मसीही धर्मशास्त्र (Theology) में ‘स्वयं -अस्तित्व’ (Aseity) एक ऐसा शब्द है जो परमेश्वर की परम स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता को दर्शाता है। यह लैटिन शब्द ‘A se’ से आया है, जिसका अर्थ है “स्वयं से।” निर्गमन 3:14 में जब मूसा परमेश्वर से उसका नाम पूछता है, तो परमेश्वर जो उत्तर देता है, वह ब्रह्मांड का सबसे गहरा सत्य है:
“परमेश्वर ने मूसा से कहा, ‘मैं जो हूँ सो हूँ।’ फिर उसने कहा, ‘तू इस्राएलियों से यह कहना, कि जिसका नाम “मैं हूँ” है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है’।” (निर्गमन 3:14)
1. “मैं जो हूँ सो हूँ” का अर्थ
परमेश्वर का यह नाम (YHWH) उसके स्वयं-अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण है। इसके कुछ गहरे अर्थ हैं:
- वह स्व-पर्याप्त है: परमेश्वर को अस्तित्व में बने रहने के लिए किसी बाहरी कारण, ऊर्जा या सहारे की आवश्यकता नहीं है। हम सांस लेने के लिए हवा पर, जीने के लिए भोजन पर और पैदा होने के लिए अपने माता-पिता पर निर्भर हैं। लेकिन परमेश्वर किसी पर निर्भर नहीं है।
- वह शाश्वत है: उसका कोई आरंभ नहीं है और न ही कोई अंत। वह “कारण रहित कारण” (Uncaused Cause) है। वह हमेशा से था, है और रहेगा।
- वह अपरिवर्तनीय है: क्योंकि उसका अस्तित्व स्वयं से है, इसलिए कोई भी बाहरी शक्ति उसे बदल नहीं सकती, उसे घटा नहीं सकती या उसे नष्ट नहीं कर नहीं सकती।
2. परमेश्वर किसी का कर्जदार नहीं
अक्सर हम अनजाने में यह सोच लेते हैं कि हमारी प्रार्थनाओं, हमारे बलिदानों या हमारी सेवा से परमेश्वर को कुछ ‘लाभ’ होता है। लेकिन ‘Aseity’ का सिद्धांत हमें बताता है कि परमेश्वर को हमारी किसी भी चीज़ की ज़रूरत नहीं है।
अय्यूब 41:11 में परमेश्वर कहते हैं, “किसने मुझे पहले कुछ दिया है, जिसका बदला मुझे उसे देना पड़े? जो कुछ आकाश के नीचे है, वह सब मेरा ही है।”
- सेवा: हम परमेश्वर की सेवा इसलिए नहीं करते कि वह ‘अकेला’ है या उसे ‘काम करने वालों’ की कमी है। हम सेवा इसलिए करते हैं क्योंकि यह हमारा सौभाग्य है।
- आराधना: हमारी स्तुति परमेश्वर की महिमा में कुछ ‘जोड़ती’ नहीं है (क्योंकि वह पहले से ही पूर्ण है), बल्कि यह हमें उसकी महिमा का आनंद लेने के योग्य बनाती है।
- दान: हम उसे वह देते हैं जो पहले से ही उसका है।
3. यह हमारे लिए “सुसमाचार” क्यों है?
पहली नज़र में यह विचार कि “परमेश्वर को मेरी ज़रूरत नहीं है” थोड़ा कठोर लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह बहुत बड़ा दिलासा है:
- उसका प्रेम स्वार्थरहित है: यदि परमेश्वर को हमारी ज़रूरत होती, तो वह हमसे अपनी ज़रूरत पूरी करने के लिए प्रेम करता (जैसे हम अक्सर करते हैं)। लेकिन चूँकि वह पूर्ण है, इसलिए उसका हमसे प्रेम करना पूरी तरह से अनुग्रह (Grace) है। वह हमसे इसलिए प्रेम नहीं करता क्योंकि उसे कुछ चाहिए, बल्कि इसलिए क्योंकि वह “प्रेम” है।
- सुरक्षित आधार: एक ऐसा परमेश्वर जो किसी पर निर्भर नहीं है, वह कभी विफल नहीं हो सकता। यदि उसकी शक्ति या अस्तित्व किसी बाहरी चीज़ पर निर्भर होता, तो वह चीज़ छीनी जा सकती थी। लेकिन उसका अस्तित्व स्वयं में है, इसलिए उसका राज्य अटल है।
- कर्ज का बोझ नहीं: सुसमाचार यह नहीं है कि हमें परमेश्वर का ‘कर्ज’ चुकाना है। हम कभी चुका भी नहीं सकते। सुसमाचार यह है कि परमेश्वर ने मसीह में हमें वह सब कुछ मुफ्त में दिया है जिसकी हमें ज़रूरत थी।
निष्कर्ष: विनम्रता और विस्मय
परमेश्वर का ‘स्वयं-अस्तित्व’ हमें नम्र बनाता है। यह हमें याद दिलाता है कि हम ‘सृष्टि’ हैं और वह ‘सृष्टिकर्ता’। जब हम निर्गमन 3:14 के “मैं हूँ” के सामने झुकते हैं, तो हम अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हैं और उसकी असीमित पूर्णता में विश्राम पाते हैं।
आज के लिए मनन और प्रार्थना
आज अपनी सेवा और प्रार्थना के पीछे के उद्देश्यों पर विचार करें। क्या आप परमेश्वर को “प्रभावित” करने की कोशिश कर रहे हैं या आप उसकी पूर्णता का आनंद ले रहे हैं?
प्रार्थना:
“हे ‘अल्फा और ओमेगा’, तू जो स्वयं में पूर्ण और महान है, मैं तेरी आराधना करता हूँ। धन्यवाद कि तुझे मेरी ज़रूरत न होने पर भी तूने मुझे चुना और मुझसे प्रेम किया। मुझे यह समझने में मदद कर कि मेरा जीवन तुझ पर निर्भर है, लेकिन तेरा अस्तित्व मुझ पर नहीं। मुझे अपनी स्व-धार्मिकता से छुड़ा और अपनी असीमित कृपा में जीना सिखा। यीशु के नाम में, आमीन।”