
यीशु मसीह के आख़िरी वचन
यीशु मसीह के क्रूस पर कहे गए आखिरी वचन न केवल ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि गहन आत्मिक और धार्मिक अर्थ भी रखते हैं। यह एक सर्वमान्य मानवीय समझ है कि जब कोई व्यक्ति मृत्यु के कगार पर होता है, तो उसके मुख से निकले शब्द उसके हृदय की सबसे सच्ची और अंतिम भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसा माना जाता है कि मृत्यु के समय व्यक्ति झूठ नहीं बोलता, बल्कि अपने जीवन के सार और अंतिम संदेश को प्रकट करता है।
इतिहास में कई महान व्यक्तित्वों ने अपने अंतिम क्षणों में ऐसे ही मर्मस्पर्शी वचन कहे हैं। उदाहरण के लिए, फ्रांस के प्रसिद्ध सैन्य जर्नल नेपोलियन बोनापार्ट ने अपनी मृत्यु से पहले कहा था, “मैं अपने समय से पहले मर रहा हूँ और मेरा शरीर वापस मिट्टी में लौट जाएगा—यह उस मनुष्य की किस्मत है जिसे हम महान नेपोलियन कहते हैं।”
इसी तरह, यीशु मसीह के क्रूस पर आखिरी वचन उनके जीवन, शिक्षा और बलिदान के शिखर को दर्शाते हैं। ये सात अनमोल वाक्य हमें पवित्रशास्त्र की चार सुसमाचार की किताबों—मत्ती, मरकुस, लूका, और यूहन्ना—में मिलते हैं। ये वे क्षण थे जब, आकाश और धरती के बीच क्रूस पर लटका हुआ, यीशु का शरीर खून से लथपथ था, और उनके हाथों तथा पैरों में कीलें ठोंकी हुई थीं। ये वचन उस अकल्पनीय शारीरिक पीड़ा और आत्मिक संघर्ष के बीच भी, उनके परम प्रेम और करुणा को प्रकट करते हैं।
आज, हम यीशु मसीह के क्रूस पर कहे गए इन आखिरी वचनों का गहराई से अध्ययन करेंगे। यह वे वचन हैं जिन्हें सारा संसार विशेष रूप से गुड फ्राइडे के दिन याद करता है। हालाँकि, मेरा दृढ़ विश्वास है कि प्रभु के इन वचनों को केवल एक वार्षिक अनुष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि हर दिन, हर पल याद रखना चाहिए और अपने जीवन में उतारना चाहिए।
हम इन सात वचनों का एक-एक करके विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह लेख शायद थोड़ा विस्तृत हो सकता है, लेकिन यह हमारी आत्मिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक है। दुख की बात है कि आज के समाज में, परमेश्वर के वचन को अक्सर एक खेल या व्यक्तिगत व्याख्या का विषय बना दिया गया है। लोग अपनी सुविधानुसार परमेश्वर के वचनों की मनमानी व्याख्या करते हैं। इन क्रूस के वचनों के साथ भी कई लोग ऐसा ही करेंगे। इसलिए, आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप इन वचनों को ध्यान से और मनन करते हुए पढ़ें, ताकि आप यीशु मसीह के क्रूस पर कहे गए आखिरी वचनों के सही और गहरे अर्थ को समझ सकें।

यीशु मसीह के क्रूस पर आखिरी पहला वचन: क्षमा का महासागर
यीशु मसीह के क्रूस पर कहे गए आखिरी वचनों में से सबसे पहला और सबसे शक्तिशाली वचन हमें लूका रचित सुसमाचार में मिलता है।
लूका 23:34: “तब यीशु ने कहा, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहे हैं।”
कलवरी के क्रूस पर यीशु मसीह द्वारा कहा गया यह पहला वाक्य उनकी दिव्य करुणा और असीम प्रेम का चरम प्रदर्शन है। उस समय यीशु दो अपराधियों के बीच क्रूस पर लटक रहे थे। वे सिपाही जिन्होंने उन्हें क्रूस पर चढ़ाया था, उनका मज़ाक उड़ा रहे थे, उन्हें कोड़े मारे थे, उनके मुँह पर थूका था, और उन्हें हर तरह से सताया था—प्रभु यीशु मसीह ने उन सब को याद किया होगा।
इसके अलावा, उन्होंने अपने उन शिष्यों को भी याद किया होगा जो उन्हें छोड़कर भाग गए थे, और विशेष रूप से पतरस को, जिसने तीन बार उनका इनकार किया था। उन्होंने उस भीड़ को भी याद किया होगा जिसने कुछ ही दिन पहले “होशाना” कहते हुए उनका स्वागत किया था, और फिर पाखंड के साथ “इसे क्रूस पर चढ़ाओ!” कहकर शोर मचाया था। इससे भी बढ़कर, यीशु मसीह ने आपको और मुझे भी याद किया होगा, जो अक्सर अपने स्वार्थ और सांसारिक मोह के कारण हर दिन उन्हें भूल जाते हैं या उनका अनादर करते हैं।
