परिचय: सप्ताहों का पर्व
सप्ताहों का पर्व (Feast of Weeks), जिसे हिब्रू में ‘शावुओत’ (Shavuot) कहा जाता है, इस्राइलियों द्वारा मनाया जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण और हर्षोल्लास का त्योहार है। यह तीन प्रमुख वार्षिक तीर्थयात्रा पर्वों (Pesach, Shavuot, Sukkot) में से एक था,
जिनमें इस्राइल के सभी वयस्क पुरुषों को अनिवार्य रूप से येरूशलेम के मंदिर में उपस्थित होकर परमेश्वर की आराधना करनी होती थी और भेंट चढ़ानी होती थी। यह पर्व न केवल कृषि से जुड़ा था, बल्कि इसका गहरा ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्त्व भी था।

नामकरण और समय
इस पर्व को ‘सप्ताहों का पर्व’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका समय ‘पहले पूले के पर्व’ (First Sheaf/लेव्यव्यवस्था 23:10-11) के सात पूरे सप्ताहों, अर्थात उनचास (49) दिनों के बाद, पचासवें दिन निर्धारित किया गया था। ‘पहले पूले का पर्व‘ फसल कटाई की शुरुआत का प्रतीक था, और इसके बाद सात सप्ताह की गिनती करके ठीक 50वें दिन यह पर्व मनाया जाता था।
इसी कारण, यूनानी (ग्रीक) भाषा में इस पर्व को “पिन्तेकुस्त” (Pentecost) कहा गया, जहाँ ‘पिन्ते’ (Pente) का अर्थ है ‘पचास’। पवित्रशास्त्र में इसका उल्लेख लेव्यव्यवस्था 23:15-16 में मिलता है: “और विश्राम दिन के दूसरे दिन से लेकर जिस दिन तुम हिलाने के लिये भेंट का पूला ले आए थे, सात सप्ताह पूरे पूरे गिनना। तुम पचासवें दिन तक गिनकर यहोवा के लिये नया अन्नबलि चढ़ाना।”
कृषि और ऐतिहासिक महत्त्व
- कृषि का महत्त्व (फसल का पर्व): सप्ताहों का पर्व इस्राइल में जौ की कटाई के अंत और गेहूँ की कटाई की शुरुआत का प्रतीक था। इसे ‘फसल काटने का पर्व’ (Feast of Harvest) भी कहा जाता था (निर्गमन 23:16)।
- इस दिन, लोग अपनी पहली उपज के उत्तम अंशों को धन्यवाद और कृतज्ञता के रूप में परमेश्वर को भेंट चढ़ाने के लिए येरूशलेम लाते थे। यह कार्य इस विश्वास को दर्शाता था कि फसल की बरकत परमेश्वर की ओर से है।
- ऐतिहासिक/आध्यात्मिक महत्त्व (व्यवस्था का पर्व): रब्बीनिक (Rabbinic) परंपरा के अनुसार, पिन्तेकुस्त के पर्व का एक और गहरा ऐतिहासिक महत्त्व है। यह माना जाता है कि इसी समय, मिस्र की गुलामी से निकलने के बाद, परमेश्वर ने सीनै पर्वत पर मूसा को दस आज्ञाएँ और अपनी व्यवस्था (तौराह/Torah) प्रदान की थी।
- इसलिए, शावुओत को ‘व्यवस्था दिए जाने का पर्व’ के रूप में भी मनाया जाता है, जो परमेश्वर और इस्राइल राष्ट्र के बीच वाचा (Covenant) की स्थापना का स्मरण कराता है। यह पर्व इस बात पर ज़ोर देता है कि इस्राइल जाति को भौतिक समृद्धि के साथ-साथ परमेश्वर की नैतिक और धार्मिक व्यवस्था भी प्राप्त हुई।
पर्व का अनुष्ठान
