फसह के पर्व का एक परिचय | Introduction of Passover
‘फसह का पर्व’ शब्द, जो पहली बार सुनने वाले के लिए थोड़ा अप्रचलित या अटपटा लग सकता है, वास्तव में हिंदी भाषी पाठकों के लिए एक विदेशी शब्द है। इस महत्वपूर्ण पर्व को अंग्रेजी में ‘Passover’ कहा जाता है, और यह मूल रूप से इब्रानी (Hebrew) भाषा के शब्द ‘पेसाच’ (Pesach) से उत्पन्न हुआ है। इस इब्रानी शब्द का अर्थ अत्यंत गहरा और प्रतीकात्मक है— इसका शाब्दिक अर्थ है— “ऊपर से लांघ जाना” (To pass over) या “छोड़ देना/बख्श देना” (To spare)। यह नाम इस पर्व के ऐतिहासिक महत्व को सीधे तौर पर दर्शाता है, जैसा कि इसके इतिहास में स्पष्ट होता है।
फसह केवल प्राचीन यहूदी त्योहार के कैलेंडर का एक प्रमुख त्योहार मात्र नहीं है; यह एक ऐसी घटना है जिसने यहूदियों के राष्ट्रीय इतिहास की दिशा बदल दी। यह सदियों की गुलामी से उनकी मुक्ति का उत्सव है, विशेष रूप से मिस्र (Egypt) की दासता से स्वतंत्रता का। यह उनकी पहचान, उनकी आस्था और ईश्वर के साथ उनके विशेष वाचा (Covenant) की नींव है।
लेकिन फसह का महत्व केवल यहूदी इतिहास तक सीमित नहीं है। यह पर्व मसीही विश्वास (Christian Faith) की नींव और उसके केंद्रबिंदु से अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। बाइबल के नए नियम के अनुसार, यीशु मसीह का क्रूस पर चढ़ाया जाना और पुनरुत्थान फसह के समय ही हुआ था। मसीही धर्मशास्त्र में, यीशु मसीह को “परमेश्वर का मेमना” कहा गया है, जिसकी बलि फसह के मेमने की बलि की पूर्ति है, जो पाप की गुलामी से मुक्ति प्रदान करती है।
इसलिए, इस पर्व को केवल एक ऐतिहासिक स्मरणोत्सव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह मुक्ति, बलिदान, और नए जीवन की प्रतिज्ञा का एक शाश्वत प्रतीक है। आइए, इसके विस्तृत इतिहास की घटनाओं और इसके गहन आत्मिक (Spiritual) महत्व की परतों को गहराई से समझते हैं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह क्यों लाखों लोगों के लिए इतना महत्वपूर्ण है।
फसह का इतिहास: गुलामी से आजादी की कहानी
फसह (Passover) का पर्व यहूदी धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है, जो मिस्र की गुलामी से इस्राएलियों की चमत्कारी मुक्ति की याद दिलाता है। इस पर्व को गहराई से समझने के लिए, हमें इतिहास के उस निर्णायक मोड़ पर लौटना होगा जब इस्राएली लोग मिस्र देश में फिरौन के अधीन गुलामों का जीवन जी रहे थे।

मिस्र में इस्राएलियों की गुलामी और अत्याचार
इस्राएली, जो कभी यूसुफ के समय में मिस्र में सम्मान के साथ बस गए थे, अब एक नए फिरौन (राजा) के शासन में कठोर दासता का जीवन जीने को मजबूर थे। फिरौन को इस्राएलियों की बढ़ती हुई संख्या से भय था, इसलिए उसने उन्हें ईंटें बनाने, खेती करने और भारी निर्माण कार्यों में लगाकर उनसे क्रूरतापूर्वक काम लिया। उसका अत्याचार यहीं नहीं रुका। जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए, फिरौन ने एक भयानक आदेश दिया: हर इस्राएली लड़के को जन्म लेते ही नील नदी में फेंक दिया जाए या मार डाला जाए। यह एक ऐसा नरसंहार था जिसका उद्देश्य इस्राएली राष्ट्र को जड़ से खत्म करना था।