क्या उस असहनीय दर्द और पीड़ा के क्षण में यीशु क्रोधित थे? बिल्कुल नहीं! हम मनुष्य जरूर क्रोधित होते, प्रतिशोध की भावना रखते, लेकिन यहाँ हम देखते हैं कि यीशु मसीह का प्रेम, उनकी ईश्वरीय करुणा, विजयी हुई। जब यीशु मसीह शारीरिक रूप से अत्यधिक दुःख और दर्द में थे, तब भी उन्होंने स्वर्गिक पिता से अपने सताने वालों को क्षमा करने की विनती की। कैसा अद्भुत और अकल्पनीय प्रेम! ज़रा सोचिए, उस पिता के हृदय पर क्या बीत रही होगी जिसका एकलौता पुत्र, अपनी जान देते हुए, अपने हत्यारों के लिए क्षमा माँग रहा था।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि यीशु मसीह के स्वयं के बलिदान ने ही हमारी क्षमा को प्रभावी बनाया है। यह वचन केवल एक प्रार्थना नहीं थी; यह उनकी शिक्षाओं का सार था। यीशु मसीह ने धरती पर रहते हुए लगातार क्षमा का प्रचार किया था:
- शिष्यों की प्रार्थना में: प्रभु ने शिष्यों को सिखाया कि वे अपनी प्रार्थना में क्षमा माँगें, ठीक वैसे ही जैसे वे अपने कर्जदारों को क्षमा करते हैं (मत्ती 6:12)।
- क्षमा की सीमा: जब पतरस ने पूछा कि उसे अपने भाई को कितनी बार क्षमा करना चाहिए, तो यीशु ने सिखाया: “सात के सत्तर गुना” (मत्ती 18:21-22), जिसका अर्थ है असीमित क्षमा।
- पापों की क्षमा: यीशु मसीह ने लकवे के रोगी के पापों को क्षमा किया था (मरकुस 2:3-12), यह दर्शाते हुए कि उन्हें पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार है।
- नई वाचा: अंतिम भोजन के समय, प्रभु ने प्याला लेकर कहा कि यह उनके लहू की नई वाचा है, जो बहुतों की क्षमा के लिए बहाया जाता है (मत्ती 26:27-28)।
- मृत्यु के बाद की आज्ञा: मुर्दों में से जी उठने के बाद भी, प्रभु यीशु मसीह ने अपने चेलों को क्षमा करने और क्षमा का संदेश सुनाने की आज्ञा दी (यूहन्ना 20:22-23)।
जैसा प्रभु ने सिखाया, वैसा ही उन्होंने किया भी। यीशु मसीह केवल एक महान शिक्षक ही नहीं, बल्कि क्षमा का सर्वोच्च और सबसे पवित्र उदाहरण भी हैं। उनके द्वारा कहा गया यह पहला वाक्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें सिखाता है कि हमें भी अपने जीवन में क्षमा को अपनाना है, जैसा कि प्रभु यीशु मसीह ने सिखाया है (मरकुस 11:25)। क्रूस पर भी उन्होंने सबके लिए पिता से क्षमा की दुआ की।
हमें याद रखना चाहिए कि यीशु मसीह, परमेश्वर होते हुए, मनुष्य के रूप में थे। वह क्षण भर में उन सभी को भस्म कर सकते थे जिन्होंने उन्हें सताया। लेकिन पिता के साथ उनके घनिष्ठ और प्रेममय संबंध के कारण, उन्होंने यह प्रार्थना की। इस तरह, उन्होंने यशायाह नबी की उस भविष्यवाणी को पूरा किया: “क्योंकि उसने अपना प्राण मृत्यु के लिये उण्डेल दिया, वह अपराधियों के संग गिना गया, तौभी उसने बहुतों के पाप का बोझ उठा लिया, और अपराधियों के लिये विनती करता है” (यशायाह 53:12)।
यह वचन दर्शाता है कि यीशु का बलिदान न केवल पापों का प्रायश्चित था, बल्कि क्षमा और मध्यस्थता का एक शाश्वत कार्य भी था। यह पहला वचन हमें सिखाता है कि क्षमा ही मसीही जीवन का आधार है।
यीशु मसीह के क्रूस पर आखिरी दूसरा वचन
यीशु मसीह ने क्रूस पर जो सात वचन कहे, वे उनके संपूर्ण जीवन और सेवकाई का निचोड़ हैं। इन वचनों में से, उनका दूसरा वचन विशेष रूप से अनुग्रह और आशा से भरा हुआ है। यह वचन हमें लुका रचित सुसमाचार, अध्याय 23, पद 43 में मिलता है: “मैं तुझ से सच कहता हूँ कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।”
यह वचन तब बोला गया जब यीशु मसीह अपने अंतिम क्षणों में थे, क्रूस पर असहनीय पीड़ा सह रहे थे, लेकिन उनका ध्यान फिर भी दूसरों पर था।पृष्ठभूमि और घटना का विवरण
जब यीशु मसीह को क्रूस पर चढ़ाया गया था, तब उनके साथ दो डाकुओं को भी क्रूस पर चढ़ाया गया था। इस भयंकर दृश्य में, हमें मनुष्य के हृदय की दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलती हैं।
- उपहास और निंदा: उन दो डाकुओं में से एक, अपनी पीड़ा में भी, यीशु मसीह का मजाक उड़ा रहा था। वह यहूदी अगुवों और सैनिकों की तरह ही बहकी बातों में आकर, यीशु पर दोष लगा रहा था और उनसे कह रहा था कि यदि वह मसीह है, तो अपने आप को और उन्हें बचाए। उसका हृदय कठोर था, और वह अपनी मृत्यु से भी कोई सबक नहीं सीख रहा था। यह व्यवहार उस ‘लोहोन’ (शायद ‘लुटेरे’ या ‘अधर्मी’ का संदर्भ) की तरह था जो केवल अपने स्वार्थ के लिए यीशु को चुनौती दे रहा था।