पिन्तेकुस्त के पर्व पर, परमेश्वर के लिए विशेष रूप से दो खमीरी रोटियों की ‘हिलाने की भेंट’ चढ़ाई जाती थी (लेव्यव्यवस्था 23:17)। खमीर का उपयोग करना एक असामान्य बात थी, क्योंकि अन्य अन्नबलियों में खमीर वर्जित था।
ये दो रोटियाँ इस्राइल के दो हिस्सों (उत्तरी और दक्षिणी) या शायद इस्राएलियों और गैर-इस्राएलियों (जातियों) के बीच से आने वाली फसल को दर्शाती थीं, जिन्हें परमेश्वर के सामने शुद्ध किया जाता था। इसके अलावा, होमबलि, मेलबलि और पापबलि भी चढ़ाई जाती थीं। लोग आनंद मनाते थे, और फसल के दान गरीबों और जरूरतमंदों के लिए छोड़े जाते थे।
सप्ताहों का पर्व (पिन्तेकुस्त) – महत्व, विधि और दिव्य उद्देश्य – गहन अध्ययन
मुख्य बाइबल संदर्भ: लैव्यव्यवस्था 23:15-16; निर्गमन 34:22; व्यवस्थाविवरण 16:10
जब परमेश्वर ने अपने चुने हुए लोगों, इस्राइल को, मूसा के माध्यम से व्यवस्था प्रदान की, तो उन्होंने वर्ष भर मनाए जाने वाले कई पवित्र पर्वों को स्थापित किया। इन पर्वों को मनाने के निर्देश परमेश्वर ने बड़ी स्पष्टता और विस्तार के साथ दिए थे। जैसा कि हम इस श्रृंखला के पहले भाग में जान चुके हैं,
परमेश्वर द्वारा निर्धारित प्रत्येक पर्व का एक गहरा और दिव्य उद्देश्य था; वे न केवल अतीत की यादें थीं बल्कि परमेश्वर के उद्धार की महान योजना में भविष्य की घटनाओं की ओर भी संकेत करते थे। सप्ताहों का पर्व, जिसे बाद में पिन्तेकुस्त के नाम से जाना गया, इन्हीं महत्वपूर्ण पर्वों में से एक था।
पर्व का नाम और उद्देश्य:
परमेश्वर ने इस पर्व को मुख्य रूप से ‘कटनी के पर्व’ या ‘पहले फल के पर्व‘ (निर्गमन 23:16) के रूप में मनाने की आज्ञा दी थी। यह वह विशिष्ट समय होता था जब इस्राइल के लोग परमेश्वर द्वारा प्रतिज्ञा की गई भूमि में दी गई भौतिक आशीषों और गेहूँ की कटनी की बढ़ोत्तरी के लिए उनका हार्दिक धन्यवाद करते थे।
यह केवल एक कृषि उत्सव नहीं था, बल्कि परमेश्वर की ओर से जीवन और प्रावधान की स्वीकृति का कार्य था।
व्यवस्थाविवरण 16:10 में इसे “स्वेच्छा भेंट का पर्व” भी कहा गया है, क्योंकि इस्राइलियों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार परमेश्वर को भेंट लाने की आज्ञा थी। यह पर्व उनके लिए यह स्मरण करने का अवसर था कि मिस्र की दासता से मुक्ति के बाद, अब वे एक समृद्ध भूमि में बस गए हैं, जहाँ परमेश्वर उन्हें भरपूर फसल दे रहे थे।
सामाजिक और नैतिक पहलू:
इस त्योहार की एक अनूठी और गहरी नैतिक विशेषता यह थी कि इस्राइली अपनी फसल का कुछ भाग जानबूझकर गरीब, बेसहारा (जैसे अनाथ और विधवाएँ), और उनके बीच रहने वाले परदेसियों (विदेशी) के लिए छोड़ देते थे।
यह सामाजिक न्याय और उदारता का एक शक्तिशाली प्रदर्शन था। कटनी के अंतिम छोरों को न काटना (लैव्यव्यवस्था 23:22) और भूमि की आशीषों को दूसरों के साथ बाँटना परमेश्वर की शिक्षाओं का अभिन्न अंग था।