मूसा का जन्म, परवरिश और परमेश्वर का बुलावा
इसी अत्यंत कठिन और जानलेवा समय में लेवी गोत्र में मूसा का जन्म हुआ। उसकी माँ योकेबेद ने उसे तीन महीने तक छिपाए रखा, लेकिन जब छिपाना असंभव हो गया, तो उसने विश्वास और साहस के साथ एक टोकरी में उसे रखकर नील नदी में बहा दिया। परमेश्वर के चमत्कारिक हस्तक्षेप से, वह टोकरी सीधे फिरौन की बेटी के हाथ लगी, जिसने मूसा को गोद ले लिया और उसका पालन-पोषण राजमहल में एक मिस्री राजकुमार की तरह हुआ। इस प्रकार, परमेश्वर ने अपने भावी छुड़ाने वाले को ठीक शत्रु के गढ़ में सुरक्षित रखा और प्रशिक्षित किया।
40 साल का प्रशिक्षण और परमेश्वर का दर्शन
मूसा ने अपने जीवन के शुरुआती 40 वर्ष मिस्र के राजमहल में बिताए, जहाँ उसने मिस्रियों की सारी विद्या और शक्ति सीखी। जब उसने एक मिस्री को एक इस्राएली को मारते हुए देखा, तो उसने न्याय के आवेग में उस मिस्री को मार डाला और परिणामस्वरुप उसे मिस्र से भागकर मिद्यान देश के जंगल में शरण लेनी पड़ी। अगले 40 वर्ष उसने मिद्यान में एक चरवाहे के रूप में बिताए। जब वह 80 वर्ष का हुआ (40 साल राजमहल में और 40 साल जंगल में), तब उसका प्रशिक्षण पूरा हुआ।
परमेश्वर ने मूसा को एक असाधारण घटना के माध्यम से दर्शन दिया:
जलती हुई झाड़ी (The Burning Bush)
मूसा मिद्यान के रेगिस्तानी पहाड़ होरेब पर था, जब उसने एक झाड़ी को देखा जो आग में जल रही थी, लेकिन भस्म नहीं हो रही थी। जब वह इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए पास गया, तो परमेश्वर ने स्वयं उस झाड़ी में से मूसा को पुकारा और अपनी योजना प्रकट की। परमेश्वर ने कहा कि उसने मिस्र में अपने लोगों के दुख को देखा है और वह उन्हें उस गुलामी से निकालकर एक ऐसे उत्तम देश में ले जाना चाहता है जहाँ दूध और शहद की नदियाँ बहती हैं।
इसी समय, परमेश्वर ने मूसा को यह ज़िम्मेदारी सौंपी कि वह वापस मिस्र जाए और फ़िरौन से कहे कि वह इस्राएलियों को जाने दे। मूसा का यह बुलावा ही फसह और इस्राएलियों की मुक्ति की कहानी का आधार बना।
मिस्र पर 10 विपत्तियाँ और उनका अर्थ
परमेश्वर ने मिस्र के राजा, फ़िरौन, के कठोर और अड़ियल हृदय को परिवर्तित करने के लिए दस भयानक और चमत्कारी विपत्तियाँ भेजीं। ये विपत्तियाँ केवल मिस्र के लोगों और फ़िरौन को उनके विद्रोह के लिए दण्डित करने का एक साधन मात्र नहीं थीं, बल्कि ये उससे कहीं अधिक थीं।
ये 10 विपत्तियाँ दरअसल मिस्र के झूठे देवताओं और उनकी शक्तियों के विरुद्ध परमेश्वर यहोवा का सीधा और निर्णायक न्याय थीं। प्रत्येक विपत्ति विशेष रूप से मिस्र के एक या एक से अधिक पूजनीय देवताओं पर एक हमला थी, जिससे यह सिद्ध हुआ कि परमेश्वर यहोवा ही एकमात्र सच्चा और सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, और मिस्र के देवता शक्तिहीन और व्यर्थ हैं।
