदायत दी गई कि अब से वे लोग यीशु के नाम से प्रचार नहीं करेंगे और ना ही कोई भाषण देंगे परंतु चेलों ने कहा कि तुम्हीं बताओ क्या हम मनुष्य की बातों को परमेश्वर की बातों से बढ़कर माने? (प्रेरितों के काम 4:19-20)

जब वहाँ के अगवों ने इस बात को सुना तो उनको समझ में आया कि लोग नहीं रुकने वाले नहीं हैं। ये उस सताव का या उनके विश्वास की परीक्षा का प्रारंभ था। परंतु हम जब आगे बढ़ते हैं तब हम पाते हैं कि उन्होंने परमेश्वर से इस प्रकार की कोई प्रार्थना नहीं की।

कि परमेश्वर उन लोगों से बदला ले या परमेश्वर उन सब  लोगों को मार डाले बल्कि उन्होंने जाकर इस बात को कहा कि प्रभु हमें सामर्द दे ताकि हम तेरे वचन का प्रचार ही आपके साथ कर सके और उनकी बातों को भी ध्यान में रख जो उन्होंने कहा है (प्रेरितों के काम 4:29-30)

तो यहां से हम इस बात को सीखते हैं कि हमें आरंभिक कलीसिया के समान अपना व्यवहार सताव करने वालों के प्रति प्रार्थना करने वाला होना चाहिए और हमारी प्रार्थना उन पर परेशानी लाने के लिए नहीं बल्कि उनके उद्धार की होनी चाहिए और जिस प्रकार से वे लोग प्रभु के नाम के कारण सताए जाने से आनंदित हुए वैसा ही आनंद हममें भी होना चाहिए कि हम भी इस बात को धन्य समझें कि प्रभु के नाम से हमें सताया जाता है। 

पतरस का जेल में डाला जाना

जब हेरोदेस ने देखा कि याकूब को मरवा देने से वहाँ के यहूदी लोग खुश होते हैं तो उसने पत्रस को भी पकड़कर जेल में डलवा दिया और वह पत्रस को भी मारना चाहता था परन्तु परमेश्वर की पतरस के लिए योजना अलग थी और परमेश्वर ने अपने दूत को भेज कर पतरस को उस जेल से बचाया

परंतु हम 12 अध्याय में पढ़ते हैं कि कलीसिया के बाकी सदस्य पतरस के लिए प्रार्थना में समय बिता रहे थे वो इस बात को लेकर निश्चय थे कि पतरस को भी भी शहादत हासिल होगी जब हम प्रेरितों 12 अध्याय को पढ़ते हैं तो वहां से हम इस बात को समझ सकते हैं कि जब पतरस वहाँ पर आया तो उनको लगा कि वह पतरस का भूत है।

आरंभिक कलीसिया Persecution in India
Oil on canvas painting The Crucifixion of Saint Peter by Caravaggio, 1601 CE.
Cerasi Chapel, Santa Maria del Popolo, Rome

यहाँ से हम इस बात को सीखते हैं कि हमें उन भाई बहनों के लिए जो प्रभु में हैं जिन पर सताव होता है उनके लिए लगातार प्रार्थना करते रहना है हमारी प्रार्थनाएँ उनके साहस को बढ़ाने के लिए होनी चाहिए। अगर वे शहादत को प्राप्त होते हैं तो परमेश्वर उनकी शहादत को अपने राज्य की महिमा के लिए इस्तेमाल करें तो इस प्रकार की प्रार्थनाएं हमको उन भाई बहनों के लिए करनी चाहिए जो सताए जाते हैं।

जब हम प्रेरितों के काम की किताब को पढ़ते हैं तो हमको स्तिफनुस नामक एक व्यक्ति के विषय में पढ़ने को मिलता है। स्तिफनुस नए नियम की कलीसिया का सबसे पहला शहादत को पाने वाला व्यक्ति था। वह 12  प्रेरितों से तो नहीं था परन्तु वह उन 6 चेलों में से था जिनको प्रेरितों ने कलीसिया की सेवकाई के लिए चुना था और जब पवित्रात्मा से परिपूर्ण होकर प्रचार करना प्रारंभ किया।

