स्वयं-पर्याप्तता Self-Sufficiency: परमेश्वर की पूर्णता और हमारा अस्तित्व

अक्सर मानवीय दृष्टिकोण से सोचते हुए हमें लगता है कि परमेश्वर ने हमें इसलिए बनाया क्योंकि वह “अकेला” महसूस कर रहा था या उसे किसी की संगति की कमी महसूस हो रही थी। लेकिन प्रेरितों के काम 17:25 इस मानवीय धारणा को पूरी तरह से उलट देता है और परमेश्वर की स्वयं-पर्याप्तता (Self-Sufficiency) का एक भव्य चित्र प्रस्तुत करता है:

“और न वह किसी वस्तु की आवश्यकता के कारण मनुष्यों के हाथों की सेवा लेता है, क्योंकि वह तो स्वयं ही सबको जीवन और सांस और सब कुछ देता है।” (प्रेरितों 17:25)


1. परमेश्वर का ‘अकेलापन’ एक कहानी है

परमेश्वर कभी अकेला नहीं था। मसीही धर्मशास्त्र (Theology) के अनुसार, सृष्टि से पहले भी परमेश्वर त्रिएकत्व (Trinity) में पूर्ण संगति में था। पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा अनादि काल से एक-दूसरे के साथ पूर्ण प्रेम, आनंद और महिमा का आदान-प्रदान कर रहे थे।

  • परमेश्वर को अपनी भावनाओं को साझा करने के लिए किसी “दर्शक” की आवश्यकता नहीं थी।
  • वह स्वयं में ही एक पूर्ण ‘समुदाय’ है।

इसलिए, जब उसने हमें बनाया, तो वह अपनी किसी कमी को “भरने” के लिए नहीं, बल्कि अपनी पूर्णता को “उड़ेलने” के लिए बनाया।

2. वह सेवा नहीं लेता, बल्कि सेवा देता है

प्रेरितों के काम 17:25 स्पष्ट करता है कि परमेश्वर किसी वस्तु की आवश्यकता के कारण मनुष्यों के हाथों की सेवा नहीं लेता।

  • सेवा का अर्थ: हम अक्सर सोचते हैं कि हम परमेश्वर के लिए कुछ “कर” रहे हैं (जैसे प्रचार, आराधना, या दान)। लेकिन वास्तव में, परमेश्वर हमें वह सामर्थ्य, सांस और संसाधन देता है जिससे हम उसकी सेवा कर सकें।
  • स्रोत बनाम प्राप्तकर्ता: हम केवल प्राप्तकर्ता हैं; वह एकमात्र स्रोत है। जिस तरह एक सूर्य को अपनी रोशनी चमकाने के लिए दीये की ज़रूरत नहीं होती, उसी तरह परमेश्वर को अपनी महिमा प्रकट करने के लिए हमारे ‘सहयोग’ की आवश्यकता नहीं है।

3. “अपनी महिमा के लिए” बनाने का अर्थ

यदि उसे हमारी ज़रूरत नहीं थी, तो उसने हमें क्यों बनाया? इसका उत्तर है: अपनी महिमा के प्रदर्शन के लिए।

इसे एक कलाकार के उदाहरण से समझें। एक कुशल चित्रकार इसलिए चित्र नहीं बनाता क्योंकि वह ब्रश या रंगों का ‘कर्जदार’ है, बल्कि इसलिए बनाता है ताकि उसकी कलात्मकता, उसका कौशल और उसकी सुंदरता प्रकट हो सके।

  • महिमा का आनंद: परमेश्वर ने हमें इसलिए बनाया ताकि हम उसकी महिमा को देखें, उसका आनंद लें और उसे प्रतिबिंबित करें।
  • अनुग्रह का अतिप्रवाह: हमारी सृष्टि उसकी “ज़रूरत” का परिणाम नहीं, बल्कि उसके “अनुग्रह” का अतिप्रवाह (Overflow) है। वह इतना आनंदित और महिमामय परमेश्वर है कि उसने चाहा कि अन्य प्राणी भी उस आनंद में सहभागी हों।

हमारे जीवन के लिए इसका गहरा अर्थ

जब हम यह समझते हैं कि परमेश्वर स्वयं-पर्याप्त है, तो हमारा विश्वास “धार्मिक प्रदर्शन” से बदलकर “सच्ची आराधना” में बदल जाता है:

  1. स्वतंत्रता: हमें परमेश्वर को “खुश रखने” के दबाव में नहीं जीना है जैसे कि वह हमारे बिना अधूरा हो। हम स्वतंत्र होकर उसकी महिमा का आनंद ले सकते हैं।
  2. सुरक्षा: यदि परमेश्वर को हमारी ज़रूरत होती, तो वह हमारी कमज़ोरियों के कारण असुरक्षित हो जाता। लेकिन क्योंकि वह स्वयं-पर्याप्त है, वह हमारी विफलताओं के बावजूद अडिग रहता है।
  3. उद्देश्य: हमारा जीवन उद्देश्यहीन नहीं है। हमारा मुख्य उद्देश्य “परमेश्वर की महिमा करना और सदा उसका आनंद लेना” है।

आज के लिए मनन और प्रार्थना

क्या आप परमेश्वर की सेवा यह सोचकर कर रहे हैं कि आप उस पर कोई अहसान कर रहे हैं? या आप इस बात से चकित हैं कि इतने महान और पूर्ण परमेश्वर ने आपको अपनी महिमा का हिस्सा बनने का अवसर दिया?

प्रार्थना:

“हे सर्व-पर्याप्त परमेश्वर, मैं तेरे सामने झुकता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि तू मेरा कर्जदार नहीं है, बल्कि मैं अपनी हर सांस के लिए तेरा ऋणी हूँ। धन्यवाद कि तूने मुझे अकेलेपन के कारण नहीं, बल्कि अपने असीम प्रेम और महिमा के कारण बनाया। मुझे सिखा कि मैं अपनी सेवा को एक बोझ नहीं, बल्कि तेरी महानता में सहभागी होने का एक सौभाग्य समझूँ। यीशु के नाम में, आमीन।”

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