
जब हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ सब कुछ बदल रहा है—मौसम, सरकारें, हमारी भावनाएं और यहाँ तक कि हमारा शरीर—तब हमारी आत्मा एक ऐसी चीज़ की तलाश करती है जो स्थिर हो। भजन संहिता 90:2 हमें उस ‘अटल चट्टान’ के दर्शन कराता है जो समय और सृष्टि के अस्तित्व से भी प्राचीन है:
“इससे पहले कि पहाड़ उत्पन्न हुए, या तूने पृथ्वी और जगत की रचना की, आदि से अन्त तक तू ही परमेश्वर है।” (भजन 90:2)
1. “आदि से अन्त तक”: समय से परे परमेश्वर
भजन संहिता 90 का लेखक मूसा है। उसने रेगिस्तान की बदलती रेत और लोगों की अस्थिरता को देखा था। इसके विपरीत, वह परमेश्वर को ‘अनादि-अनंत’ (Eternal) के रूप में देखता है।
मसीही धर्मशास्त्र में इसे परमेश्वर की अपरिवर्तनीयता (Immutability) और अनंतता (Eternity) कहा जाता है।
- सृष्टि से पूर्व: पहाड़ों के अस्तित्व में आने से पहले भी वह था। इसका मतलब है कि वह सृष्टि का हिस्सा नहीं, बल्कि उसका रचयिता है।
- समय का स्वामी: परमेश्वर समय के अंदर नहीं रहता; समय परमेश्वर के अंदर है। उसके लिए “बीता हुआ कल” और “आने वाला कल” एक वर्तमान क्षण की तरह हैं।
2. अटल चट्टान: परमेश्वर का अस्तित्व ही हमारा आधार है
बाइबल में परमेश्वर को अक्सर ‘चट्टान’ (Rock) कहा गया है। यह उपमा उसके अस्तित्व की दृढ़ता को दर्शाती है:
- वह कभी नहीं बदलता: उसका स्वभाव, उसके वादे और उसकी योजनाएं वैसी ही हैं जैसी हज़ारों साल पहले थीं। यदि उसने निर्गमन के समय अपनी प्रजा से प्रेम किया, तो वह आज आपसे भी उतना ही प्रेम करता है।
- वह कभी थकता नहीं: मानवीय चट्टानें समय के साथ घिस सकती हैं, लेकिन परमेश्वर की सामर्थ्य और अस्तित्व में कभी कमी नहीं आती।
3. अटूट भरोसे का कारण
परमेश्वर के इस “अटल अस्तित्व” पर हमारा भरोसा क्यों होना चाहिए?
- हमारी नश्वरता के बीच सांत्वना: भजन 90 के बाकी हिस्से में मूसा मनुष्य की तुलना ‘घास’ से करता है जो सुबह उगती है और शाम को सूख जाती है। हमारी अस्थिरता के बीच, परमेश्वर की स्थिरता हमारा “निवास स्थान” (Dwelling Place) है।
- वादों की गारंटी: यदि परमेश्वर बदल सकता, तो उसके वादे भी बदल सकते थे। लेकिन चूँकि वह ‘आदि से अंत तक’ वही है, इसलिए हम उसके वचनों पर अपनी ज़िंदगी की नींव रख सकते हैं।
- संकट में सुरक्षा: जब सब कुछ ढह रहा हो, तब भी “अटल चट्टान” खड़ी रहती है। हमारा भरोसा इस बात पर नहीं है कि परिस्थितियां नहीं बदलेंगी, बल्कि इस पर है कि स्थितियों को बदलने वाला परमेश्वर कभी नहीं बदलेगा।
निष्कर्ष: रेत पर नहीं, चट्टान पर घर
यीशु मसीह ने मत्ती 7 में एक बुद्धिमान मनुष्य का उदाहरण दिया जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया। वह चट्टान स्वयं परमेश्वर और उसका वचन है। जब हम भजन 90:2 के सत्य को आत्मसात करते हैं, तो हम उस “अटल चट्टान” पर खड़े होते हैं जिसे कोई भी सांसारिक तूफान हिला नहीं सकता।
वह केवल ‘था’ नहीं, वह केवल ‘होगा’ नहीं; वह “है”।
आज के लिए मनन और प्रार्थना
आज अपने जीवन के उन क्षेत्रों को पहचानें जहाँ आप “बदलती रेत” (अस्थायी चीज़ों) पर भरोसा कर रहे हैं। क्या आप अपनी शांति के लिए अपनी नौकरी, स्वास्थ्य या रिश्तों पर निर्भर हैं? आज अपना बोझ उस “अटल चट्टान” पर डाल दें।
प्रार्थना:
“हे सनातन परमेश्वर, तू जो पहाड़ों के उत्पन्न होने से पहले भी था, मैं तेरी आराधना करता हूँ। धन्यवाद कि इस बदलती हुई दुनिया में तू मेरी अटल चट्टान है। जब मेरा मन विचलित हो और परिस्थितियां प्रतिकूल हों, तो मुझे याद दिला कि तू ‘आदि से अंत तक’ वही है। मुझे तुझ पर अटूट भरोसा करना सिखा। यीशु के नाम में, आमीन।”