परमेश्वर के गुणों के अध्ययन में आज हम एक ऐसे सत्य की ओर बढ़ते हैं जो हमारी भौतिक सोच को चुनौती देता है। हम मनुष्यों के लिए किसी भी अस्तित्व की कल्पना बिना किसी भौतिक रूप या आकार के करना कठिन होता है। लेकिन यीशु मसीह ने सामरी स्त्री के साथ बातचीत करते हुए वास्तविकता का एक महान सूत्र दिया:
“परमेश्वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसकी आराधना करने वाले आत्मा और सच्चाई से आराधना करें।” (यूहन्ना 4:24)
1. ‘आत्मा’ होने का अर्थ क्या है?
जब हम कहते हैं कि “परमेश्वर आत्मा है”, तो इसका अर्थ है कि उसका स्वभाव मौलिक रूप से हमारी तुलना में भिन्न है:
- अदृश्यता: परमेश्वर का कोई भौतिक शरीर नहीं है जिसे मानवीय आँखों से देखा जा सके। वह मांस और लहू से बना हुआ नहीं है। 1 तीमुथियुस 1:17 उसे “अदृश्य परमेश्वर” कहता है।
- असीमितता: क्योंकि वह भौतिक नहीं है, इसलिए वह समय और स्थान (Space) की सीमाओं में बँधा हुआ नहीं है। एक भौतिक शरीर एक समय में एक ही स्थान पर हो सकता है, लेकिन परमेश्वर आत्मा होने के नाते हर जगह एक साथ उपस्थित (सर्वव्यापी) हो सकता है।
- अविभाज्यता: परमेश्वर को टुकड़ों में नहीं बाँटा जा सकता। वह एक शुद्ध, सरल और पूर्ण आत्मिक सत्ता है।
2. रूप और आकार की सीमाओं से परे
बाइबिल में अक्सर परमेश्वर के “हाथ”, “कान” या “आंखों” का वर्णन मिलता है (जिसे धर्मशास्त्र में Anthropomorphism कहा जाता है)। लेकिन ये केवल मानव भाषा की सीमाएं हैं जो हमें यह समझाने के लिए उपयोग की जाती हैं कि परमेश्वर कार्य कैसे करता है:
- परमेश्वर की ‘आंखें’: उसका अर्थ यह नहीं कि उसकी भौतिक पुतलियां हैं, बल्कि यह कि वह सब कुछ जानता है।
- परमेश्वर का ‘हाथ’: इसका अर्थ उसकी सामर्थ्य और सुरक्षा से है।
मूर्तिपूजा के विरुद्ध दी गई आज्ञाओं का आधार भी यही है। किसी भी भौतिक वस्तु या चित्र के द्वारा उस परमेश्वर को नहीं दर्शाया जा सकता जो रूप और आकार से परे है। उसे किसी मंदिर या ढांचे में सीमित नहीं किया जा सकता।
3. “आत्मा और सच्चाई” से आराधना
यूहन्ना 4:24 केवल यह नहीं बताता कि परमेश्वर क्या है, बल्कि यह भी बताता है कि हमें उसके पास कैसे आना चाहिए:
- स्थान की महत्ता का अंत: यदि परमेश्वर आत्मा है, तो आराधना केवल यरूशलेम के मंदिर या किसी विशेष पर्वत तक सीमित नहीं है। आप जहाँ भी हैं, वहीं परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश कर सकते हैं।
- हृदय का संबंध: आत्मिक होने के नाते, परमेश्वर हमारे बाहरी अनुष्ठानों (Rituals) से अधिक हमारे हृदय की स्थिति को देखता है। आत्मा से आराधना करने का अर्थ है—अपने अंतरतम से, पवित्र आत्मा की सहायता से उसके पास आना।
- सच्चाई की आवश्यकता: वह “सच्चाई” का परमेश्वर है। वह हमें वैसा ही देखना चाहता है जैसे हम वास्तव में हैं। उसके सामने कोई मुखौटा काम नहीं आता क्योंकि वह आत्मा है और वह हमारी आत्मा के गहरे विचारों को पढ़ता है।
निष्कर्ष: एक गहरा संबंध
परमेश्वर का ‘आत्मा’ होना उसे हमसे दूर नहीं करता, बल्कि उसे हमारे और भी करीब लाता है। यदि वह केवल भौतिक होता, तो वह हमसे बाहर होता। लेकिन चूँकि वह आत्मा है, वह मसीह में हमारे भीतर वास कर सकता है। वह हमारी हर प्रार्थना को सुन सकता है और हमारे हर दर्द को महसूस कर सकता है।
आज के लिए मनन और प्रार्थना
आज अपनी प्रार्थना के समय, अपनी आँखों को बंद करें और याद करें कि परमेश्वर आपके सामने एक भौतिक वस्तु की तरह नहीं, बल्कि एक जीवंत, पवित्र और सर्वव्यापी उपस्थिति के रूप में है। क्या आपकी आराधना केवल ‘शब्दों’ में है या वह ‘आत्मा और सच्चाई’ में है?
प्रार्थना:
“हे महान अदृश्य परमेश्वर, मैं तेरी आराधना करता हूँ क्योंकि तू आत्मा है। तू किसी मंदिर या सीमाओं में नहीं समाता। धन्यवाद कि मुझे तुझसे मिलने के लिए किसी विशेष स्थान की आवश्यकता नहीं है, बल्कि मैं अपने हृदय की गहराई में तुझसे बात कर सकता हूँ। मुझे पवित्र आत्मा के द्वारा सच्चाई से आराधना करना सिखा। मेरे जीवन से सारे दिखावे को दूर कर और मुझे अपनी पवित्र उपस्थिति का अनुभव करा। यीशु के नाम में, आमीन।”