
एकके छात्र के रूप में, जब आप धर्मशास्त्र के गहरे सागर में उतरते हैं, तो सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह होती है कि एक “असीम” (Infinite) परमेश्वर और एक “समीम” (Finite) मनुष्य के बीच संवाद कैसे संभव है? परमेश्वर, जो ‘आत्मा’ है, जो समय और स्थान से परे है, और जिसके ज्ञान की कोई थाह नहीं है, वह अपने आप को हम मिट्टी के पुतलों पर कैसे प्रकट करता है? इसका उत्तर हमें ‘मानवरूपक भाषा’ (Anthropomorphism) के अद्भुत सिद्धांत में मिलता है।
निर्गमन 33:20-23 एक ऐसा गद्यांश है जहाँ यह भाषाई और धर्मशास्त्रीय रहस्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचता है। यहाँ हम देखते हैं कि परमेश्वर मूसा से अपने “चेहरे”, अपने “हाथ” और अपनी “पीठ” के बारे में बात कर रहा है।
“फिर उसने कहा, ‘तू मेरे मुख का दर्शन नहीं कर सकता; क्योंकि मनुष्य मेरे मुख का दर्शन करके जीवित नहीं रह सकता।’ फिर यहोवा ने कहा, ‘देख, मेरे पास एक स्थान है, तू उस चट्टान पर खड़ा हो; और ऐसा होगा कि जब मेरी महिमा तेरे पास होकर चले, तब मैं तुझे चट्टान की दरार में रखूँगा, और जब तक मैं पास होकर न निकल जाऊँ तब तक अपने हाथ से तुझे ढाँपे रहूँगा; फिर मैं अपना हाथ उठा लूँगा, तब तू मेरी पीठ का दर्शन पाएगा; परन्तु मेरा मुख दिखाई न देगा’।” (निर्गमन 33:20-23)
1. मानवरूपक भाषा (Anthropomorphism) क्या है?
‘मानवरूपक’ शब्द दो यूनानी शब्दों से बना है: Anthropos (मनुष्य) और Morphe (रूप)। सरल शब्दों में, यह परमेश्वर के उन वर्णनों को संदर्भित करता है जहाँ उसे मानवीय विशेषताओं, अंगों या भावनाओं के साथ दर्शाया जाता है।
जैसा कि हमने पिछले दिनों में सीखा, “परमेश्वर आत्मा है” (यूहन्ना 4:24)। उसका कोई भौतिक शरीर, मांस या हड्डियाँ नहीं हैं। फिर भी, पूरी बाइबल में हम पढ़ते हैं:
- परमेश्वर की आँखें पूरी पृथ्वी पर फिरती हैं (2 इतिहास 16:9)।
- उसके कान हमारी पुकार की ओर झुके रहते हैं (भजन 34:15)।
- उसका दाहिना हाथ सामर्थ्य से भरा है (भजन 118:16)।
- वह पछताता है या दुखी होता है (उत्पत्ति 6:6)।
क्या इसका मतलब यह है कि परमेश्वर बदल गया? नहीं। यह परमेश्वर का ‘अनुकूलन’ (Accomodation) है। जैसे एक पिता अपने छोटे बच्चे से बात करने के लिए घुटनों के बल बैठ जाता है और ‘तोतली’ भाषा में बात करता है ताकि बच्चा समझ सके, वैसे ही महान परमेश्वर हमारी सीमित मानवीय भाषा में स्वयं को ढालता है ताकि हम उसे समझ सकें।
2. निर्गमन 33 का रहस्य: चेहरा, हाथ और पीठ
निर्गमन 33:20-23 में प्रयुक्त भाषा धर्मशास्त्र के सबसे सुंदर उदाहरणों में से एक है। यहाँ मूसा परमेश्वर की ‘महिमा’ देखने की विनती करता है। परमेश्वर का उत्तर ‘मानवरूपक’ भाषा के माध्यम से तीन महत्वपूर्ण सत्य प्रकट करता है:
क) “तू मेरा मुख (Face) नहीं देख सकता”
यहाँ ‘मुख’ का अर्थ परमेश्वर का भौतिक चेहरा नहीं, बल्कि उसकी पूर्ण, नग्न और असीमित महिमा है। परमेश्वर यह कह रहा है कि एक पापी और सीमित मनुष्य उसके अस्तित्व की शुद्ध और अनंत पवित्रता को सहन नहीं कर सकता। ‘मुख’ यहाँ पूर्ण प्रत्यक्ष ज्ञान और उपस्थिति का प्रतीक है। यदि हम सूर्य को सीधे नहीं देख सकते, तो हम सूर्य के रचयिता की पूर्ण महिमा को कैसे देख सकते हैं?
