जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता: परमेश्वर को जानना (Knowing God: The Ultimate Necessity of Life)

परमेश्वर को जानना Knowing God – परिचय

knowing God

इस क्षणभंगुर संसार में, जहाँ हर पल परिवर्तन और अनिश्चितता है, मनुष्य जन्म से ही एक अंतहीन खोज में लगा रहता है। हमारी ऊर्जा, हमारा समय और हमारे संसाधन किसी न किसी ऐसी चीज़ को बटोरने में व्यतीत होते हैं, जिसके बारे में हमें यह भ्रम होता है कि वह हमें ‘संपूर्ण’ (Complete) या ‘संतुष्ट’ (Satisfied) कर देगी। कोई व्यक्ति सफलता की चकाचौंध, अकादमिक उत्कृष्टता या पेशेवर सिद्धि की खोज में है; कोई आंतरिक शांति और मानसिक स्थिरता के पीछे भाग रहा है; तो कोई निस्वार्थ और अटूट प्रेम के बंधन को खोजने की लालसा रखता है। हम अपनी तिजोरियों को धन से, अपने दिमागों को ज्ञान से, और अपने जीवन को अनुभवों से भरने में लगे रहते हैं।

लेकिन इस आपाधापी में, क्या हम कभी रुककर यह विचार करते हैं कि इस नश्वर जीवन की सबसे बुनियादी, सबसे मूलभूत और सबसे निर्णायक आवश्यकता क्या है? वह कौन सी नींव है जिस पर यदि हमारा जीवन टिका हो, तो मृत्यु और अनंतकाल दोनों में हमें सुरक्षा मिल सके?

पुराने नियम का भविष्यवक्ता यिर्मयाह इस प्रश्न का उत्तर एक ऐसे क्रांतिकारी सत्य में प्रकट करता है, जो मानवीय अहंकार और सांसारिक प्राथमिकताओं को चुनौती देता है। परमेश्वर का शाश्वत वचन हमारी सभी खोजों का सार बताते हुए घोषणा करता है:

“यहोवा यों कहता है, ‘बुद्धिमान अपनी बुद्धि पर घमण्ड न करे, न शूरवीर अपनी शक्ति पर, न धनी अपने धन पर घमण्ड करे; परन्तु जो घमण्ड करे वह इसी बात पर घमण्ड करे कि वह मुझे समझता और जानता है कि मैं ही वह यहोवा हूँ जो पृथ्वी पर करुणा, न्याय और धर्म के काम करता है; क्योंकि मैं इन्हीं बातों से प्रसन्न रहता हूँ,’ यहोवा की यही वाणी है।” (यरमियाह 9:23-24)

यह वचन स्पष्ट रूप से घोषणा करता है कि ज्ञान, शक्ति, और धन—जिन पर पूरी मानव सभ्यता आधारित है—वे सब परमेश्वर को जानने की तुलना में तुच्छ हैं।

1. सांसारिक गौरव की सीमा: तीन अस्थायी आधार

यरमियाह के समय का समाज भी आज के आधुनिक युग से भिन्न नहीं था। लोग उन्हीं तीन ‘अस्थायी स्तम्भों’ के पीछे भाग रहे थे, जिन्हें आज भी दुनिया सबसे बड़ी उपलब्धि मानती है: 

क. बुद्धि (ज्ञान), शक्ति, और धन।क. बुद्धि (Wisdom/Knowledge):

आधुनिक युग सूचना का युग है। ज्ञान हमारे लिए एक नया देवता बन गया है। हम डिग्रियां हासिल करते हैं, जटिल क्षेत्रों में विशेषज्ञता प्राप्त करते हैं, और अपनी तार्किक क्षमता (Reasoning) पर गर्व करते हैं। हम समझते हैं कि हमारे पास हर समस्या का एल्गोरिदम (Algorithm) है।

सीमा: मानवीय बुद्धि हमें जीवन की समस्याओं का हल दे सकती है, व्यापार में सफलता दिला सकती है, और यहाँ तक कि विज्ञान के रहस्यों को भी खोल सकती है। लेकिन, यह हमें मृत्यु के बाद के जीवन का कोई उत्तर नहीं दे सकती। यह हमें इस बात की गारंटी नहीं दे सकती कि हमारी बुद्धिमत्ता हमें सच्चे अर्थ और उद्देश्य तक ले जाएगी। परमेश्वर के सामने, हमारी सबसे बड़ी ज्ञान की उपलब्धि भी धूल मात्र है।

ख. शक्ति (Strength/Power):

यह शक्ति शारीरिक बल (Physical Prowess) हो सकती है, किसी राष्ट्र या संगठन पर राजनीतिक प्रभाव हो सकता है, या समाज में प्राप्त उच्च पद और प्रभुत्व हो सकता है। लोग शक्ति के पीछे इसलिए भागते हैं क्योंकि यह उन्हें नियंत्रण (Control) का भ्रम देती है।