इन विपत्तियों का उद्देश्य मिस्रियों और स्वयं इस्राएलियों दोनों को परमेश्वर की अद्वितीय संप्रभुता और शक्ति का प्रदर्शन करना था:
- न्याय का प्रदर्शन: परमेश्वर ने दिखाया कि वह इतिहास में हस्तक्षेप करता है और दुष्टों को दण्डित करता है।
- झूठे देवताओं का अनावरण: प्रत्येक विपत्ति ने मिस्र के एक प्रमुख देवता की शक्ति को खंडित कर दिया, जिससे उनकी निरर्थकता सिद्ध हुई।
- इस्राएल को मुक्ति दिलाना: इन विपत्तियों के माध्यम से परमेश्वर ने फ़िरौन को अपने लोगों, इस्राएलियों को दासता से मुक्त करने के लिए मजबूर किया, ताकि वे वाचा के देश की ओर अपनी यात्रा शुरू कर सकें।
इस प्रकार, ये विपत्तियाँ केवल प्राकृतिक आपदाएँ नहीं थीं, बल्कि परमेश्वर की शक्ति, न्याय और मिस्र के झूठे देवताओं पर उसकी निर्णायक विजय की गवाह थीं।
मिस्र पर दस विपत्तियाँ: फिरौन और उसके देवताओं पर परमेश्वर का निर्णय
यह पाठ मिस्र के फिरौन और उसके देवताओं पर इज़रायल के परमेश्वर यहोवा के निर्णायक न्याय को दर्शाने वाली दस भयानक विपत्तियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है, जैसा कि बाइबिल के निर्गमन (Exodus) की पुस्तक में दर्ज है। प्रत्येक विपत्ति न केवल एक प्राकृतिक आपदा थी, बल्कि मिस्र के एक विशिष्ट और पूजनीय देवता या धार्मिक अवधारणा पर सीधा प्रहार थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इज़रायल का परमेश्वर ही अकेला सच्चा और सर्वशक्तिमान शासक है।
1. नील नदी का खून बनना (The River of Blood)
| पहलू | विवरण |
| विपत्ति का विवरण | नील नदी का पानी, जो मिस्र के जीवन का स्रोत था, पूरी तरह से खून में बदल गया। पानी पीने योग्य नहीं रहा, जिससे मिस्रवासी प्यासे रह गए। इस घटना से नदी की सभी मछलियाँ मर गईं, और नदी से भयानक गंध आने लगी। मिस्र के जादूगर मूसा और हारून की इस कार्रवाई को कुछ हद तक दोहराने में सफल रहे, लेकिन वे इसे समाप्त नहीं कर सके। यह विपत्ति सात दिनों तक चली। |
| चुनौती दिए गए मिस्र के देवता | खनुम (नील नदी का संरक्षक और उसके स्रोत का देवता), ओसिरिस (नील और उर्वरता का देवता, जिसे मिस्र के जीवन का दाता माना जाता था), और हापी (नील नदी का साक्षात् देवता)। यह विपत्ति मिस्र के जल स्रोतों पर सीधा और विनाशकारी प्रहार थी, जिसने उनके जीवन के आधार को ही अशुद्ध कर दिया। |
| बाइबिल संदर्भ | निर्गमन 7:14-25 |
| निष्कर्ष | यहोवा ने दिखाया कि वह मिस्र के जीवन के स्रोत, नील नदी पर पूर्ण नियंत्रण रखता है, जो उनके प्रमुख देवताओं की शक्ति को नकारता है। |
2. मेंढकों का संक्रमण (The Plague of Frogs)
| पहलू | विवरण |