तब इज़रायल के धार्मिक गुरु और दूसरे लोगों का मन भड़क उठा। उन्होंने अपने दाँत उस पर पीसने शुरू कर दिए वे उस पर उस समय स्तिफनुस ने स्वर्ग की ओर देखा और कहा कि मैं मनुष्य के पुत्र को परमेश्वर के दाहिनी ओर खड़ा हुआ देखता हूँ ।

जब उसने ऐसा कहा तो उन्होंने इस बात को परमेश्वर की निंदा के रूप में लिया और पत्थरों से मार मार के उसको मार दिया और उसकी शहादत में शाऊल भी शामिल था जिसको बाद में पॉलूस करके भी जाना जाता है। तो ये पहली शहादत थी जिसको हम नए नियम में पाते हैं (प्रेरित के काम 7)

पौलुस  का उदाहरण

पौलुस ये वही व्यक्ति हैं जो स्तिफनुस के शहादत में शामिल था और जब पौलुस को परमेश्वर का दर्शन मिला जब उसका मन फिराव  हुआ तो पौलुस भी बहुत सारे सताव  को झेलता है और पौलुस यहाँ तक भी कहता है कि वह मसीह के दागों को अपनी देह में लिए फिरता है।वह सुसमाचार के लिए सताया जाता है परंतु वह कभी भी अपने विश्वास से मना नहीं है। 2 कुरीन्थियों 11 में  पॉलूस के सताव के विषय में पढ़ सकते हैं परन्तु अपने विश्वास में दृढ़ बना रहा

तो यहां से हम इस बात को सीखते हैं कि मसीह के पीछे चलने से सताव का होना तो निश्चित है परंतु हमें अपने विश्वास में दृढ़ बने रहना है पवित्रात्मा हमारी सहायता करता है जिससे कि आजकल बहुत सारे लोग इस बात के खिलाफ हैं उन्हें लगता है कि मसीह के पीछे आना फूलों की सेज है परंतु ऐसा नहीं है मसीह के पीछे चलने का तात्पर्य है कि मृत्यु तक वफादार रहना। परमेश्वर भी प्रकाशित वाक्य में कहता है कि प्राण देने तक वफादार है तो मैं तुझे जीवन का मुकुट दूंगा (प्रकाशित 2:10)

इतना ही नहीं प्रेरित की किताब हमें एक और चीज सिखाती है कि जैसे जैसे साताव बढ़ रहा था, कलीसिया के विश्वास को सताया जा रहा था वैसे वैसे ही किताब का लिखने वाला लूका हमें यह भी बताता है कि परमेश्वर का वचन भी फैलता चला गया उन पदों को आप नीचे पढ़ सकते हैं

जहां पर लुका इन बातों को बताते हैं कि किस तरह से परमेश्वर का वचन बढ़ता चला गया और कलीसिया बढ़ती चली गई तो जितना ज्यादा कलीसिया को दबाया गया जितना ज्यादा विश्वास को दबाया गया विश्वासी और कलीसिया उतने ही ज्यादा मजबूत हुए उतने ही ज्यादा वे बढ़े (प्रेरितों के काम 6:7; 9:31; 12:24; 16:5; 19:20; 28:31)

तो आरंभिक कलीसिया से हम इस बात को सीख सकते हैं कि विश्वास में बने रहना बहुत महत्वपूर्ण है और ये आसान कार्य नहीं हैं बिना पवित्रात्मा की सामर्थ्य से बिना परमेश्वर के साथ समय बिताए, बिना परमेश्वर के वचन को पढ़े। हम कभी भी परमेश्वर के विश्वास में स्थिर नहीं रह सकते हैं आरंभिक कलीसिया हमें ये सिखाती है कि किस प्रकार से हमारा मसीही जीवन या मसीह में हमारा चाल चलन होना चाहिए और हमें किन चीजों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए

ये आसान नहीं है परन्तु मुश्किल भी नहीं है विश्वासों की संगति, प्रभु-भोज, प्रार्थना और वचन की शिक्षा ये चीज़ें ही हैं जो हमको विश्वास में दृढ़ बने रहने में सहायता करती हैं और आरंभिक कलीसिया के विश्वासी भाई बहन इसी कार्य को करने में लगातार बने रहते थे।यहां तक कि लिखा है वे लौलीन  रहते थे (प्रेरित के काम 2:42)

सारांश 

इसके अलावा जब हम कलिसिया के इतिहास को पढ़ते हैं तो उसमें भी हम पाते हैं कि मसीही लोगों को जिन्होंने नया जन्म पाया था या जिनका उद्धार हुआ था उनको भी बहुत सताया गया। प्रभु के चेलों को शहादत हासिल हुई सिर्फ यहूदा इस्क्रियोटी  को छोड़कर जिसने आत्महत्या की थी। बाकी सभी चेले को शहीद कर दिया गया और उनके द्वारा जो चेले बने कुछ को जिंदा जला दिया गया कुछ को शेरों के सामने फेंक दिया गया। कुछ को घात कर दिया गया 

तो इस प्रकार से जो है आरंभिक कलीसिया की शुरुआत है आज जिस तरह से कलीसिया की शुरुआत हुई थी वैसा हमें देखने को नहीं मिलता। आज के ईसाई लोग चाहते हैं कि उनको शारीरिक सुख मिले बल्कि ना कि परमेश्वर के राज्य की बढ़ोतरी के लिए। आरंभिक कलीसिया का एक ही उद्देश्य था कि प्रभु का राज्य बढ़े और उसके लिए अपना जीवन तक देने के लिए तैयार थे तो आज हमारे लिए सवाल उठता है कि क्या मैं जब खुद को परमेश्वर का जन या प्रभु का पीछे चलने वाला कहता हूं। तो क्या मैं उसके लिए अपने प्राण दे सकता हूँ? क्या मैं अपनी जान परमेश्वर के नाम के लिए उसके राज्य की बढ़ोतरी के लिए देने के लिए तैयार हूं?

भारत में ईसाई उत्पीड़न(2025) (Persecution in India 2025)

परिचय

भारत में ईसाई (Persecution in India) समुदाय, जो लगभग 2.3% आबादी (करीब 3 करोड़) का प्रतिनिधित्व करता है, धार्मिक कट्टरपंथ, एंटी-कन्वर्जन कानूनों और हिंदुत्व विचारधारा के कारण बढ़ते उत्पीड़न का शिकार हो रहा है। 2025 में, यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम (UCF) के अनुसार, जनवरी से सितंबर तक 579 घटनाएं दर्ज की गईं, जो औसतन दो हमलों प्रतिदिन के बराबर है। यह 2024 की 834 घटनाओं से थोड़ा कम है, लेकिन प्रवृत्ति चिंताजनक बनी हुई है।

इवैंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया (EFI) ने जनवरी-जुलाई में 334 व्यवस्थित उत्पीड़न की घटनाएं नोट कीं। ओपन डोर्स वर्ल्ड वॉच लिस्ट 2025 में भारत को 11वें स्थान पर रखा गया, जहां हिंसा स्कोर 16.5/16.7 है।यह रिपोर्ट UCF, EFI, ओपन डोर्स और पर्सीक्यूशन रिलीफ के डेटा पर आधारित है। फोकस घटनाओं पर है, जिसमें शारीरिक हमले, गिरफ्तारियां, पूजा स्थलों पर तोड़फोड़, हेट स्पीच और सामाजिक बहिष्कार शामिल हैं। कुल अनुमानित घटनाएं पूरे वर्ष के लिए 750-800 हो सकती हैं, क्योंकि अक्टूबर-दिसंबर के डेटा अभी पूर्ण नहीं हैं।