- पश्चात्ताप और विश्वास: इसके विपरीत, दूसरा डाकू एक चमत्कारी परिवर्तन का अनुभव कर रहा था। उसने अपने साथी को डांटा और कहा, “क्या तू परमेश्वर से नहीं डरता? तू तो उसी दण्ड में है। और हम तो न्याय से दण्ड पा रहे हैं, क्योंकि हम ने अपने कामों का ठीक फल पाया है; पर इस ने कुछ भी अनुचित नहीं किया है।” (लूका 23:40-41)। इस डाकू ने:
- अपनी पापमयता को स्वीकारा: उसने समझा कि वह अपनी सजा का हकदार है।
- यीशु की निर्दोषता को पहचाना: उसने महसूस किया कि यीशु मसीह, जो पीड़ा सह रहे थे, निर्दोष हैं।
- यीशु पर विश्वास किया: उसने पश्चात्ताप किया और तुरंत विश्वास में आकर यीशु से विनती की, “हे यीशु, जब तू अपने राज्य में आए, तो मुझे याद करना।” (लूका 23:42)।
यीशु का आश्चर्यजनक उत्तर
डाकू की यह प्रार्थना एक अद्भुत विश्वास का प्रदर्शन थी। वह शायद इस उम्मीद में था कि यीशु भविष्य में, जब अपना स्वर्गीय या पार्थिव राज्य स्थापित करेंगे, तब उसे याद करेंगे और उसके जीवन को बहाल करेंगे। उसकी प्रार्थना में भविष्य की आशा थी।
लेकिन यीशु मसीह ने उसकी सोच से कहीं बढ़कर उत्तर दिया। उन्होंने ‘कल’ या ‘भविष्य’ की बात नहीं की, बल्कि ‘आज’ की बात की। यीशु ने उससे कहा: “मैं तुझ से सच कहता हूँ कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।”
यह वचन अनुग्रह की शक्ति को दर्शाता है। डाकू ने न तो बपतिस्मा लिया था, न धार्मिक कर्मकाण्ड पूरे किए थे, न ही उसे चर्च का सदस्य होने का अवसर मिला था। उसने केवल क्रूस पर लटके हुए, अपने जीवन के अंतिम क्षणों में, हृदय से पश्चात्ताप किया और यीशु पर विश्वास किया। और यीशु ने उसे तत्काल क्षमा और स्वर्ग का आश्वासन दे दिया।”स्वर्गलोक” (Paradise) का अर्थ
यीशु ने जिस “स्वर्गलोक” (Paradise/फिरदौस) का उल्लेख किया, वह एक फ़ारसी शब्द है जिसका अर्थ होता है “सुख का बाग”।
- पुराने नियम के ग्रीक अनुवाद (‘सेप्टुआजेंट’) में, ‘अदन के बाग’ के लिए भी इसी शब्द का इस्तेमाल किया गया है। यह शब्द परमेश्वर की उपस्थिति, आनंद और शांति के स्थान को दर्शाता है।
- नए नियम में भी, यह शब्द परमेश्वर के साथ रहने के अंतिम स्थान को इंगित करता है (2 कुरिन्थियों 12:3-4; प्रकाशितवाक्य 2:7)।
यीशु के इस आश्वासन का अर्थ था कि उस दिन, मरते ही, डाकू सीधे परमेश्वर के आनंदमय और शांतिपूर्ण उपस्थिति के स्थान में प्रवेश करेगा।इस वचन का गहरा धार्मिक महत्व
यह दूसरा वचन न केवल डाकू के लिए, बल्कि हमारे लिए भी महान धार्मिक सच्चाइयाँ प्रकट करता है:
- परमेश्वर की क्षमा की परिपूर्णता और तत्परता: यह घटना दर्शाती है कि प्रभु यीशु मसीह को क्षमा करने में कितना आनंद आता है। उनकी क्षमा पूर्ण है और तत्काल प्रदान की जाती है। डाकू को कोई लंबित अवधि (Purgatory) में इंतजार नहीं करना पड़ा। यह हमें प्रोत्साहित करता है कि हम भी बिना किसी देरी के उसके पास आएं और अपने पापों से क्षमा माँगे। प्रभु यीशु मसीह क्षमा करने में विश्वासयोग्य और धर्मी हैं (1 यूहन्ना 1:9)।
- मनुष्य की योग्यता से परे अनुग्रह: यह वचन स्पष्ट करता है कि उद्धार हमारे अच्छे कार्यों या धार्मिक अनुष्ठानों पर निर्भर नहीं है, बल्कि केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने से मिलता है। डाकू के पास क्रूस पर लटके रहने के सिवा और कुछ नहीं था—सिवाय एक पश्चातापी हृदय के।
- यीशु मसीह के परमेश्वर होने का प्रमाण: जब यीशु मसीह क्रूस पर लटका हुआ था, वह अपनी मनुष्यता में पीड़ा सह रहा था, लेकिन वह पूर्ण परमेश्वर भी था। यीशु ने उसी समय उस पापी डाकू की प्रार्थना को न केवल सुना, बल्कि उसे क्षमा किया और उसे स्वर्गलोक में प्रवेश का अधिकार भी दिया। केवल परमेश्वर ही पाप क्षमा कर सकता है और मृत्यु के बाद जीवन का वादा कर सकता है। यह घटना यीशु के दिव्य अधिकार को एक और बार दृढ़ता से स्थापित करती है।
इस प्रकार, यीशु मसीह का क्रूस पर दूसरा वचन एक शाश्वत गवाही है कि परमेश्वर का अनुग्रह इतना विशाल है कि वह सबसे बड़े पापी को भी, उसके जीवन के अंतिम क्षण में भी, केवल विश्वास के आधार पर, तत्काल क्षमा और उद्धार प्रदान करता है।
यीशु मसीह के क्रूस पर आखिरी तीसरा वचन
क्रूस पर यीशु के सात वचन: तीसरा वचन – देखभाल का वचन
यीशु मसीह के क्रूस पर कहे गए सात महत्वपूर्ण वचनों में से तीसरा वचन, जो हमें यूहन्ना रचित सुसमाचार के 19वें अध्याय के 26वें और 27वें पद में मिलता है, वह न केवल गहरा प्रेम, बल्कि कर्तव्यपरायणता और भविष्य की चिंता को भी दर्शाता है।