| विपत्ति का विवरण | मिस्र के पूरे देश में मेंढकों की एक अभूतपूर्व बाढ़ आ गई। ये मेंढक न केवल खेतों और सड़कों पर थे, बल्कि मिस्रवासियों के घरों, बिस्तरों, ओवन और यहाँ तक कि फ़िरौन के निजी महलों में भी घुस गए। मिस्र के जादूगर भी मेंढकों को लाने में सफल रहे, लेकिन वे उन्हें हटाने में असमर्थ थे। फिरौन ने पहली बार मूसा से प्रार्थना करने की गुहार लगाई, लेकिन विपत्ति के हटने के बाद उसने फिर मन कठोर कर लिया। |
| चुनौती दिए गए मिस्र के देवता | हेक़्त (मेंढक के सिर वाली देवी, जो उर्वरता, जल और प्रसव से जुड़ी थी)। मिस्रवासी मेंढकों को पवित्र मानते थे, लेकिन इस विपत्ति ने उन्हें एक कष्टदायक गंदगी में बदल दिया, जिससे हेक़्त की शक्ति और पवित्रता पर सवाल उठा। |
| बाइबिल संदर्भ | निर्गमन 8:1-15 |
| निष्कर्ष | परमेश्वर ने दिखाया कि वह मिस्र के पवित्र माने जाने वाले जीव को भी न्याय के एक साधन के रूप में उपयोग कर सकता है। |
3. जूँ का प्रकोप (The Plague of Gnats or Lice)
| पहलू | विवरण |
| विपत्ति का विवरण | मूसा और हारून द्वारा जमीन की धूल को मारने पर, वह धूल तुरंत छोटे काटने वाले जूँ, मच्छर या छोटे कीड़ों (अनुवाद के अनुसार) के एक विशाल प्रकोप में बदल गई, जिसने मनुष्यों और पशुओं को समान रूप से पीड़ित किया। यह विपत्ति इतनी अचानक और व्यापक थी कि मिस्र के जादूगर अपनी गुप्त कलाओं से इसे दोहरा नहीं पाए। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि यह “ईश्वर की उंगली” है। |
| चुनौती दिए गए मिस्र के देवता/तंत्र | मिस्र के बलि और धार्मिक शुद्धिकरण तंत्र पर प्रहार। जूँ के कारण पुजारियों और आम लोगों को धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अशुद्ध कर दिया गया, जिससे वे मंदिरों में प्रवेश करने और सेवा करने में असमर्थ हो गए। यह पवित्रता के मिस्र के पूरे विचार को नष्ट कर रहा था। |
| बाइबिल संदर्भ | निर्गमन 8:16-19 |
| निष्कर्ष | यह पहली विपत्ति थी जिसने मिस्र के जादूगरों की सीमा को उजागर किया, यह साबित करते हुए कि इज़रायल के परमेश्वर की शक्ति उनसे कहीं अधिक है। |
4. डाँस (मक्खियों) का दल (The Plague of Flies/Swarms)
| पहलू | विवरण |
| विपत्ति का विवरण | हानिकारक डांस (या शायद एक प्रकार की बड़ी मक्खियाँ) का एक विशाल झुंड मिस्र के घरों और ज़मीन पर टूट पड़ा, जिससे देश गंभीर रूप से पीड़ित हुआ। हालाँकि, इस विपत्ति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसराएलियों के निवास स्थान, गोशेन में एक भी मक्खी नहीं आई। यह पहली विपत्ति थी जिसके द्वारा यहोवा ने मिस्रवासियों और अपने लोगों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया, यह दिखाते हुए कि वह चुन सकता है कि किसे दंडित करना है और किसे नहीं। |
| चुनौती दिए गए मिस्र के देवता | केपेरा (सूर्य उदय से जुड़ा मक्खी के सिर वाला देवता, जिसे सृजन और पुनर्जन्म का प्रतीक माना जाता था)। इस विपत्ति ने दिखाया कि परमेश्वर न केवल विपत्ति ला सकता है, बल्कि वह उसे नियंत्रित और सीमित भी कर सकता है। |
| बाइबिल संदर्भ | निर्गमन 8:20-32 |