राष्ट्रीय अवलोकन (Persecution in India, National Observation)

  • कुल घटनाएं: जनवरी-सितंबर 2025 में 579 (UCF)। इनमें 20 ईसाइयों की हत्या, 459 चर्चों/ईसाई भवनों पर हमले, 10,000 से अधिक शारीरिक/मानसिक उत्पीड़न के मामले, और 9,251 आंतरिक विस्थापन शामिल हैं।
  • प्रकार:
    • झूठे धर्मांतरण आरोपों पर गिरफ्तारियां: 116 (EFI)।
    • शारीरिक हिंसा: 42 (EFI), जिसमें महिलाओं पर 36 मामले।
    • पूजा बाधित: 29 (EFI)।
    • दफन अधिकारों से वंचन: 13 (92% छत्तीसगढ़ में)।

  • ट्रेंड: बीजेपी शासित राज्यों (उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश) में 60% से अधिक घटनाएं। 11 राज्यों में एंटी-कन्वर्जन कानून सक्रिय, जो उत्पीड़न को बढ़ावा देते हैं। मणिपुर में जातीय हिंसा (मई 2023 से जारी) में 200+ चर्च जलाए गए। 2014-2024 में 500% वृद्धि।
  • प्रभाव: केवल 7-10% मामलों में एफआईआर दर्ज, न्यायिक देरी। महिलाएं, आदिवासी और दलित ईसाई अधिक प्रभावित।

राज्यवार आंकड़े

नीचे जनवरी-अप्रैल 2025 के UCF डेटा के आधार पर 19 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 245 घटनाओं का राज्यवार विवरण दिया गया है। EFI के जनवरी-जुलाई डेटा से शीर्ष राज्यों को अपडेट किया गया है (कुल 334)। अन्य राज्यों में कम घटनाएं मानी गई हैं। पूर्ण वर्ष अनुमानित आंकड़े (579 के आधार पर स्केल्ड) ब्रैकेट में हैं।

राज्य/केंद्र शासित प्रदेशजनवरी–अप्रैल घटनाएं (UCF)जनवरी–जुलाई (EFI, जहां उपलब्ध)अनुमानित पूर्ण वर्ष (2025)
उत्तर प्रदेश5095150
छत्तीसगढ़4686140
कर्नाटक221750
राजस्थान181540
झारखंड17–35
बिहार161735
आंध्र प्रदेश14–30
मध्य प्रदेश142240
हरियाणा121530
पश्चिम बंगाल11–25
गुजरात8–20
महाराष्ट्र6–15
पंजाब6–15
हिमाचल प्रदेश3–8
ओडिशा2–5
उत्तराखंड2–5
दिल्ली1–3
तमिलनाडु1–3
तेलंगाना1–3
असम0–5
मणिपुर0– (जातीय हिंसा जारी)20
अन्य (केरल, गोवा आदि)0–10

नोट: 22 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में प्रभावित, लेकिन पूर्ण सूची सीमित डेटा के कारण। उत्तर प्रदेश में 60% मामले झूठे कन्वर्जन आरोपों से, छत्तीसगढ़ में दफन अधिकारों का उल्लंघन प्रमुख।

ग्राफ 

Persecution in India 2025

नीचे शीर्ष 10 राज्यों में जनवरी-अप्रैल 2025 की घटनाओं को दर्शाने वाला बार चार्ट दिया गया है। यह वितरण को स्पष्ट करता है।

यह चार्ट उत्तर भारत और मध्य भारत में केंद्रित उत्पीड़न को हाइलाइट करता है।

विश्लेषण और प्रमुख निष्कर्ष

  • कारण: हिंदुत्व कट्टरपंथी समूह (आरएसएस, बजरंग दल) द्वारा प्रचार, एंटी-कन्वर्जन कानून (उत्तर प्रदेश में आजीवन कारावास), और पुलिस निष्क्रियता। मणिपुर जैसी जातीय संघर्ष ईसाइयों (कुकी समुदाय) को निशाना बनाते हैं।
  • प्रभाव: सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक हानि, और मनोवैज्ञानिक आघात। 2025 में 500% दशकीय वृद्धि जारी, USCIRF ने भारत को “विशेष चिंता का देश” घोषित किया।
  • सिफारिशें: सरकार को कानूनों की समीक्षा, हेल्पलाइन मजबूत करना, और अंतरराष्ट्रीय निगरानी स्वीकार करनी चाहिए। चर्च समुदायों को जागरूकता और कानूनी सहायता बढ़ानी चाहिए।