यूहन्ना 19:26-27:जब यीशु ने अपनी माता, और उस चेले को जिससे वह प्रेम रखता था पास खड़े देखा तो अपनी माता से कहा, “हे नारी, देख, यह तेरा पुत्र है।” तब उसने चेले से कहा, “यह तेरी माता है।” और उसी समय से वह चेला उसे अपने घर ले गया।
यह दृश्य सचमुच ही हृदय को छू लेने वाला है। सुसमाचार की शुरुआत में ही हम यीशु मसीह और उसकी माता मरियम को एक साथ देखते हैं – विवाह की काना में (यूहन्ना 2)। और अब, जब यीशु मसीह अपनी सांसारिक सेवकाई के अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण क्षण, यानी क्रूस पर, अपनी चरम पीड़ा में हैं, तब भी हम उन्हें अपनी माता के साथ पाते हैं। यह संयोग नहीं, बल्कि एक गहरा, दिव्य आयोजन था।पीड़ा में भी प्रेम और कर्तव्य
यह समझना कठिन है कि यीशु मसीह इतनी भीषण शारीरिक और आत्मिक पीड़ा के बीच भी अपनी माता को पहचान सके और उनकी देखभाल का प्रबंध कर सके। ज़रा कल्पना कीजिए:
- शारीरिक दर्द: यीशु का पूरा शरीर असहनीय दर्द से कराह रहा था। कोड़े मारे जाने के घाव, काँटों का ताज, कीलों की टीस और साँस लेने की हर कोशिश में होने वाली यातना—यह सब मिलकर उन्हें ऐसी पीड़ा दे रहे थे जिसकी तुलना हम अपने सामान्य सिरदर्द या दाँत के दर्द से कर ही नहीं सकते, जो हमें छोटी-सी बात पर भी चिड़चिड़ा बना देता है और सब कुछ भुला देता है।
- आत्मिक पीड़ा: इससे भी बड़ी पीड़ा वह थी जब जगत के सारे पापों का बोझ उन पर डाला गया और उन्हें पिता परमेश्वर से अलग होने का अनुभव हुआ।
इन सबके बावजूद, यीशु मसीह ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को अपनी माता की भावी सुरक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी के आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा के साथ निभाया। यह वचन हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम और कर्तव्यपरायणता सबसे कठिन परिस्थितियों में भी अपना रास्ता खोज लेते हैं।मरियम का हृदय-विदारक दुःख
इस क्षण मरियम की भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। एक माँ के लिए, अपने बेटे को इस तरह, एक मुजरिम की तरह, क्रूस पर लटका हुआ देखना, शायद मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक था। जब आप अपने बेटे के बारे में कोई छोटी-सी बुरी बात भी नहीं सुन सकतीं, तो आँखों के सामने उसे ऐसी क्रूर यातना झेलते देखना कैसा होगा?
पुराने नियम में भविष्यद्वक्ता शमौन ने मरियम से कहा था, “एक तलवार तेरे प्राण को भी बेधेगी” (लूका 2:35)। इस समय वह भविष्यद्वाणी पूरी हो रही थी। मरियम का हृदय सचमुच में दुःख की तलवार से बेधा जा रहा था।
यदि मरियम के हाथ में होता, तो शायद वह स्वयं अपने बेटे की जगह ले लेती। परन्तु यीशु मसीह जानते थे कि यह बलिदान देना आवश्यक था। जगत के उद्धार का मार्ग खोलने के लिए उनका क्रूस पर मरना अनिवार्य था।यूहन्ना की विश्वासयोग्यता और आज्ञाकारिता
यीशु मसीह ने इस देखभाल का जिम्मा अपने सबसे प्रिय और विश्वासयोग्य चेले यूहन्ना को सौंपा। यूहन्ना ने इस जिम्मेदारी को तत्परता से स्वीकार किया।
यीशु के वचन थे:
- माता से: “हे नारी, देख, यह तेरा पुत्र है।” (अब यूहन्ना तुम्हारा पुत्र है।)
- यूहन्ना से: “यह तेरी माता है।” (अब मरियम तुम्हारी माँ है।)
यूहन्ना ने यीशु मसीह के इन वचनों का उसी समय पालन किया। पद 27 कहता है: “और उसी समय से वह चेला उसे अपने घर ले गया।” यह ‘उसी समय’ दिखाता है कि यूहन्ना ने आज्ञा मानने में कोई देर नहीं की। क्रूस के पैरों से ही, उसने मरियम का ख्याल रखना शुरू कर दिया। यह यूहन्ना की परमेश्वर के प्रति और मसीह के परिवार के प्रति अटूट विश्वासयोग्यता का प्रमाण है।हमारे लिए सीख
यीशु का यह तीसरा वचन आज भी हमारे जीवन में गहरा अर्थ रखता है:
- माता-पिता के प्रति कर्तव्य: क्या हम आज भी, यीशु की तरह, अपने माता-पिता के प्रति ऐसी ही प्रेम और देखभाल की भावना रखते हैं? क्या हम उनकी बुढ़ापे में या उनकी पीड़ा के समय उनकी देखभाल की जिम्मेदारी लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे यीशु ने क्रूस की यातना के बीच भी किया?