| निष्कर्ष | परमेश्वर ने अपनी संप्रभुता का प्रदर्शन करते हुए स्पष्ट रूप से अपने लोगों को मिस्रियों से अलग किया। |
5. पशुधन की महामारी (The Plague on Livestock)
| पहलू | विवरण |
| विपत्ति का विवरण | मिस्र के खेतों में एक गंभीर महामारी फैली, जिससे उनके सभी पशुधन—घोड़े, गधे, ऊँट, मवेशी, और भेड़-बकरियाँ—भारी संख्या में मारे गए। यह मिस्र की अर्थव्यवस्था और परिवहन के लिए एक बड़ा झटका था। इसराएलियों के पशुधन को फिर से पूरी तरह से बख्श दिया गया, जिससे परमेश्वर का भेद स्पष्ट हुआ। फिरौन ने जाँच करवाई और पाया कि इसराएलियों के पशुओं का कोई नुकसान नहीं हुआ है, फिर भी उसने जाने देने से इनकार कर दिया। |
| चुनौती दिए गए मिस्र के देवता | हाथोर (गाय के सिर वाली प्रेम, मातृत्व और आकाश की देवी), एप्पिस (पवित्र बैल, जो उर्वरता और राजा की शक्ति का प्रतीक था) और पाह (मवेशियों का रक्षक)। यह विपत्ति मिस्र की संपत्ति, शक्ति और खाद्य सुरक्षा पर सीधा प्रहार थी, उनके पवित्र माने जाने वाले पशुओं को नष्ट कर दिया गया। |
| बाइबिल संदर्भ | निर्गमन 9:1-7 |
| निष्कर्ष | परमेश्वर ने मिस्र की भौतिक संपत्ति और धार्मिक प्रतीकवाद पर प्रहार किया, उनके पूजनीय पशुओं को मौत के अधीन कर दिया। |
6. फफोले और छाले (The Plague of Boils and Sores)
| पहलू | विवरण |
| विपत्ति का विवरण | मूसा और हारून ने भट्ठी की राख को हवा में उछाला, और वह राख मनुष्यों और पशुओं पर भयंकर फोड़े और छालों (संक्रामक, दर्दनाक घावों) में बदल गई। यह पीड़ादायक बीमारी पूरे मिस्र में फैल गई। यह विपत्ति इतनी भयानक थी कि मिस्र के जादूगर भी इस बीमारी से पीड़ित हुए और मूसा के सामने खड़े नहीं हो पाए। |
| चुनौती दिए गए मिस्र के देवता | इम्होटेप (चिकित्सा और उपचार का देवता) और सेखमेट (प्लेग, युद्ध और उपचार की देवी)। इस विपत्ति ने मिस्र के स्वास्थ्य, उपचार की शक्तियों और पुजारियों की धार्मिक शुद्धता की व्यर्थता को दर्शाया। |
| बाइबिल संदर्भ | निर्गमन 9:8-12 |
| निष्कर्ष | परमेश्वर ने मिस्र के स्वास्थ्य और शारीरिक अखंडता पर प्रहार किया, यह दर्शाते हुए कि कोई भी उपचारक देवता उसकी शक्ति का मुकाबला नहीं कर सकता। |
7. ओले और आग (The Plague of Hail and Fire)
| पहलू | विवरण |
| विपत्ति का विवरण | मिस्र में एक भयानक ओलों का तूफान आया, जिसमें ओलों के साथ आग भी मिली हुई थी। यह तूफान इतना विनाशकारी था कि इसने मिस्र के खेतों, पेड़ों और बाहर मौजूद मनुष्यों और पशुओं को मार डाला। इस विपत्ति से पहले, परमेश्वर ने चेतावनी दी, जिससे मिस्र के कुछ लोगों को अपने दासों और पशुओं को आश्रय में ले जाने का मौका मिला। गोशेन में फिर से एक भी ओला नहीं गिरा। फिरौन ने पहली बार स्वीकार किया कि “मैंने पाप किया है; यहोवा धर्मी है, और मैं और मेरे लोग दोषी हैं।” |