ख) “मैं अपने हाथ (Hand) से तुझे ढाँपे रहूँगा”
परमेश्वर का ‘हाथ’ उसकी सुरक्षा और नियंत्रण का प्रतीक है। मूसा को चट्टान की दरार में छिपाना और उसे अपने ‘हाथ’ से ढंकना यह दर्शाता है कि परमेश्वर स्वयं हमारी रक्षा करता है ताकि हम उसकी पवित्रता की आग में भस्म न हो जाएँ। यह अनुग्रह का चित्र है—परमेश्वर स्वयं वह पर्दा बनता है जो हमें मृत्यु से बचाता है।
ग) “तू मेरी पीठ (Back) का दर्शन पाएगा”
यह सबसे दिलचस्प मानवरूपक है। क्या परमेश्वर की ‘पीठ’ होती है? आध्यात्मिक रूप से, इसका अर्थ है परमेश्वर की ‘पश्चगामी महिमा’ (Afterglow of Glory)। मूसा परमेश्वर के ‘सार’ (Essence) को नहीं देख सकता था, लेकिन वह परमेश्वर के ‘गुजर जाने के बाद के निशानों’ या उसके ‘कार्यों के प्रभाव’ को देख सकता था। हम परमेश्वर को वैसे नहीं देख सकते जैसा वह स्वयं को देखता है, लेकिन हम उसे उसके सृष्टि के कार्यों, उसके न्याय और उसके प्रेम के पदचिह्नों में पहचान सकते हैं।
3. यह भाषा आवश्यक क्यों है?
एक M.Div. छात्र के रूप में, आपको यह समझना होगा कि यदि परमेश्वर ने मानवरूपक भाषा का उपयोग नहीं किया होता, तो वह हमारे लिए एक ‘अमूर्त विचार’ (Abstract Idea) बनकर रह जाता।
- संबंधपरक ज्ञान (Relational Knowledge): यदि हम केवल यह जानते कि परमेश्वर “अपरिवर्तनीय बल” है, तो हम उससे प्रेम नहीं कर पाते। लेकिन जब हम पढ़ते हैं कि वह हमारा ‘चरवाहा’ है, उसका ‘हाथ’ हमें थामता है, तो हम उससे रिश्ता जोड़ पाते हैं।
- सत्य का संप्रेषण: मानवीय भाषा सीमित है। हमारे पास ऐसे शब्द नहीं हैं जो ‘अनंतता’ का पूर्ण वर्णन कर सकें। इसलिए, परमेश्वर “कान” शब्द का उपयोग यह बताने के लिए करता है कि वह हमारी सुनता है। वह “क्रोध” शब्द का उपयोग यह बताने के लिए करता है कि वह पाप के विरुद्ध है।
- हमारी सीमाओं का सम्मान: परमेश्वर जानता है कि हम मिट्टी के बने हैं। वह हमें धर्मशास्त्र की उन जटिलताओं से नहीं डराता जो हमारे दिमाग के बाहर हैं, बल्कि वह हमारे स्तर पर आकर बात करता है।
4. मानवरूपक भाषा का दुरुपयोग: एक चेतावनी
यहाँ एक सूक्ष्म रेखा है जिसे समझना आवश्यक है। मानवरूपक भाषा का अर्थ यह नहीं है कि हम परमेश्वर को ‘मानवकृत’ (Anthropomorphize) कर दें, यानी उसे अपने जैसा ही कमज़ोर या दोषपूर्ण मान लें।
- यदि बाइबल कहती है कि परमेश्वर “क्रोधित” होता है, तो वह मानवीय क्रोध (जो अक्सर स्वार्थ और नियंत्रण खोने से आता है) जैसा नहीं है। उसका क्रोध उसकी पवित्रता का परिणाम है।
