क्या आप परमेश्वर की आत्मिकता को जानना चाहेंगे? परमेश्वर के गुण भाग – 2 Spirituality of God-hindi/ Parmeshwar ki Aatmikta

परमेश्वर की आत्मिकता- एक परिचय

परमेश्वर की आत्मिकता और मनुष्य का स्वभाव मौलिक रूप से आत्मिक है। यह तथ्य इस बात में निहित है कि हम परमेश्वर द्वारा सृजे गए हैं और हमारी रचना में ही एक गहरी, अंतर्निहित आत्मिक प्यास, एक अलौकिक लगन समाहित है। यही वह आंतरिक प्रेरणा है जिसने मानवजाति को युगों-युगों से अपने सृष्टिकर्ता, अपने परमेश्वर की खोज में लगाए रखा है। 

इस अनवरत खोज में, इंसान ने अपनी सीमित समझ के दायरे में, कभी विशाल पर्वतों में, कभी धरती की गहराई में, कभी सागर के जल में, और कभी अनंत आसमान में अपने ‘भगवान’ या ‘सृष्टिकर्ता’ की तलाश की है। इस प्रक्रिया का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि अनगिनत देवी-देवताओं, विभिन्न आस्था प्रणालियों, और असंख्य धर्मों का उदय हुआ, जिनमें से प्रत्येक किसी न किसी रूप में हमें उस अलौकिक, सर्वोच्च शक्ति से जोड़ने का दावा करता है।

परंतु, यह लेख मनुष्य की अपूर्ण और विकसित हो रही आत्मिकता की बात नहीं करता। इसका केंद्रीय विषय वह ‘आत्मिकता’ है जो स्वयं परमेश्वर का एक अपरिवर्तनीय गुण है। हम अपनी सीमित, अपूर्ण, और प्रयासों पर आधारित आत्मिकता की चर्चा को गौण रखते हुए, उस अनंत, पूर्ण, और मौलिक ‘परमेश्वर की आत्मिकता’ पर गहराई से विचार करेंगे। यह परमेश्वर के कई आवश्यक गुणों (Attributes of God) में से एक सर्वाधिक मौलिक और केंद्रीय गुण है।

जब हम ‘आत्मिक’ शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में अक्सर उच्च कोटि के संत, महान धर्मगुरु, या परमेश्वर के समर्पित सेवक जैसे बिली ग्राहम, बख्त सिंह, या साधु सुंदर सिंह जैसे नाम तुरंत आते हैं। हम में से बहुत से लोग उनके समान जीवन जीने और उनके स्तर की आत्मिकता प्राप्त करने की अभिलाषा रखते हैं, क्योंकि वे वास्तव में आत्मिक जीवन के उच्च मापदंड थे। उनकी आत्मिकता का स्तर हमारे सामान्य, संघर्षरत आत्मिक स्तर से कहीं अधिक ऊंचा था।

लेकिन हमारे आत्मिक जीवन की कुंजी यह समझना है कि अपनी आत्मिकता को जानने, विकसित करने और उसे सही दिशा देने का मार्ग परमेश्वर की आत्मिकता के ज्ञान से होकर गुजरता है। जब तक हमें परमेश्वर की आत्मिकता का सटीक और सही ज्ञान नहीं होगा, तब तक हम न तो अपनी आत्मिक यात्रा को सही दिशा दे पाएंगे और न ही वास्तव में परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप आत्मिक बन पाएंगे। इस विस्तृत विवेचन का परम उद्देश्य आपको परमेश्वर के इस मूलभूत, अनिवार्य गुण का गहन, सटीक और विस्तृत ज्ञान प्रदान करना है।

परमेश्वर की आत्मिकता

परमेश्वर की आत्मिकता क्या है? – एक गहन विश्लेषण

अब हम परमेश्वर की आत्मिकता (The Spirituality of God) के केंद्रीय और मौलिक विषय पर आते हैं। ‘परमेश्वर की आत्मिकता क्या है?’ यह प्रश्न सुनने में मानवीय संदर्भों के कारण थोड़ा अजीब लग सकता है। जैसा कि पहले स्पष्ट किया गया है, यह परमेश्वर के अपरिहार्य गुणों में से एक है, और इसका हमारे व्यक्तिगत आत्मिक जीवन की नींव से गहरा संबंध है।