सीमा: इतिहास के पन्ने इस बात के गवाह हैं कि बड़े-बड़े साम्राज्य, जो अपनी अदम्य शक्ति पर गर्व करते थे, वे धूल में मिल गए। सबसे शक्तिशाली शूरवीर और सबसे प्रभावशाली शासक भी समय की मार के आगे घुटने टेक गए और मृत्यु के सामने असहाय हो गए। परमेश्वर की सर्वशक्तिमानता के सामने, मनुष्य की शक्ति एक क्षणभंगुर मोमबत्ती की लौ से अधिक कुछ नहीं है।

ग. धन (Riches/Wealth):

धन हमें सुविधाएं दे सकता है। यह हमारे जीवन को आरामदायक बना सकता है और हमें बहुत से विकल्पों तक पहुँच प्रदान कर सकता है। यह दुनिया की नजरों में हमें सफल और सुरक्षित बनाता है।

सीमा: धन हमें सुविधाएँ तो देता है, लेकिन यह संतुष्टि नहीं दे सकता। यह हमारे जीवन को आरामदायक बना सकता है, लेकिन इसे अर्थपूर्ण (Meaningful) नहीं बना सकता। धन सबसे बड़ी सुरक्षा का भ्रम पैदा करता है, लेकिन यह हमारे स्वास्थ्य, हमारे प्रियजनों को या हमारी आत्मा को मृत्यु से नहीं बचा सकता।

परमेश्वर का संदेश स्पष्ट है: इन अस्थायी चीजों पर “घमंड” करना व्यर्थ है। ये हमें उस स्थायी उद्देश्य (Eternal Purpose) तक नहीं ले जा सकतीं, जिसके लिए हमें बनाया गया था।

2. परमेश्वर को “जानना” बनाम परमेश्वर के “बारे में जानना” | Knowing God vs Know about God

परमेश्वर कहते हैं कि यदि घमंड करना ही है, तो वह इस बात पर हो कि तुम मुझे “समझते और जानते” हो। बाइबल में ‘जानने’ (Hebrew: Yada) शब्द का अर्थ केवल बौद्धिक जानकारी (Head Knowledge) प्राप्त करना नहीं है, जैसा कि हम किसी ऐतिहासिक व्यक्ति या सिद्धांत के बारे में जानते हैं। यह ज्ञान एक गहरा, व्यक्तिगत, अंतरंग और अनुभवजन्य संबंध (Intimacy and Personal Relationship) है।

परमेश्वर को जानने का अर्थ है:

  • उसकी प्रकृति को पहचानना (Recognizing His Nature): यह जानना कि वह सर्वशक्तिमान, पवित्र और न्यायकारी है, लेकिन साथ ही वह दयालु, प्रेममय और हमारा ‘अब्बा’ पिता भी है। यह केवल उसकी शक्ति को नहीं, बल्कि उसके हृदय को जानना है।
  • उसके कार्यों को देखना और समझना (Discerning His Works): यह समझना कि वह पृथ्वी पर करुणा (Love), न्याय (Justice) और धर्म (Righteousness) के काम करता है। यह देखना कि उसका हाथ इतिहास, हमारे व्यक्तिगत जीवन और ब्रह्मांड के हर पहलू में सक्रिय है।
  • उसकी इच्छा के प्रति समर्पित होना (Submitting to His Will): जब हम उसे वास्तव में जानते हैं, तो हमारी प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। हमारी इच्छाएँ उसकी इच्छा के अनुरूप हो जाती हैं। हमारा जीवन अब हमारे गौरव के लिए नहीं, बल्कि उसके गौरव के लिए जीना शुरू हो जाता है।

ठीक उसी तरह जैसे एक बच्चा अपने पिता को जानता है—सिर्फ उसका नाम, पेशा या चेहरा नहीं, बल्कि उसका स्वभाव, उसकी आवाज की सुरक्षा और उसकी गोद का स्नेह—वैसे ही हमें परमेश्वर को जानना है। यह ज्ञान परिवर्तनकारी और जीवन-देने वाला है।

3. परमेश्वर का स्वभाव: करुणा, न्याय और धर्म

यरमियाह 9:24 परमेश्वर के चरित्र के तीन स्तंभों को उजागर करता है, जिन्हें जानना ही हमारे जीवन का आधार होना चाहिए। ये तीनों गुण एक पूर्ण और संतुलित ईश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं:

क. करुणा (Steadfast Love/Chesed):

बाइबिल में ‘करुणा’ के लिए इस्तेमाल किया गया हिब्रू शब्द ‘चेसेद’ (Chesed) है। यह ऐसा प्रेम है जो सिर्फ भावना नहीं, बल्कि एक अटल, वफादार और वाचा-आधारित प्रतिबद्धता है। यह वह प्रेम है जो कभी खत्म नहीं होता, जो हमारी असफलताओं, गलतियों और विश्वासघात के बावजूद हमें नहीं छोड़ता। मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता यह जानना है कि उसे एक ऐसे ईश्वर द्वारा प्रेम किया गया है जो शाश्वत और अपरिवर्तनीय है। यह करुणा ही है जो हमें भय से मुक्ति दिलाती है।