स्रोत

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

On Key

Related Posts

दिन 24: शैतान का छद्म रूप – ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप 2 Corinthians 11:14 (Angel of Light)

दिन 24: शैतान का छद्म रूप – ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप 2 Corinthians 11:14 (Angel of Light)

मुख्य पाठ (Key Scriptures): 2 कुरिन्थियों 2 Corinthians 11:14 11:14-15, मत्ती 7:15, 1 यूहन्ना 4:1 मुख्य विषय: आत्मिक धोखेबाजी, भटकाने वाली शक्तियाँ और आत्मिक विवेक

2 Peter 2:4 (The Fate of Fallen Angels) 2 पतरस 2:4, गिराए गए स्वर्गदूत, Fallen Angels in Bible, Girae gaye Swargdoot, Jude 1:6 Hindi, दिन 23 देवोशनल हिन्दी

दिन 23: गिराए गए स्वर्गदूत – जिन्होंने अपना पद छोड़ दिया | 2 Peter 2:4 (The Fate of Fallen Angels)

मुख्य पाठ (Key Scriptures): 2 पतरस 2:4, यहूदा 1:6, मत्ती 25:41 मुख्य विषय: ईश्वरीय न्याय की पवित्रता, विद्रोह का गंभीर परिणाम और स्वर्गदूतों की जवाबदेही

Revelation 12:7-9 प्रकाशितवाक्य 12:7-9, स्वर्ग में युद्ध, War in Heaven Hindi, Michael and the Dragon, Shaitan ka Patan, दिन 22 देवोशनल हिन्दी

दिन 22: स्वर्ग में युद्ध – मीकाएल और अजगर का युद्ध | Revelation 12:7-9 (The War in Heaven)

मुख्य पाठ (Key Scriptures): प्रकाशितवाक्य Revelation 12:7-9, दानिय्येल 10:13, यहूदा 1:9 मुख्य विषय: ब्रह्मांडीय संघर्ष, शैतान का पतन और ईश्वरीय सामर्थ्य की विजय स्वर्गदूतों के

1 पतरस 1:12, स्वर्गदूतों की उत्सुकता, Desiring to Look Into in Hindi, Angels and Salvation Hindi, 1 Peter 1:12 Hindi, दिन 21 देवोशनल हिन्दी

दिन 21: वे हमारे उद्धार को गहराई से देखते हैं – स्वर्गदूतों की उत्सुकता | 1 पतरस 1:12 1 Peter 1:12 (Angels and Salvation)

मुख्य पाठ (Key Scriptures): 1 पतरस 1:12, इफिसियों 3:10, लूका 15:7 मुख्य विषय: स्वर्गदूतों का विस्मय, ईश्वरीय अनुग्रह का अद्वितिय रहस्य और मसीह में मनुष्य

1 कुरिन्थियों 6:3, स्वर्गदूतों का न्याय, Christian Authority in Hindi, Believers Judge Angels, 1 Corinthians 6:3 Hindi, दिन 20 देवोशनल हिन्दी

दिन 20: स्वर्गदूतों का न्याय करना – मसीहियों का भविष्य का अधिकार | 1 कुरिन्थियों 6:3

मुख्य पाठ (Key Scriptures): 1 कुरिन्थियों 6:3, यहूदा 1:6, प्रकाशितवाक्य 20:4 मुख्य विषय: विश्वासियों का स्वर्गीय पद, न्याय का अधिकार और मसीह के साथ सह-उत्तराधिकारी