मानवीय आत्मिकता और ईश्वरीय आत्मिकता में मौलिक अंतर:

जब हम अपनी आत्मिकता (Human Spirituality) की बात करते हैं, तो हम अक्सर इसे निम्नलिखित मानवीय मापदंडों से नापते और समझते हैं:

  • हमारे प्रार्थना जीवन की मात्रा और गुणवत्ता।
  • बाइबल या पवित्र वचन के ज्ञान की गहराई और उसका अध्ययन।
  • धार्मिक सभाओं और चर्च की गतिविधियों में हमारी निरंतर उपस्थिति।
  • धार्मिक कार्यों, सेवा या मिशनरी सहभागिता में हमारा योगदान।

हम इन बाहरी कार्यों को करके अक्सर यह सोचते हैं कि हम ‘अधिक आत्मिक’ बन रहे हैं। मानवीय आत्मिकता एक संघर्ष, एक प्रक्रिया, और एक विकास है।

परंतु, परमेश्वर की आत्मिकता (Spirituality of God) इन सभी मानवीय, सीमित मापदंडों से पूरी तरह परे है। यह हमारे जैसा कोई मापदंड नहीं है जिसे परमेश्वर ने प्रयास करके प्राप्त किया हो।परमेश्वर की आत्मिकता का सच्चा, बाइबिल-आधारित अर्थ:

परमेश्वर की आत्मिकता का अर्थ किसी आत्मिक अभ्यास, धार्मिक क्रिया या योग्यता से नहीं है, बल्कि स्वयं परमेश्वर के स्वरूप (Divine Nature) से है। यह गुण परमेश्वर के शरीर या भौतिक अस्तित्व से संबंधित है, या अधिक सटीक रूप से कहें तो, उसके भौतिक शरीर के न होने से संबंधित है। हमें अपने मन से यह मानवीय विचार पूरी तरह निकाल देना चाहिए कि परमेश्वर का हमारे जैसा हाड़-मांस का कोई सीमित शरीर है, क्योंकि पवित्रशास्त्र (Bible) इस विषय पर स्पष्ट रूप से मौन है और इसके विपरीत शिक्षा देता है।

परमेश्वर हैं:

  • तत्वहीन (Immaterial/Spirit): उनका कोई भौतिक पदार्थ नहीं है।
  • अभौतिक (Non-physical): उनका कोई भौतिक शरीर नहीं है।
  • अदृश्य (Invisible): उन्हें मानवीय आँखों से नहीं देखा जा सकता।
  • अनंत (Infinite/Unlimited): वे देश और काल की सीमाओं से परे हैं।

इसके विपरीत, मनुष्य भौतिक (Material), दृश्य (Visible), और सीमित (Finite) है।

परमेश्वर की आत्मिकता को बाइबिल विद्वानों ने एक ही वाक्य में संक्षेप में और परम सटीकता से परिभाषित किया है, जो उसके स्वरूप के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं को समाहित करता है:“परमेश्वर तत्वहीन या अभौतिक, अदृश्य और अनन्त हैं।”

यह कथन हमारे लिए परमेश्वर को समझने का आधारभूत स्तंभ है और हमारे स्वयं के आत्मिक जीवन की दिशा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

परमेश्वर की आत्मिकता

1. परमेश्वर तत्वहीन या अभौतिक हैं (God is Immaterial – The Essence of Spirit)

‘तत्वहीन’ (Immaterial) का अर्थ है जिसका कोई भौतिक तत्व या संरचनात्मक शरीर न हो। इसका सीधा और अचूक अर्थ यह है कि परमेश्वर का हमारे जैसा हाड़-मांस, रक्त और हड्डी का शरीर नहीं है। वे किसी तत्व, आकार या संरचना में सीमित नहीं हैं। हमें इस गलत, मानवीय-केंद्रित धारणा को त्यागना होगा कि ‘परमेश्वर भी तो हमारे समान हैं।’ यह सत्य से कोसों दूर है। परमेश्वर हमारी तरह सीमित नहीं हैं।बाइबिल से अकाट्य प्रमाण:

इस मौलिक सत्य का सबसे प्रचलित, केंद्रीय और मूलभूत प्रमाण यूहन्ना रचित सुसमाचार में मिलता है, जहाँ यीशु मसीह स्वयं सामरी स्त्री से बात करते हुए कहते हैं:“ परमेश्‍वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसकी आराधना करनेवाले आत्मा और सच्‍चाई से आराधना करें।” (यूहन्ना 4:24)

यह आयत बिना किसी संशय के स्पष्ट शब्दों में बताती है कि परमेश्वर का स्वरूप ‘आत्मा’ (Spirit) है। ‘आत्मा’ शब्द ही तत्वहीनता को दर्शाता है।

इसके आगे, यीशु मसीह ने पुनरुत्थान के बाद अपने शिष्यों को शांत करते हुए, स्वयं इस तथ्य की पुष्टि की:यीशु मसीह ने खुद कहा कि आत्मा के हड्डी और मांस नहीं होता। (लुका 24:39)

यह स्पष्टीकरण किसी भी संदेह की गुंजाइश नहीं छोड़ता कि परमेश्वर का कोई भी हाथ, पैर, या हमारे जैसा भौतिक, सीमित शरीर नहीं है। उनका स्वरूप पूर्णतः अभौतिक और आत्मिक है।

मानवरूपक भाषा (Anthropomorphic Language) की व्याख्या:

यहाँ एक महत्वपूर्ण और आवश्यक प्रश्न उठता है: यदि परमेश्वर का शरीर नहीं है, तो बाइबल में क्यों बार-बार लिखा गया है कि ‘यहोवा ने अपने बलशाली हाथ के द्वारा इस्राएलियों की अगुवाई की,’ या ‘यहोवा की आँखें सबको देखती हैं,’ या ‘परमेश्वर के कान प्रार्थना सुनते हैं’?

इसका उत्तर यह है कि बाइबल मनुष्य की सीमित समझ के अनुसार, मानवीय भाषा और अवधारणाओं का उपयोग करके लिखी गई है। इसे मानवरूपक (Anthropomorphic) या मानवाकृति भाषा कहते हैं। यह परमेश्वर की ओर से हमारे लिए एक शैक्षिक अनुकूलन है। ठीक वैसे ही, जैसे एक शिक्षक किसी छोटे बच्चे को उसकी समझ के स्तर पर आकर जटिल अवधारणाओं को समझाता है, उसी प्रकार परमेश्वर ने अपने आप को हम पर इस तरह से प्रकट किया है कि हमारी सीमित बुद्धि उनकी अनंतता को कुछ हद तक समझ सके।

मानवरूपक भाषा केवल परमेश्वर के गुणों (सामर्थ्य, ज्ञान, न्याय) को मानवीय संदर्भों में समझाने का एक साहित्यिक साधन है, न कि उनके भौतिक स्वरूप का वर्णन।

यदि हम परमेश्वर को किसी शरीर या रूप में सीमित करते हैं, तो हम दस आज्ञाओं का स्पष्ट उल्लंघन करते हैं, जिसकी शुरुआत में ही परमेश्वर ने मूसा को कठोर आज्ञा दी थी:“तू कोई मूर्त खोदकर न बनाना, न किसी की प्रतिमा बनाना जो आकाश में, वा पृथ्वी पर, वा पृथ्वी के नीचे के जल में है।” (निर्गमन 20:4)

परमेश्वर का कोई भौतिक शरीर नहीं है, और इसीलिए उन्हें किसी मूर्ति, आकार, या रूप में बांधना न केवल असंभव है बल्कि ईश्वरीय शिक्षा और उनके स्वरूप के विरुद्ध भी है।