| चुनौती दिए गए मिस्र के देवता | नट (आकाश देवी), शू (वायु देवता) और सेठ (तूफान, अराजकता और रेगिस्तानी हवाओं का देवता)। यह विपत्ति मिस्र के मौसम, कृषि और आकाश पर ईश्वर के पूर्ण नियंत्रण को प्रदर्शित करती थी, जिससे उनके सभी कृषि और मौसमी देवता शक्तिहीन सिद्ध हुए। |
| बाइबिल संदर्भ | निर्गमन 9:13-35 |
| निष्कर्ष | परमेश्वर ने प्राकृतिक शक्तियों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया, जिसने मिस्र की कृषि और पर्यावरण को तबाह कर दिया। |
8. टिड्डियों का दल (The Plague of Locusts)
| पहलू | विवरण |
| विपत्ति का विवरण | परमेश्वर ने टिड्डियों का एक विशाल झुंड मिस्र में भेजा, जिसने ओलों से बचे हुए हर पेड़-पौधे और फसल को खा लिया। टिड्डियों ने इतना अँधेरा कर दिया कि ज़मीन भी दिखाई नहीं देती थी, और उन्होंने देश की सारी हरियाली नष्ट कर दी। मिस्र के अधिकारियों ने फिरौन को जाने देने की विनती की, लेकिन फ़िरौन ने मना कर दिया। |
| चुनौती दिए गए मिस्र के देवता | सेन (फसलों का देवता) और रेनेनुटेट (फसल की देवी, जिसे किसानों द्वारा सम्मानित किया जाता था)। यह विपत्ति मिस्र की खाद्य आपूर्ति को पूरी तरह से नष्ट करने वाली थी, जिससे अकाल की स्थिति पैदा हो गई। |
| बाइबिल संदर्भ | निर्गमन 10:1-20 |
| निष्कर्ष | परमेश्वर ने मिस्र की शेष कृषि उपज पर भी न्याय किया, जिससे उनकी खाद्य आत्मनिर्भरता समाप्त हो गई। |
9. घोर अंधकार (The Plague of Darkness)
| पहलू | विवरण |
| विपत्ति का विवरण | मिस्र पर तीन दिनों तक इतना घना और छूने लायक अंधकार छाया रहा कि मिस्रवासी एक-दूसरे को देख भी नहीं पाए या अपने स्थान से हिल भी नहीं पाए। यह एक अस्वाभाविक और मनोवैज्ञानिक रूप से दुर्बल करने वाला अंधकार था। इसके विपरीत, इसराएलियों के निवास स्थान गोशेन में पूर्ण उजाला था। |
| चुनौती दिए गए मिस्र के देवता | रा (सूर्य देव), मिस्र का सबसे महत्वपूर्ण और पूजनीय देवता, जिसे सभी देवताओं का राजा और फिरौन का पिता माना जाता था। यह विपत्ति रा के प्रभुत्व पर अंतिम और सबसे शक्तिशाली प्रहार थी, क्योंकि परमेश्वर ने प्रकाश के स्रोत को ही अपने नियंत्रण में ले लिया, जिससे मिस्र का धर्म और जीवन का केंद्र हिल गया। |
| बाइबिल संदर्भ | निर्गमन 9:8-12 |
| निष्कर्ष | परमेश्वर ने मिस्र के सर्वोच्च देवता, सूर्य देव रा को भी शक्तिहीन सिद्ध कर दिया, यह दर्शाते हुए कि यहोवा ही ब्रह्मांड का वास्तविक प्रकाश और शासक है। |
10. पहलौठों की मृत्यु (The Death of the Firstborn)
| पहलू | विवरण |
| विपत्ति का विवरण | यह अंतिम और सबसे भयानक विपत्ति थी। आधी रात को, मिस्र के हर घर में, फ़िरौन के सिंहासन पर बैठने वाले पुत्र से लेकर बंदीगृह की दासी के पुत्र तक, और सभी पहलौठे पशु मारे गए। मिस्र में एक बड़ा विलाप हुआ, क्योंकि ऐसा कोई घर नहीं था जिसमें मृत्यु न हुई हो। केवल जिन इसराएली घरों पर परमेश्वर के निर्देशानुसार फसह के मेमने के लहू का निशान था, वे बच गए (फसह पर्व की स्थापना)। |
