
परमेश्वर के गुणों और उसके प्रभुत्व (Sovereignty) के बारे में हमने जो कुछ भी सीखा है, उसका सबसे जीवंत और व्यावहारिक उदाहरण यूसुफ के जीवन में मिलता है। यूसुफ की कहानी केवल एक पारिवारिक विवाद या व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है; यह इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक संप्रभु परमेश्वर मानवीय पाप, ईर्ष्या और विपत्ति का उपयोग करके अपने महान उद्देश्यों को पूरा करता है।
उत्पत्ति 50:20 में यूसुफ अपने उन भाइयों से कहता है जिन्होंने उसे दासता में बेचा था:
“तुमने तो मेरे विरुद्ध बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, ताकि वह ऐसा करे जैसा आज हो रहा है, कि बहुत से लोगों के प्राण बच जाएँ।” (उत्पत्ति 50:20)
1. बुराई के धागे: मानवीय चुनाव और पीड़ा
यूसुफ का जीवन उन घटनाओं से भरा था जो किसी को भी कड़वाहट से भर सकती थीं। उसके भाइयों ने उससे घृणा की, उसे गड्ढे में फेंक दिया, और फिर उसे मिस्र के व्यापारियों को बेच दिया। मिस्र में, उसे झूठे आरोप में जेल भेज दिया गया।
- मानवीय जिम्मेदारी: यूसुफ के भाइयों ने जानबूझकर बुराई को चुना। वे अपने ईर्ष्यालु कृत्य के लिए पूरी तरह जिम्मेदार थे।
- सृष्टि की लाचारी: कई वर्षों तक ऐसा लगा जैसे परमेश्वर चुप है। यूसुफ के जीवन के धागे उलझे हुए, काले और बदसूरत दिख रहे थे।
2. भलाई का बुनकर: परमेश्वर की संप्रभुता
उत्पत्ति 50:20 का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है “परन्तु”। यह ‘परन्तु’ मानवीय दुष्टता और ईश्वरीय योजना के बीच का मोड़ है।
- नियंत्रण में परमेश्वर: परमेश्वर ने यूसुफ के भाइयों को उनके पाप से नहीं रोका, लेकिन उसने उस पाप के परिणाम को पूरी तरह से नियंत्रित किया।
- उद्देश्यपूर्ण पीड़ा: यदि यूसुफ को बेचा न जाता, तो वह पोतीपर के घर न पहुँचता। यदि वह जेल न जाता, तो वह राजा के अधिकारियों से न मिलता। यदि वह जेल में न रहता, तो वह फिरौन के सपनों का अर्थ न बताता और मिस्र का प्रधान न बनता।
- बड़ी तस्वीर: परमेश्वर का लक्ष्य केवल यूसुफ को ऊँचा उठाना नहीं था, बल्कि पूरे इस्राएल वंश को अकाल से बचाना था ताकि मसीह के आने का वंश सुरक्षित रहे।
3. ईश्वरीय सहमति (Divine Concurrence)
यहाँ हम एक गहरा सत्य देखते हैं: परमेश्वर बुराई का ‘रचयिता’ नहीं है, लेकिन वह बुराई का ‘स्वामी’ है। वह बुराई के कड़वे धागों को अपनी भलाई की मशीन में डालता है और उससे एक सुंदर चित्र बुनता है।
- बुराई का विचार (Human Intention): भाइयों का इरादा “बुराई” था।
- भलाई का विचार (Divine Intention): परमेश्वर का इरादा उसी घटना के माध्यम से “भलाई” करना था।
परमेश्वर मनुष्यों की स्वतंत्र इच्छा का उल्लंघन किए बिना अपनी इच्छा को पूरा करने में सक्षम है। यह उसकी असीमित बुद्धि का प्रमाण है।
4. हमारे जीवन के लिए इस सत्य का महत्व
जब हम अपनी ‘उलझी हुई’ परिस्थितियों के बीच होते हैं, तो यूसुफ का जीवन हमें तीन बातें सिखाता है:
- धैर्य और भरोसा: आज जो घटना आपको ‘विनाशकारी’ लग रही है, वह भविष्य में ‘उद्धारकारी’ साबित हो सकती है। परमेश्वर अभी अपना काम पूरा नहीं किया है।
- कड़वाहट से मुक्ति: यूसुफ अपने भाइयों को माफ कर पाया क्योंकि उसने भाइयों के हाथ के पीछे परमेश्वर का हाथ देखा। जब हम जानते हैं कि हमारी परिस्थितियाँ परमेश्वर के नियंत्रण में हैं, तो हम लोगों को माफ करना आसान पाते हैं।
- रोमियों 8:28 का आश्वासन: “हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं।” ‘सब बातें’ में हमारे दुख, हमारी गलतियाँ और दूसरों द्वारा की गई बुराई भी शामिल है।
निष्कर्ष
परमेश्वर एक महान कलाकार है। वह आपके जीवन के काले धागों (दुख और असफलता) को व्यर्थ नहीं जाने देता। वह उन्हें इस तरह बुन रहा है कि अंत में उसकी महिमा और आपकी भलाई प्रकट हो। यूसुफ के जीवन की तरह, आपके जीवन का ‘अंत’ भी यह सिद्ध करेगा कि परमेश्वर कभी गलती नहीं करता।
आज के लिए मनन और प्रार्थना
क्या आपके जीवन में कोई ऐसी घटना है जिसे आप अभी भी “बुराई” के रूप में देखते हैं? आज परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपको वह ‘आत्मिक दृष्टि’ दे जिससे आप उस घटना के पीछे उसके ‘भलाई के विचार’ को देख सकें।
प्रार्थना:
“हे सर्वशक्तिमान और संप्रभु परमेश्वर, मैं तेरी अद्भुत योजना की आराधना करता हूँ। धन्यवाद कि तू मेरी विफलता और दूसरों की बुराई को भी मेरे भले के लिए उपयोग कर सकता है। प्रभु, मुझे यूसुफ जैसा हृदय दे कि मैं परिस्थितियों के पीछे तुझे देख सकूँ। मुझे कड़वाहट से बचा और यह अटूट विश्वास दे कि तू मेरे जीवन में एक सुंदर चित्र बुन रहा है। यीशु के नाम में, आमीन।”