परमेश्वर की आत्मिकता

2. परमेश्वर अदृश्य हैं (God is Invisible – The Unseeable Majesty)

चूंकि परमेश्वर तत्वहीन और अभौतिक हैं, इसका सीधा और तार्किक परिणाम यह है कि उन्हें मानवीय, भौतिक आँखों से देखा नहीं जा सकता। परमेश्वर का स्वरूप ऐसा है कि कोई भी भौतिक प्राणी उन्हें उनके पूरे महिमामय स्वरूप में सहन नहीं कर सकता।बाइबिल से अकाट्य प्रमाण:

यूहन्ना प्रेरित अपने सुसमाचार के आरंभ में स्पष्ट रूप से इस सत्य की घोषणा करते हैं:“किसी ने कभी भी परमेश्वर को नहीं देखा।” (यूहन्ना 1:18)

प्रेरित पौलुस भी इसी केंद्रीय सत्य को दृढ़ता से दोहराते हैं, जब वह परमेश्वर को ‘अदृश्य’ कहते हैं:पौलुस परमेश्वर को अदृश्य कहते हैं। (कुलुस्सियों 1:15; 1 तीमुथियुस 1:17)

1 तीमुथियुस 6:16 में, वह परमेश्वर को “अगम्य ज्योति” में वास करने वाला बताते हैं, जिसे कोई मनुष्य नहीं देख सकता और न ही कभी देखा है।यीशु मसीह – अदृश्य परमेश्वर का प्रकटीकरण (The Incarnation):

यदि परमेश्वर अदृश्य हैं, तो हम उन्हें कैसे जान सकते हैं? यूहन्ना 1:18 का उत्तर आगे बताता है कि यीशु मसीह ही हैं, जिसने उनको हम पर प्रगट किया है। इसी कारण से परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह ने इस दुनिया में शरीर धारण किया (Incarnation)। अपने जीवन, शिक्षाओं, चमत्कारों और बलिदान के द्वारा, यीशु मसीह ने अदृश्य परमेश्वर के गुणों, चरित्र और प्रेम को हम पर पूर्ण रूप से प्रकट किया।

यीशु मसीह ने स्वयं कहा:“जिस ने मुझे देखा है उस ने पिता को देखा है।” (यूहन्ना 14:9)

यीशु मसीह अदृश्य परमेश्वर की “प्रतिमा” थे (कुलुस्सियों 1:15), जिन्होंने परमेश्वर के सार को दृश्य रूप में प्रस्तुत किया।आधुनिक दावों से सावधान:

यह बात पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है कि यदि कोई व्यक्ति आज यह दावा करता है कि उसने परमेश्वर को ‘भौतिक रूप’ में, हाड़-मांस के शरीर में देखा है, तो हमें बाइबिल के स्पष्ट शिक्षण के आधार पर उससे सावधान रहना चाहिए। बाइबल की शिक्षा यह है कि परमेश्वर को उनके पूर्ण ईश्वरीय स्वरूप में कोई भी मनुष्य नहीं देख सकता।महिमा और तेज में प्रकटीकरण (Theophanies):

हालांकि, परमेश्वर ने स्वयं को ‘भौतिक रूप’ में नहीं, बल्कि अपनी महिमा (Glory), अपने तेज (Brightness), या विशिष्ट दृश्य प्रतीकों के रूप में प्रगट किया है। इन प्रकटीकरणों को थिओफनी (Theophany) कहा जाता है। इन अनुभवों में परमेश्वर की उपस्थिति का अनुभव हुआ है, लेकिन किसी ने उनके पूर्ण, अनंत, और अदृश्य स्वरूप को नहीं देखा (जैसे मूसा के साथ हुआ था – निर्गमन 33:18-23, जहाँ परमेश्वर ने अपनी पीठ दिखाई, लेकिन चेहरा नहीं)।