| चुनौती दिए गए मिस्र के देवता/व्यक्ति | मिस्र के सभी झूठे देवता और राजा (स्वयं फ़िरौन)। इस विपत्ति ने फ़िरौन के दैवीय दावे को नष्ट कर दिया (वह खुद को एक देवता मानता था)। यह मिस्र के शाही और धार्मिक ढांचे पर अंतिम, निर्णायक झटका था, जिसने उनके देवताओं और फ़िरौन की शक्ति को पूरी तरह से नकार दिया। |
| बाइबिल संदर्भ | निर्गमन 11:1-10 (अंतिम विपत्ति की घोषणा), निर्गमन 12:1-28 (फसह की विधि और लहू के चिन्ह का वर्णन), और निर्गमन 12:29-32 (विपत्ति का वास्तविक क्रियान्वयन और फिरौन का समर्पण)। |
| निष्कर्ष | इस अंतिम न्याय ने अंततः फ़िरौन को इसराएलियों को तुरंत मिस्र छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। यहोवा ने न केवल अपने सभी शत्रुओं पर अपनी सर्वोच्च शक्ति स्थापित की, बल्कि अपने लोगों के बचाव के लिए फसह की व्यवस्था करके अपनी दया और मुक्ति की योजना को भी प्रकट किया। |
निष्कर्ष
ये दस विपत्तियाँ फिरौन और मिस्र के पूरे धार्मिक और राजनीतिक तंत्र के खिलाफ यहोवा के सर्वोच्च निर्णय का प्रदर्शन थीं। वे सिर्फ आपदाएँ नहीं थीं, बल्कि एक-एक करके मिस्र के सबसे पूजनीय देवताओं की व्यर्थता को सिद्ध करती थीं, यह घोषणा करती थीं कि स्वर्ग और पृथ्वी पर केवल इज़रायल का परमेश्वर, यहोवा, ही एकमात्र सच्चा और जीवित परमेश्वर है।
प्रथम फसह और मेमने का लहू
दसवीं और अंतिम विपत्ति सबसे भयानक थी। परमेश्वर ने मूसा को निर्देश दिए कि प्रत्येक परिवार एक निर्दोष मेमना ले और उसे बलि करे।
- लहू का चिन्ह: मेमने के लहू को घर के दरवाजे की चौखट और अलंगों (दायें-बाएँ) पर लगाना था।
- दूत का गुजरना: जब मौत का दूत उस रात मिस्र से गुजरा, तो जिस घर पर लहू का चिन्ह था, उसने उस घर को ‘लांघ दिया’ (Passed Over)। वहाँ किसी की मृत्यु नहीं हुई।
इसी अद्भुत बचाव और मिस्र की गुलामी से मिली आजादी की याद में यहूदी आज भी फसह मनाते हैं।
फसह मनाने के नियम (बाइबलीय निर्देश)
परमेश्वर ने निर्गमन 12 में इस पर्व को मनाने के कुछ कड़े नियम दिए थे:
- मेमने का चुनाव: नीसान महीने के 10वें दिन एक साल का निर्दोष मेमना (बिना किसी दाग या बीमारी के) अलग रखना था।
- बलिदान: 14वें दिन शाम को इसे बलि करना था।
- हड्डी न तोड़ना: मेमने को भूनकर खाते समय उसकी एक भी हड्डी नहीं टूटनी चाहिए थी (निर्गमन 12:46)।
- तैयारी: इसे जल्दबाजी में खाना था, कमर बांधे हुए और हाथ में लाठी लिए हुए, जो प्रस्थान की तैयारी का प्रतीक था।
मसीहियों के लिए फसह का महत्व: यीशु हमारा फसह

यहूदी 1500 सालों तक मेमने की बलि चढ़ाते रहे, लेकिन वे बलिदान केवल पापों को ‘ढांकते’ थे, ‘हटाते’ नहीं थे।
1. यीशु मसीह: परमेश्वर का मेमना
यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने यीशु को देखते ही कहा था: “देखो, यह परमेश्वर का मेमना है, जो जगत के पाप उठा ले जाता है” (यूहन्ना 1:29)।
2. समय की शुद्धता
दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन और जिस समय यहूदी फसह का मेमना बलि कर रहे थे, ठीक उसी समय प्रभु यीशु मसीह क्रूस पर हमारे पापों के लिए बलिदान हुए।