- मसीही समुदाय के प्रति जिम्मेदारी: यीशु ने अपनी माता को एक चेले के हाथ सौंपा, जिससे यह शिक्षा मिलती है कि हमें मसीही समुदाय के रूप में भी एक-दूसरे की देखभाल करनी चाहिए। क्या हम अपने भाई-बहनों और विशेष रूप से ज़रूरतमंद लोगों के प्रति विश्वासयोग्य हैं? क्या हम उनकी ‘माँ’ या ‘पुत्र’ बनने के लिए तैयार हैं जब उन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो?
- तुरंत आज्ञाकारिता: यूहन्ना की तरह, क्या हम परमेश्वर की आज्ञाओं को ‘उसी समय’ पालन करने के लिए तैयार हैं, बिना किसी बहाने या विलंब के?
यह वचन हमें सिखाता है कि क्रूस केवल एक बलिदान का स्थान नहीं था, बल्कि प्रेम, देखभाल और अटूट कर्तव्यनिष्ठा का भी प्रतीक था। यीशु ने न केवल जगत को बचाया, बल्कि अपने सबसे प्रियजनों की देखभाल की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित की।
यीशु मसीह के क्रूस पर आखिरी चौथा वचन
क्रूस पर यीशु मसीह का चौथा वचन: “तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?”
यीशु मसीह के क्रूस पर कहे गए सात अंतिम वचनों में से चौथा वचन विशेष रूप से गहरा और मार्मिक है। यह वचन हमें मत्ती (27:46) और मरकुस (15:34) द्वारा लिखे गए सुसमाचारों में मिलता है।
वचन का विवरण और संदर्भ:
मत्ती 27:46 और मरकुस 15:34 में यह वचन दर्ज है:
“तीसरे पहर के निकट यीशु ने बड़े शब्द से पुकारकर कहा, “एली, एली, लमा शबक्तनी?” अर्थात् “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?”
यह घटना ‘तीसरे पहर’ के निकट घटी, जिसे दोपहर तीन बजे के आसपास माना जाता है। यह वह समय था जब क्रूस पर तीन घंटे के अलौकिक अंधकार के बाद उजाला वापस आया था। अंधकार का यह समय उस भयावहता और न्याय को दर्शाता था जो परमेश्वर पाप पर डाल रहा था। इसी अंधकार और उसके ठीक बाद, यीशु मसीह ने इन शब्दों को ऊँचे स्वर में पुकारा।
गहन अलगाव की पीड़ा:
ये शब्द यीशु मसीह के मनुष्य वाले हृदय से निकल रहे थे, जो उस समय के भीषण आत्मिक और भावनात्मक अलगाव को व्यक्त कर रहे थे।
- पाप के कारण अलगाव: यीशु मसीह, जो पूरी तरह से निष्पाप और पवित्र थे, उस समय संपूर्ण मानवता के पापों का बोझ अपने ऊपर उठा रहे थे। बाइबल सिखाती है कि परमेश्वर की आँखें इतनी पवित्र हैं कि वह पाप को सह नहीं सकता (हबक्कूक 1:13)। उस क्षण, हमारे समस्त पापों ने, एक न्यायी परमेश्वर के रूप में पिता और पुत्र के बीच एक अभेद्य दीवार खड़ी कर दी थी। यह वही दीवार थी जिसे यीशु क्रूस पर तोड़ रहे थे, लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें पहले उस अलगाव को सहना पड़ा।
- पिता का न्याय: प्रभु यीशु ने अपनी सेवकाई की शुरुआत से लेकर क्रूस के पहले के वचनों तक परमेश्वर को हमेशा ‘पिता’ (Pia) कहकर संबोधित किया था, जो गहरे प्रेम और घनिष्ठता का सूचक था। परंतु इस चौथे वचन में, उन्होंने परमेश्वर को ‘हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर’ (Eli, Eloi) कहकर पुकारा। यह संबोधन उस समय पिता की ‘न्यायी’ की भूमिका को दर्शाता है, जो पाप को दंडित कर रहा था। पुत्र के रूप में जो घनिष्ठता उन्होंने हमेशा अनुभव की थी, वह हमारे पापों के कारण क्षण भर के लिए उससे दूर हो गई थी।
- अद्वितीय अनुभव: अपनी पूरी पृथ्वी की सेवकाई में यीशु मसीह ने कभी भी पिता से अलगाव महसूस नहीं किया था। उनका सामंजस्य पूर्ण और अटूट था। लेकिन कलवरी के क्रूस पर, यीशु मसीह सबसे भयानक आत्मिक लम्हे को जी रहे थे—पूर्ण, पवित्र अलगाव।
पुराने नियम की भविष्यवाणी की पूर्ति:
यीशु मसीह का चौथा वचन कोई अचानक निकली हुई चीख नहीं थी, बल्कि यह भजन संहिता 22:1 की पहली पंक्ति थी: “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?”
