
बाइबिल के पहले ही अध्याय में मनुष्य की रचना का एक ऐसा विवरण मिलता है जो हमें पूरी सृष्टि में सबसे अद्वितीय स्थान पर खड़ा कर देता है। उत्पत्ति 1:27 हमें हमारे अस्तित्व के सबसे गहरे सत्य से परिचित कराता है:
“तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया; नर और नारी करके उसने उनकी सृष्टि की।” (उत्पत्ति 1:27)
परमेश्वर और मनुष्य के बीच के इस संबंध को समझने के लिए धर्मशास्त्र (Theology) में गुणों को दो श्रेणियों में बांटा गया है:
अ-संचारित (Incommunicable) और संचारित (Communicable Attributes) गुण। आज हम इस बात पर ध्यान केंद्रित करेंगे कि परमेश्वर ने अपने किन गुणों को हमारे भीतर “संचारित” या साझा किया है।
1. स्वरूप का अर्थ: शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक
जब बाइबल कहती है कि हम “परमेश्वर के स्वरूप” (Imago Dei) में बनाए गए हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर का हमारे जैसा भौतिक शरीर है। परमेश्वर आत्मा है। स्वरूप का अर्थ है कि मनुष्य में परमेश्वर के कुछ नैतिक, बौद्धिक और आत्मिक गुणों की छाप लगाई गई है।
जिस तरह एक दर्पण सूर्य की रोशनी को प्रतिबिंबित करता है, उसी तरह मनुष्य को परमेश्वर की महिमा और उसके चरित्र को प्रतिबिंबित करने के लिए बनाया गया है।
2. अ-संचारित बनाम संचारित गुण
परमेश्वर को गहराई से जानने के लिए इस अंतर को समझना आवश्यक है:
- अ-संचारित गुण (Incommunicable Attributes): ये वे गुण हैं जो केवल परमेश्वर के पास हैं और वह उन्हें किसी के साथ साझा नहीं करता। जैसे: उसकी स्व-विद्यमानता (Self-existence), उसकी अपरिवर्तनीयता (Immutability), और उसकी सर्वव्यापकता। हम कभी भी सर्वशक्तिमान या सर्वज्ञ नहीं हो सकते।
- संचारित गुण (Communicable Attributes): ये वे गुण हैं जो परमेश्वर के पास असीमित मात्रा में हैं, लेकिन उसने इनका एक सीमित अंश हमें भी दिया है ताकि हम उससे संगति कर सकें।
3. हम में परमेश्वर की छाप: प्रमुख संचारित गुण
उत्पत्ति 1:27 के प्रकाश में, हम देख सकते हैं कि परमेश्वर ने हमारे भीतर क्या साझा किया है:
- प्रेम: परमेश्वर प्रेम है, और उसने हमें प्रेम करने की क्षमता दी है। हमारा दूसरों के प्रति निस्वार्थ प्रेम परमेश्वर के अनंत प्रेम का एक छोटा सा प्रतिबिम्ब है।
- बुद्धि और ज्ञान: परमेश्वर सर्वज्ञ है। उसने हमें सोचने, तर्क करने और सृजन करने की क्षमता दी है। विज्ञान, कला और दर्शन (Philosophy) में हमारी प्रगति इसी “ईश्वरीय बुद्धि” का परिणाम है।
- धार्मिकता और न्याय: हमारे भीतर सही और गलत की जो समझ (विवेक) है, वह परमेश्वर के न्यायपूर्ण स्वभाव से आती है। जब हम अन्याय देखते हैं और हमारा मन दुखी होता है, तो वह हमारे भीतर परमेश्वर की छाप ही बोल रही होती है।
- सृजनात्मकता: परमेश्वर महान सृष्टिकर्ता है। जब हम चित्रकारी करते हैं, लिखते हैं, या कुछ नया बनाते हैं, तो हम उसकी रचनात्मकता को दर्शाते हैं।
4. स्वरूप का धूमिल होना और पुनरुद्धार
यद्यपि हम परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए थे, लेकिन पाप के कारण वह स्वरूप “धूमिल” या बिगड़ गया है। जैसे एक गंदा दर्पण सूर्य की छवि को साफ नहीं दिखा पाता, वैसे ही पाप ने हमारे भीतर के ईश्वरीय गुणों को विकृत कर दिया है।
- हमारा प्रेम स्वार्थी हो गया है।
- हमारा ज्ञान घमंड में बदल गया है।
- हमारा न्याय प्रतिशोध बन गया है।
यही कारण है कि हमें यीशु मसीह की आवश्यकता है। कुलुस्सियों 1:15 कहता है कि यीशु “अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप” है। मसीह में आने के बाद, पवित्र आत्मा हमारे भीतर उस बिगड़े हुए स्वरूप को फिर से नया करना शुरू करता है (2 कुरिन्थियों 3:18)।
निष्कर्ष: हमारी गरिमा का आधार
आपकी गरिमा आपकी नौकरी, आपकी शिक्षा या आपके बैंक बैलेंस से नहीं आती। आपकी असली कीमत इस बात में है कि आप ब्रह्मांड के रचयिता के स्वरूप में बनाए गए हैं। आप में उसकी छाप है। जब आप दूसरों की सेवा करते हैं, सच बोलते हैं या दया दिखाते हैं, तो आप वास्तव में परमेश्वर को इस संसार में प्रकट कर रहे होते हैं।
आज के लिए मनन और प्रार्थना
आज दर्पण में देखते समय खुद से कहें: “मैं परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया हूँ।” क्या आपके कार्य आज उस महान कलाकार की कलाकृति को सही ढंग से दर्शा रहे हैं?
प्रार्थना:
“हे महान सृष्टिकर्ता, मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ कि तूने मुझे अपने स्वरूप में बनाया। मुझे क्षमा कर जहाँ मैंने अपने जीवन से तेरी छवि को धूमिल किया है। आज अपने पवित्र आत्मा के द्वारा मेरे भीतर उन गुणों को फिर से जीवित कर जो तूने मुझमें डाले हैं—ताकि मैं प्रेम, न्याय और सत्य में चल सकूँ। मुझे यीशु मसीह के समान बनने में मदद कर। आमीन।”