3. एक भी हड्डी नहीं तोड़ी गई
क्रूस पर चढ़ते समय सैनिकों ने अन्य लोगों की टांगें तोड़ दीं, लेकिन यीशु की एक भी हड्डी नहीं तोड़ी गई, ताकि पवित्रशास्त्र की भविष्यवाणी और फसह के नियम पूरे हों।
“हमारा भी फसह जो मसीह है, बलिदान हुआ है।” (1 कुरिन्थियों 5:7)
निष्कर्ष: क्या आपके जीवन पर ‘लहू’ का चिन्ह है? – मुक्ति और नया जीवन
बाइबिल के इतिहास में, मिस्र से इस्राएलियों के महान निकास की घटना, जिसे ‘फसह’ (Passover) कहा जाता है, एक शाश्वत सत्य को दर्शाती है। उस भयावह रात में, मिस्र के हर घर पर परमेश्वर का न्याय आया। प्रत्येक पहलौठा मारा गया – मनुष्य का भी और पशु का भी। परन्तु मिस्र में केवल वही इस्राएली परिवार बचा, जिसके घर के द्वार के चौखटों पर, परमेश्वर के आदेशानुसार, एक निर्दोष मेमने का बहुमूल्य लहू लगाया गया था। जब मृत्यु का दूत उस चिन्ह को देखता था, तो वह उस घर को ‘फाँदकर’ (pass over) आगे बढ़ जाता था। यह लहू जीवन और मृत्यु के बीच की निर्णायक रेखा बन गया था।
आज, हमारे लिए वह ‘फसह का मेमना’ और कोई नहीं, बल्कि स्वयं यीशु मसीह हैं। बाइबिल उन्हें ‘परमेश्वर का मेमना’ कहती है, जिसने जगत का पाप उठा लिया (यूहन्ना 1:29)। जैसे फसह के मेमने ने अपने लहू के द्वारा इस्राएलियों को मिस्र के बंधन और शारीरिक मृत्यु के विनाश से बचाया, उसी प्रकार, यीशु मसीह का क्रूस पर बहाया गया सिद्ध और अनमोल लहू, हमें उस से कहीं अधिक गंभीर परिणाम – ‘आत्मिक मृत्यु’ और ‘पाप के अनंत दंड’ से बचाता है।
यीशु के लहू का सामर्थ्य:
- न्याय से सुरक्षा: यह लहू परमेश्वर के पवित्र और न्यायी क्रोध से हमें ढक लेता है। जो कोई विश्वास से यीशु के लहू को अपने जीवन पर ‘लगाता’ है (अर्थात् उस पर विश्वास करता है), वह न्याय से बच जाता है और परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी ठहरता है।
- पापों की क्षमा: यीशु का लहू एकमात्र साधन है जिसके द्वारा हमारे समस्त पापों – अतीत, वर्तमान और भविष्य – को धोया और पूरी तरह से क्षमा किया जा सकता है। यह हमें परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप कराता है।
- शुद्धिकरण और पवित्रता: यह लहू न केवल क्षमा देता है, बल्कि हमारे विवेक को भी ‘मरे हुए कामों से’ शुद्ध करता है ताकि हम जीवते परमेश्वर की सेवा कर सकें (इब्रानियों 9:14)। यह हमें पाप की शक्ति से मुक्त कर पवित्र जीवन जीने का सामर्थ्य देता है।
अतः, प्रश्न यह नहीं है कि आप कितने धार्मिक या अच्छे हैं, बल्कि यह है कि क्या आपके जीवन पर ‘फसह के मेमने’ – यीशु मसीह – के लहू का चिन्ह है? क्या आपने विश्वास के द्वारा उनके बलिदान को स्वीकार किया है? क्योंकि बाइबिल स्पष्ट रूप से कहती है कि “बिना लहू बहाए पापों की क्षमा नहीं होती” (इब्रानियों 9:22)। यह लहू ही हमारी मुक्ति का एकमात्र आधार, हमारी आशा का लंगर और अनन्त जीवन का प्रमाण है।