यीशु मसीह ने इन शब्दों को बोलकर, अनजाने में नहीं बल्कि उद्देश्यपूर्ण तरीके से, उस भविष्यवाणी को पूरा किया जो राजा दाऊद ने लगभग 1000 वर्ष पहले ही कर दी थी। भजन 22 क्रूस की पीड़ा का एक विस्तृत और स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करता है, जिसमें न केवल यह अलगाव, बल्कि अन्य पहलू भी शामिल हैं:
- हाथों और पैरों का छिदना: भजन 22:16, “उन्होंने मेरे हाथ और मेरे पैर छेदे।”
- हड्डियों का गिनना: भजन 22:17, “मैं अपनी सब हड्डियाँ गिन सकता हूँ।”
- कपड़ों पर चिट्ठी डालना: भजन 22:18, “वे मेरे वस्त्र आपस में बाँटते हैं, और मेरे पहिरावे पर चिट्ठी डालते हैं।”
यीशु ने उस भयानक और अपरिहार्य स्थिति का सामना किया जो हमारे पापों की क्षमा और परमेश्वर के न्याय की संतुष्टि के लिए नितांत जरूरी थी।
विजय की कीमत और परिणाम:
जब यीशु मसीह ने यह अलगाव महसूस किया, तो शैतान को क्षण भर के लिए लगा होगा कि उसने जीत हासिल कर ली है—कि पुत्र परमेश्वर से अलग हो गया है। परन्तु यह अलगाव क्षणिक था, और यह परमेश्वर की महान योजना का एक अभिन्न अंग था।
हमारे पापों के भार ने पल भर के लिए हमारे उद्धारकर्ता की इंसानियत पर एक असहनीय बोझ डाला था। और यह सब परमेश्वर की पूर्व निर्धारित इच्छा और योजना के अनुसार था (इफिसियों 1:7-10)।
क्रूस पर इस चरम अलगाव को सहने का अंतिम परिणाम यह था कि:
- हमारे पापों की पूर्ण क्षमा: हमें यीशु के लहू के द्वारा छुटकारा मिला है (इफिसियों 1:7)।
- पापों से पूरी तरह से मुक्ति: “वह आप ही हमारे पापों के कारण क्रूस पर चढ़ गया, ताकि हम पापों के लिए मरकर धार्मिकता के लिए जीवित हो जाएँ।” (1 पतरस 2:24)।
यीशु का यह वचन हमें यह याद दिलाता है कि हमारे उद्धार की कीमत कितनी ऊँची थी—पुत्र ने पिता से अलगाव की पीड़ा को सहा, ताकि हम, पापियों को, अनन्तकाल के लिए परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप प्राप्त हो सके।
यीशु मसीह के क्रूस पर आखिरी पाँचवा वचन
यीशु मसीह का पाँचवाँ क्रूस वचन: ‘मैं प्यासा हूँ’ – मानवीयता की गहराई और भविष्यवाणी की पूर्ति
यीशु मसीह के क्रूस पर कहे गए सात महत्वपूर्ण वचनों में से, पाँचवा वचन गहन अर्थ रखता है और यह हमें यूहन्ना रचित सुसमाचार में मिलता है।
शास्त्रीय आधार:
यूहन्ना 19:28 इस वचन को दर्ज करता है: “इसके बाद यीशु ने यह जानकर कि अब सब कुछ पूरा हो चुका, इसलिये कि पवित्रशास्त्र में जो कहा गया वह पूरा हो, कहा, “मैं प्यासा हूँ””
मानवीय स्वभाव का प्रकटीकरण:
यह पाँचवा वचन यीशु मसीह के मानवीय स्वभाव को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। मसीही धर्मशास्त्र सिखाता है कि यीशु मसीह पूर्ण रीति से परमेश्वर थे और साथ ही पूर्ण रीति से मनुष्य भी थे। जब उन्होंने क्रूस पर, अत्यधिक शारीरिक पीड़ा के बीच, यह कहा कि “मैं प्यासा हूँ,” तो वह शरीर में होने के कारण होने वाली एक मूलभूत मानवीय आवश्यकता को व्यक्त कर रहे थे।
क्रूस का भयानक अनुभव, जिसमें चाबुक की मार, काँटों का मुकुट, और लगातार खून बहना शामिल था, यीशु के शरीर को शारीरिक कमजोरी और सदमे की स्थिति में ले जा रहा था। निर्जलीकरण (Dehydration) की अत्यधिक पीड़ा एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया थी। इस वचन के माध्यम से, हम देखते हैं कि यीशु मसीह ने अपनी देवत्व को त्याग नहीं दिया, लेकिन उन्होंने स्वेच्छा से हमारी खातिर पूरी तरह से मानवीय पीड़ा को सहा।
पवित्रशास्त्र की भविष्यवाणी की पूर्ति:
यूहन्ना स्पष्ट करता है कि यीशु ने यह वचन इसलिए कहा “कि पवित्रशास्त्र में जो कहा गया वह पूरा हो।” यह वचन भजन संहिता 69:21 की भविष्यवाणी को पूरा करता है, जिसमें लिखा है: “वे मेरे भोजन में विष मिलाते हैं, और मेरी प्यास बुझाने के लिये मुझे सिरका पिलाते हैं।” इस प्रकार, यीशु मसीह न केवल एक साधारण मनुष्य की तरह प्यास महसूस कर रहे थे, बल्कि वह जानबूझकर उन शास्त्रीय भविष्यवाणियों को पूरा कर रहे थे जो उनके दुख के बारे में सदियों पहले लिखी गई थीं।
सहानुभूति और तसल्ली का स्रोत:
यह वचन हमें इब्रानियों की पुस्तक के लेखक की शिक्षाओं की याद दिलाता है। यीशु मसीह का यह मानवीय अनुभव इस बात का प्रमाण है कि वह हमारी सारी जरूरतों और मुश्किलों को समझते हैं।
- इब्रानियों 2:18 हमें बताता है: “इसलिये कि वह आप परीक्षा की दशा में दुःख उठाकर, परखा गया, वह उन की भी सहायता कर सकता है, जिन की परीक्षा होती है।”