- यदि वह “पछताता” है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसे अपनी गलती का अहसास हुआ (क्योंकि वह सर्वज्ञ है), बल्कि यह कि मनुष्य के व्यवहार के प्रति उसके सम्बन्ध में बदलाव आया है।
हमें ‘मानवरूपक भाषा’ को एक खिड़की की तरह देखना चाहिए, कैदखाने की तरह नहीं। खिड़की हमें बाहर की विशालता दिखाती है, लेकिन वह विशालता खिड़की के आकार तक सीमित नहीं होती।
5. अंतिम मानवरूपक: देहधारण (The Incarnation)
निर्गमन 33 में जो मानवरूपक केवल ‘शब्दों’ और ‘रूपकों’ में था, वह यूहन्ना 1:14 में वास्तविकता बन गया: “और शब्द देहधारी हुआ…”
यीशु मसीह परमेश्वर का अंतिम और श्रेष्ठ ‘मानवरूपक’ है। निर्गमन 33 में मूसा ने परमेश्वर की पीठ देखी थी, लेकिन यीशु के बारे में यूहन्ना कहता है, “परमेश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा; एकलौता पुत्र जो पिता की गोद में है, उसी ने उसे प्रकट किया” (यूहन्ना 1:18)।
यीशु में, परमेश्वर के पास वास्तव में हाथ थे जिनसे उसने कोढ़ियों को छुआ। उसके पास आँखें थीं जिनसे उसने यरूशलेम के लिए आँसू बहाए। उसके पास एक चेहरा था जो क्रूस पर हमारे लिए विद्रूप किया गया। अब हमें यह समझने के लिए केवल रूपकों की ज़रूरत नहीं है कि परमेश्वर कैसा है—हमें केवल यीशु को देखना है।
निष्कर्ष: अनंत का प्रेम
यह सोचना कितना विस्मयकारी है कि वह परमेश्वर, जो आकाश के आकाशों में नहीं समाता, वह हमारे “छोटे शब्दों” में समाने के लिए तैयार हो गया। वह हमारी भाषा बोलता है क्योंकि वह हमसे प्रेम करता है। वह ‘हाथ’ और ‘आंख’ जैसे शब्दों का उपयोग इसलिए करता है ताकि आप जान सकें कि आप अकेले नहीं हैं—वह आपको देख रहा है और उसने आपको थाम रखा है।
आज के लिए मनन और प्रार्थना
आज जब आप बाइबल पढ़ें, तो उन आयतों पर ध्यान दें जहाँ परमेश्वर के अंगों या भावनाओं का वर्णन है। यह न सोचें कि वह आपके जैसा सीमित है, बल्कि यह सोचें कि वह कितना महान है कि उसने आपको समझने के लिए इतना नीचे झुकना स्वीकार किया।
प्रार्थना:
“हे असीम और महिमामय परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तूने स्वयं को मुझ पर प्रकट किया। मुझे क्षमा कर यदि मैंने तुझे अपनी छोटी सोच के ढांचे में कैद करने की कोशिश की है। धन्यवाद कि तूने मूसा को चट्टान की दरार में छिपाया और आज तूने मुझे मसीह में छिपाया है। मुझे अपनी ‘पीठ’ के दर्शन दे—अर्थात मुझे अपने कार्यों और अपने प्रेम के पदचिह्नों को मेरे जीवन में देखने की समझ दे। मैं तेरी आराधना करता हूँ कि तू ‘शब्द’ होकर भी ‘देह’ बना ताकि मैं तुझे जान सकूँ। यीशु के नाम में, आमीन।”