ख. न्याय (Justice/Mishpat):

इस अराजक, अन्यायपूर्ण और टूटी हुई दुनिया में, यह जानना एक बड़ा सुकून देता है कि परमेश्वर न्यायकारी है। न्याय (Mishpat) केवल सजा देना नहीं है, बल्कि चीजों को ‘सही’ जगह पर लाना है। वह कमजोरों की परवाह करता है, सताए गए लोगों की ओर ध्यान देता है, और अंततः, वह सब कुछ ठीक करेगा। यह न्याय हमें एक ऐसा नैतिक ढाँचा प्रदान करता है जिसमें हम सुरक्षित महसूस कर सकते हैं।

ग. धर्म (Righteousness/Tzedakah):

परमेश्वर पूरी तरह से पवित्र, खरा और सही है। धर्म (Tzedakah) का अर्थ है नैतिक पूर्णता। उसे जानने का अर्थ है केवल उसकी प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उसके जैसा बनने की इच्छा रखना। जब हम उसके धर्म को देखते हैं, तो हम अपनी अपूर्णताओं को पहचानते हैं और उसकी ओर खिंचे चले आते हैं ताकि हम उसकी पवित्रता में सहभागी हो सकें।

जब हम इन गुणों को समझते हैं, तो हमारा दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल जाता है। हम अपनी योग्यता में नहीं, बल्कि उसके भरोसे में जीते हैं।

4. यह जीवन की सबसे बड़ी और अनिवार्य आवश्यकता क्यों है?

यीशु मसीह ने स्वयं इस बात की पुष्टि करते हुए कहा:

“अनन्त जीवन यह है कि वे तुझे—एकमात्र सच्चे परमेश्वर को—और यीशु मसीह को जिसे तूने भेजा है, जानें।” (यूहन्ना 17:3)

यहाँ एक महत्वपूर्ण भेद है: अनन्त जीवन केवल मृत्यु के बाद शुरू होने वाली कोई चीज़ नहीं है; यह उस क्षण शुरू होता है जब आप अपने सृष्टिकर्ता को व्यक्तिगत रूप से जानना शुरू करते हैं।

  • पहचान की नींव (Foundation of Identity): परमेश्वर को जाने बिना, मनुष्य की आत्मा भूखी रहती है। आप दुनिया की सारी सुख-सुविधाएं और उपलब्धियां पा सकते हैं, लेकिन यदि आप उस परमेश्वर को नहीं जानते जिसने आपको बनाया है, तो आप इस दुनिया में एक अजनबी की तरह भटकते रहेंगे, अपनी पहचान और उद्देश्य से अनभिज्ञ।
  • संतुष्टि का स्रोत (Source of Fulfillment): केवल परमेश्वर को जानने से ही वह रिक्त स्थान भरता है जिसे दुनिया की कोई भी वस्तु या रिश्ता नहीं भर सकता। परमेश्वर को जानना हमारी स्थायी सुरक्षा है, हमारी अटल पहचान है, और हमारा अविनाशी आनंद है।
  • अनन्त काल की तैयारी (Preparation for Eternity): यदि हमें अनंत काल तक उसके साथ रहना है, तो हमें उसे अब जानना शुरू करना होगा। यह रिश्ता ही हमारे नश्वर जीवन को अनन्त अर्थ प्रदान करता है।

आज के लिए मनन और प्रार्थना में आह्वान

ईमानदारी से स्वयं से यह प्रश्न पूछें: आज आपकी प्राथमिकताएँ क्या हैं? क्या वे उन चीजों में निवेश की जा रही हैं जो नष्ट हो जाएंगी—जैसे धन, क्षणिक बुद्धि, या अस्थायी शक्ति—या क्या आप उस अनमोल और चिरस्थायी रिश्ते को विकसित करने में समय लगा रहे हैं जो अनंत काल तक रहेगा?

प्रार्थना: “हे स्वर्ग के पिता, मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ कि तूने स्वयं को मुझे अपने वचन और अपने पुत्र यीशु मसीह के माध्यम से प्रकट किया है। मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने अक्सर सांसारिक चीजों को तुझसे बढ़कर महत्व दिया है। मुझे क्षमा कर। आज मेरी यह उत्कट लालसा है कि मैं तुझे और अधिक गहराई से जानूँ। मेरी बुद्धि और मेरे हृदय को खोल ताकि मैं तेरी करुणा की गहराई, तेरे न्याय की सच्चाई और तेरे धर्म की पूर्णता को समझ सकूँ। मुझे सिखा कि मैं अपनी उपलब्धियों पर नहीं, बल्कि केवल तुझ पर, तेरे प्रेम और तेरे पुत्र के कार्य पर घमंड करूँ। यीशु के नाम में, आमीन।”

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