- इब्रानियों 4:15-16 पुष्टि करता है: “क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके; वरन् वह सब बातों में हमारे समान परखा गया, तौभी निष्पाप निकला। इसलिये आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्धकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ, जो अवसर पर हमारी सहायता करे।”
जब यीशु ने कहा “मैं प्यासा हूँ,” तो उन्होंने हमारी पीड़ा, हमारी कमजोरी, और हमारे मानवीय दुःख से अपनी पहचान स्थापित की। वह हमें तसल्ली देते हैं कि हमारा उद्धारकर्ता ऐसा नहीं है जो स्वर्ग में बैठा हो और हमारे कष्टों से अनजान हो, बल्कि वह है जिसने स्वयं हमारे कष्टों को पूरी गहराई से अनुभव किया है। इस प्यास के द्वारा, यीशु मसीह न केवल शारीरिक रूप से प्यासे थे, बल्कि मानवता के उद्धार की अपनी दिव्य प्यास को भी पूरा कर रहे थे।
यीशु मसीह के क्रूस पर आखिरी छठवा वचन
यीशु मसीह के क्रूस पर कहे गए अंतिम सात वचनों में से, छठा वचन अत्यंत महत्वपूर्ण है और हमें यूहन्ना रचित सुसमाचार में मिलता है। यह वचन केवल तीन शब्दों का है, पर इसका अर्थ असीम और सनातन है।
यूहन्ना 19:30, में लिखा है: “जब यीशु ने वह सिरका लिया, तो कहा, “पूरा हुआ” (Tetelestai)।
अन्य सुसमाचारों की किताबों में हमें केवल यह जानकारी मिलती है कि यीशु मसीह ने एक ज़ोर की आवाज़ के साथ चिल्लाया और फिर अपने प्राण त्याग दिए। लेकिन प्रेरित यूहन्ना, जो क्रूस के पास खड़ा था, हमें बताता है कि यीशु ने क्या कहा था—”पूरा हुआ।”
यह जानना बहुत आवश्यक है कि क्रूस पर चढ़ाए गए एक सामान्य व्यक्ति में इतनी शारीरिक शक्ति शेष नहीं बचती कि वह ज़ोर से चिल्ला सके। ऐसे व्यक्ति प्रायः दर्द और थकावट के कारण केवल कराह कर दम तोड़ देते हैं। पर यीशु मसीह के साथ ऐसा नहीं था।
यीशु मसीह ज़ोर से इसलिए चिल्लाया और कहा “पूरा हुआ,” क्योंकि वह यह बात जान चुका था कि उसने एक महान और अंतिम विजय प्राप्त कर ली है।
यह चिल्लाहट दुख की नहीं, बल्कि महान आनंद और विजय की घोषणा थी। यह एक विजयी योद्धा की घोषणा थी जिसने युद्ध जीत लिया हो। उसने यह इसलिए कहा क्योंकि:
- हमारे पापों का दाम चुका दिया गया था: “पूरा हुआ” (Tetelestai) यूनानी भाषा का शब्द है जिसका उपयोग पुराने समय में लेन-देन के हिसाब में किया जाता था जिसका अर्थ होता था “कर्ज़ चुका दिया गया है” या “भुगतान पूर्ण हो गया है।” आपके और मेरे पापों के कारण जो हम पर परमेश्वर का नैतिक और आत्मिक कर्ज़ था, यीशु मसीह ने क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा उसे पूरी तरह से चुका दिया।
- मनुष्य और परमेश्वर के बीच की रुकावट समाप्त हो गई थी: यीशु मसीह ने उस बड़ी दीवार को गिरा दिया जो मनुष्य के पाप के कारण उसे पवित्र परमेश्वर से अलग करती थी। अब, महायाजक के माध्यम से बलिदान और रीति-रिवाजों की आवश्यकता नहीं थी। अब स्वर्ग का रास्ता पूर्ण रूप से साफ था। यीशु मसीह स्वयं वह नया और जीवित मार्ग बन गया था, जिसके द्वारा हम सीधे परमेश्वर के पास पहुँच सकते हैं (इब्रानियों 7:25; 10:19-22)।
- पुरानी वाचा की भविष्यवाणियाँ पूर्ण हुईं:
- यीशु मसीह के इन शब्दों के बाद, यूहन्ना जारी रखता है कि सैनिकों ने यीशु मसीह की कोई भी हड्डी नहीं तोड़ी (यूहन्ना 19:33-34)। यह निर्गमन की पुस्तक में फसह के मेमने के संबंध में दी गई भविष्यवाणी को पूरा करता है, जिसमें कहा गया था कि उसकी कोई भी हड्डी तोड़ी नहीं जाएगी (निर्गमन 12:46; भजन संहिता 34:20)।
- यीशु मसीह ने दोपहर के तीन बजे अपने प्राण त्यागे, जो लगभग वही समय था जब यरूशलेम के मंदिर में फसह के मेमने को बलिदान के लिए तैयार किया जाता था। इस प्रकार, यीशु मसीह हमारे लिए पूर्ण और अंतिम फसह का मेमना बन गया, जैसा कि प्रेरित पौलुस भी घोषित करता है (1 कुरिन्थियों 5:7)। वह निर्दोष मेमना हमारे पापों की बलि के लिए कुर्बान हो गया ताकि हम पापों के बंधन और दंड से आज़ाद हो सकें।
“पूरा हुआ” यह वाक्य अपने आप में परिपूर्णता, अंतिम बलिदान, और विजय का बखान करता है। यह घोषणा करती है कि उद्धार का वह महान कार्य, जिसे करने के लिए यीशु इस संसार में आए थे, अब अंतिम और पूर्ण रूप से संपन्न हो चुका है। अब किसी और बलिदान की आवश्यकता नहीं है। मसीह का कार्य संपूर्ण था।
यीशु मसीह के क्रूस पर आखिरी सातवाँ वचन