  • यहोवा का दूत (Angel of the Lord): बाइबल में कई जगह ‘यहोवा का दूत’ (Angel of the Lord) का उल्लेख मिलता है, जिसने मनुष्य का रूप धारण किया था। कई मसीही विद्वान मानते हैं कि यह ‘यहोवा का दूत’ देहधारण से पहले स्वयं यीशु मसीह थे—परमेश्वर का आत्मिक, अदृश्य स्वरूप एक दृश्य, अस्थायी रूप में प्रकट हुआ था (उत्पत्ति 19:1, 19:21; निर्गमन 3:2-4; न्यायियों 6:11-12)।

3. परमेश्वर अनन्त या असीमित हैं (God is Infinite/Unlimited – Boundless Existence)

परमेश्वर तत्वहीन और अदृश्य हैं, जिसका सबसे तार्किक और अनिवार्य परिणाम यह है कि परमेश्वर सीमित नहीं हैं, अर्थात उनकी कोई सीमा नहीं है। वे किसी भी स्थान, काल, या शक्ति के दायरे में बंधे नहीं हैं।सीमित और असीमित की तुलना और सर्वव्यापकता:

हम मनुष्य अपने शरीर में सीमित हैं। हम एक समय में केवल एक ही जगह पर हो सकते हैं (Limited by Space)। हमारा जीवन काल से बंधा है (Limited by Time)। परंतु परमेश्वर ऐसा नहीं है।

परमेश्वर हर समय (अनंत – Eternity), हर जगह (सर्वव्यापी – Omnipresence) मौजूद रहते हैं और हमेशा रहेंगे।

इस असीमितता को ही प्रायः सर्वव्यापकता (Omnipresence) के रूप में समझा जाता है। परमेश्वर हर जगह पर हैं, पर इसका मतलब यह नहीं है कि परमेश्वर हर चीज में (जैसे हर वस्तु या हर प्राणी में) हैं (Pantheism)। यह अंतर समझना बहुत जरूरी है। परमेश्वर सर्वव्यापी हैं, जिसका अर्थ है कि वे अपनी उपस्थिति (Presence), सामर्थ्य (Power), और ज्ञान (Knowledge) के साथ हर जगह मौजूद हैं, लेकिन वे किसी भी भौतिक वस्तु में बंधे नहीं हैं या किसी भौतिक वस्तु से बने नहीं हैं।“मैं सर्वव्यापी हूँ,” यहोवा कहता है (यिर्मयाह 23:24)।अन्य गुणों पर असीमितता का प्रभाव:

परमेश्वर की असीमितता (Infinity) उनके अन्य सभी गुणों को भी असीम बना देती है। यह उनकी आत्मिकता का ही विस्तार है:

  • परमेश्वर असीम हैं, इसलिए उनका ज्ञान (Omniscience) असीमित है।
  • परमेश्वर असीम हैं, इसलिए उनकी सामर्थ्य (Omnipotence) असीमित है।
  • परमेश्वर असीम हैं, इसलिए उनकी पवित्रता असीमित है।
  • परमेश्वर असीम हैं, इसलिए उनका प्रेम और दया असीमित है।

सारांश और निष्कर्ष:

कैसा महान, तत्वहीन, अभौतिक, अदृश्य, और असीमित परमेश्वर है! उनकी आत्मिकता हमें सिखाती है कि हमारी आराधना किसी मूर्ति या सीमित रूप को नहीं, बल्कि एक अनंत आत्मा को समर्पित होनी चाहिए। यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि ऐसे महान, असीमित परमेश्वर ने स्वयं को अपने पुत्र यीशु मसीह के द्वारा हम सीमित मनुष्यों पर प्रकट किया। ऐसे परमेश्वर को जानना, आत्मा और सच्चाई से उनकी आराधना करना, और उनके स्वरूप के अनुरूप आत्मिक जीवन जीना ही जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य और उद्देश्य है।

इस विस्तृत विवेचन से आपको परमेश्वर की आत्मिकता (Spirituality of God) और उनके मूलभूत गुणों के बारे में गहन और सटीक ज्ञान मिला होगा, जो आपके व्यक्तिगत आत्मिक विकास के लिए आधार प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ): परमेश्वर की आत्मिकता

Resource:

The Spirituality of God

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