
कल हमने ‘मसीह का मन रखने’ के अद्भुत विशेषाधिकार के बारे में सीखा। आज हम एक ऐसे विषय पर बात करेंगे जिसे अक्सर मसीही जीवन में कठिन माना जाता है, लेकिन यह मसीह के साथ हमारी घनिष्ठता का सबसे गहरा प्रमाण है—उसके दुखों में सहभागिता।
जब हम मसीह के मन और स्वभाव को अपनाते हैं, तो संसार हमारे प्रति वैसा ही व्यवहार कर सकता है जैसा उसने यीशु के साथ किया था। लेकिन बाइबल इसे एक त्रासदी नहीं, बल्कि एक ‘सम्मान’ के रूप में देखती है।
प्रेरित पतरस, जिन्होंने स्वयं मसीह के लिए बहुत दुख सहा था, हमें एक क्रांतिकारी दृष्टिकोण देते हैं:
“परन्तु जैसे-जैसे मसीह के दुखों में सहभागी होते हो, वैसे-वैसे आनन्द करो; जिससे उसकी महिमा के प्रगट होने के समय भी तुम बहुत ही आनन्दित और मगन हो।” (1 पतरस 4:13)
1. “मसीह के दुखों में सहभागी” (Fellowship of His Sufferings)
इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें अपने पापों की सजा भुगतनी है (वह यीशु ने पहले ही भुगत ली है)। इसका अर्थ है:
- सत्य के लिए विरोध: जब हम मसीह के मूल्यों के कारण तिरस्कार, मज़ाक या नुकसान सहते हैं।
- मसीह जैसा स्वभाव: जब हम बदला लेने के बजाय क्षमा करते हैं, तो वह भी एक प्रकार का ‘दुख’ है क्योंकि हमारा अहंकार मरता है।
- पहचान: दुख हमें मसीह के और करीब लाता है। हम उसे तब सबसे बेहतर समझते हैं जब हम उस रास्ते पर चलते हैं जिस पर वह चला था।
2. “वैसे-वैसे आनन्द करो” (Rejoice)
यह दुनिया के तर्क के विपरीत है। दुख में कोई आनंद कैसे कर सकता है?
- उद्देश्यपूर्ण दुख: यह दुख व्यर्थ नहीं है। यह हमारे चरित्र को शुद्ध करता है और हमें स्वर्ग के लिए तैयार करता है।
- पवित्र आत्मा की उपस्थिति: पतरस आगे कहते हैं कि जब हम मसीह के नाम के लिए बदनाम होते हैं, तो “महिमा का आत्मा” हम पर छाया रहता है। वह शांति जो समझ से परे है, केवल इसी समय महसूस की जा सकती है।
3. महिमा का आश्वासन
आज का दुख और आने वाली महिमा के बीच एक सीधा संबंध है।
- अनंत परिप्रेक्ष्य: आज की छोटी सी पीड़ा उस अनंत महिमा के सामने कुछ भी नहीं है जो हमें मिलने वाली है।
- मसीह के साथ राज्य करना: यदि हम उसके साथ दुख उठाते हैं, तो हम उसके साथ राज्य भी करेंगे (2 तीमुथियुस 2:12)।
4. इसका आपके जीवन के लिए क्या अर्थ है?
- हैरान न हों: यदि लोग आपके विश्वास के कारण आपको नापसंद करते हैं या आपका मज़ाक उड़ाते हैं, तो डरे नहीं। यह इस बात का प्रमाण है कि आप मसीह के हैं।
- दृष्टिकोण बदलें: अपनी मुश्किलों को ‘सजा’ के रूप में न देखें, बल्कि मसीह के साथ ‘संगति’ करने के अवसर के रूप में देखें। पूछें, “प्रभु, इस परिस्थिति में मैं तेरे स्वभाव को कैसे प्रकट करूँ?”
- गहरा रिश्ता: जैसे एक सैनिक अपने सेनापति के साथ युद्ध के मैदान में सबसे गहरा रिश्ता बनाता है, वैसे ही हम मसीह के साथ ‘दुखों की भट्टी’ में सबसे अधिक करीब होते हैं।
निष्कर्ष
यीशु मसीह ‘दुख उठाने वाले सेवक’ थे। जब हम उनके पीछे चलते हैं, तो काँटे मिलना स्वाभाविक है। लेकिन याद रखें, जहाँ काँटे हैं, वहीं वह ‘चरवाहा’ भी है। आज अपने दुखों को मसीह के चरणों में रखें और उस ‘आनंद’ को मांगें जो केवल उसकी उपस्थिति से मिलता है।
आज के लिए मनन और प्रार्थना
आज प्रेरितों के काम 5:40-41 पढ़ें, जहाँ चेले कोड़े खाने के बाद ‘आनंद करते हुए’ निकले कि वे मसीह के नाम के लिए योग्य ठहरे।
प्रार्थना:
“हे प्रभु यीशु, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तूने मेरे लिए सबसे बड़ी पीड़ा सही। प्रभु, मुझे वह साहस और अनुग्रह दे कि जब मैं तेरे नाम के कारण दुख या विरोध सहूँ, तो मैं निराश न होऊँ बल्कि आनंद करूँ। मुझे अपनी संगति की गहराई का अनुभव करा। मेरी मुश्किलों के बीच तेरी महिमा का आत्मा मुझ पर बना रहे। मुझे तेरे पदचिन्हों पर चलने के योग्य बना। आमीन।”