यीशु मसीह के क्रूस पर कहे गए सात आखिरी वचनों में से सातवाँ और अंतिम वचन हमें लुका रचित सुसमाचार (Luke 23:46) में मिलता है। यह वचन सीधे परमेश्वर पिता को संबोधित किया गया था, और यह प्रभु यीशु मसीह की इस पृथ्वी पर की गई आखिरी घोषणा थी:
लुका 23:46, “और यीशु ने बड़े शब्द से पुकार कर कहा, “हे पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ।” और यह कहकर प्राण छोड़ दिए”
प्रभु यीशु मसीह का यह सातवाँ वचन, उनकी मृत्यु से ठीक पहले, उनकी अटूट आस्था और पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। यह सिर्फ एक अंतिम श्वास नहीं था, बल्कि परमेश्वर के साथ उनके गहरे और निजी संबंध का प्रमाण था। यह वचन यहूदियों के बीच प्रचलित एक पुरानी और पवित्र प्रार्थना से मेल खाता है, जिसे माताएँ अक्सर अपने बच्चों को सोने से पहले सिखाती थीं। इस प्रार्थना का मूल भाव, जीवन की हर परिस्थिति में, चाहे वह नींद हो या मृत्यु, परमेश्वर पर पूर्ण रीति से भरोसा रखना और अपनी सुरक्षा उसे सौंप देना था।
इस प्रार्थना का स्रोत राजा दाऊद के भजन (Psalm 31) में पाया जाता है, विशेष रूप से भजन 31:5 में, जहाँ दाऊद कहता है: “मैं अपनी आत्मा तेरे हाथ सौंपता हूँ; हे यहोवा, सच्चाई के परमेश्वर, तूने मुझे छुड़ा लिया है।” (ध्यान दें: हिंदी बाइबल में लुका 23:46 का अनुवाद भजन 31:5 से थोड़ा अलग है, लेकिन मूल भाव एक ही है)।
राजा दाऊद ने यह प्रार्थना तब की थी जब वह घोर संकट और दुश्मनों से घिरा हुआ था। वह इस निश्चय के साथ अपने भविष्य को परमेश्वर के हाथ में सौंपता है कि उसका परमेश्वर उसके पक्ष में काम करेगा और उसे बचाएगा। यीशु मसीह ने भी क्रूस पर इसी भाव को दोहराया। जब उन्होंने अपने प्राण त्यागे, तो यह कोई हार नहीं थी, बल्कि एक विजयी समर्पण था। उन्होंने अपने आप को पिता के हाथों में सौंप दिया क्योंकि यीशु मसीह को पूरी तरह मालूम था कि परमेश्वर ने उनके लिए केवल मुक्ति ही नहीं, बल्कि अद्भुत और महिमामय बातें तैयार की हुई हैं।
दरअसल, यीशु मसीह अपने दुख सहने के उद्देश्य और परिणाम को भली-भाँति जानते थे। उन्हें यह दृढ़ विश्वास था कि उनके घोर दुख और मृत्यु के बाद, परमेश्वर पिता उन्हें मरे हुओं में से तीसरे दिन जिला उठाएगा। अपने सांसारिक सेवाकाल के दौरान, जब भी यीशु मसीह ने चेलों को अपने आने वाले दुखों, सताव और मृत्यु के बारे में बताया, उन्होंने हमेशा इसके तुरंत बाद अपनी महिमा और पुनरुत्थान के बारे में भी बताया (उदाहरण के लिए: मत्ती 16:21; 17:9; 22-23)। उनका समर्पण निराशा का नहीं, बल्कि पुनरुत्थान की आशा और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर आधारित विश्वास का प्रतीक था।
यीशु मसीह का यह अंतिम वचन हमारे लिए एक गहरा प्रश्न छोड़ जाता है:
हमारे बारे में क्या? जब हमारे जीवन में मुश्किलें, परेशानियाँ, और संकट आते हैं—जब हम खुद को घोर अंधेरे में पाते हैं, जहाँ कोई आशा की किरण नहीं दिखती—जब निराशा, दुख और उदासी हमें चारों ओर से घेर लेते हैं। तब क्या हम परमेश्वर की ओर फिरते हैं? क्या हम यीशु मसीह के समान, अपने आप को बिना किसी शर्त के, उसके प्रेम से भरे, हमारी देखभाल करने वाले और शक्तिशाली हाथों में सौंपते हैं? यीशु का अंतिम वचन हमें सिखाता है कि जीवन के सबसे कठिन क्षण में भी, हमें परमेश्वर पर पूरा भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि वह हमारी आत्मा को अपने हाथों में सुरक्षित रखेगा।
क्या हम सच में विश्वास कर पाते है कि परमेश्वर ने हमारे लिए अच्छे चीजें रखी है? क्यों आज हम अपने जीवन को उसके हाथों में सौंप दे? परमेश्वर हम पर अपना प्रेम और अनुगह प्रगट करना चाहता है और हमे आशीष देना चाहता है। आप मेरे साथ ये दुआ कर सकते है।
परमेश्वर, मैं अपने पापों को मानता हूँ, और इस बात का अंगीकार करता हूँ कि मैं अपने पापों के कारण दंड के योग्य था परंतु आप ने मेरे बदले में यीशु मैश को चुना जो मेरी जगह पर दंडित हूआ। उसके उस बलिदान और कलवरी पर जान देने के लिए शुक्रिया।
मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप मेरे सारे पापों को यीशु मसीह के लहू से धो कर साफ करदे। मैं विश्वास करता हूँ कि यीशु मसीह मारा गया और कब्र में रखा गया और मुझे धर्मी ठाहराने के लिए मुरदों में तीसरे दिन जिंदा हो गया। और जीवित है। मैं यीशु मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करता हूँ (रोमियों 10:9)। यीशु मसीह के नाम से आमीन।