यह समय परमेश्वर की अतुलनीय आशीषों के लिए कृतज्ञता प्रकट करने और उस कृतज्ञता को व्यावहारिक रूप से जरूरतमंदों के साथ साझा करने का एक स्वर्णिम अवसर था। यह पर्व इस्राइल को परमेश्वर के प्रेम और प्रावधान का प्रतिबिम्ब बनने के लिए प्रोत्साहित करता था।
पिन्तेकुस्त या सप्ताहों के पर्व की विस्तृत रस्में और विधि:
- समय का निर्धारण: इस पर्व का समय अत्यन्त विशेष था। यह पहले पूले के पर्व (जो अखमीरी रोटी के पर्व के दौरान मनाया जाता था, लैव्यव्यवस्था 23:11) से ठीक सात सप्ताह (49 दिन) बाद, यानी 50वें दिन मनाया जाता था (लैव्यव्यवस्था 23:15-16)। यही कारण है कि इसे यूनानी में ‘पिन्तेकुस्त’ (अर्थात ‘पचासवाँ’) कहा गया। इसका मतलब था कि इस पर्व की शुरुआत जौ की कटनी के शुरू होने से होती थी और इसका समापन गेहूँ की कटनी के पूरा होने पर होता था।
- विशेष अन्नबलि (अर्पण): इस पर्व की सबसे प्रमुख विशेषता एपा के दो-दसवें अंश मैदे की बनी ‘दो रोटियों’ को पहली उपज (प्रथम फल) के रूप में भेंट चढ़ाना था। ये रोटियाँ खमीर के साथ बनाई जाती थीं (लैव्यव्यवस्था 23:17), जो इसे वर्ष की अन्य अन्नबलियों से अलग करता था।
- खमीर प्रायः पाप का प्रतीक होता था, और इस भेंट में खमीर का शामिल होना शायद यह दिखाता था कि मनुष्य अपनी अपूर्णता के बावजूद परमेश्वर की आशीषों को स्वीकार करता है, या यह कि परमेश्वर की नई वाचा में, खमीर (पाप) को शुद्ध कर दिया जाता है। इन रोटियों को याजक परमेश्वर के सामने ‘हिलाने की भेंट’ के रूप में चढ़ाते थे।
- निर्धारित बलिदान: इस दिन कई विशिष्ट बलिदान चढ़ाए जाते थे, जो पर्व की पवित्रता और महत्व को दर्शाते थे (गिनती 28:26-31):
- होमबलि (जलाने की भेंट): 7 निर्दोष मेमने (भेड़ के बच्चे), 1 बछड़ा, और 2 मेढ़े। ये पूरी तरह से जला दिए जाते थे, जो परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और आराधना को दर्शाते थे।
- अन्नबलि और अर्घ: इन होमबलियों के साथ निर्धारित मात्रा में अन्नबलि (मैदे और तेल की) और अर्घ (दाखरस) चढ़ाया जाता था।
- पापबलि: पूरे राष्ट्र के लिए शुद्धिकरण हेतु 1 बकरा पापबलि के रूप में चढ़ाया जाता था, जो अनजाने में किए गए पापों के प्रायश्चित के लिए आवश्यक था।
- मेलबलि (धन्यवाद की भेंट): 1 वर्ष के 2 मेमने (भेड़ के बच्चे) मेलबलि के लिए थे। यह परमेश्वर और लोगों के बीच शांति और सहभागिता का प्रतीक था, और इसका कुछ भाग याजकों और चढ़ाने वाले व्यक्ति द्वारा मिलकर खाया जाता था।
- पवित्र सभा और विश्राम: परमेश्वर की आज्ञा थी कि इस दिन एक ‘पवित्र सभा’ बुलाई जाए। यह एक अनिवार्य धार्मिक समारोह था जिसमें सभी लोगों को इकट्ठा होना होता था। इस दिन किसी भी प्रकार का ‘कठिन परिश्रम’ करना वर्जित था (लैव्यव्यवस्था 23:21; गिनती 28:26)।
- यह विश्राम का दिन था, जो लोगों को सांसारिक कार्यों से मुक्त होकर पूरी तरह से परमेश्वर की आराधना और उनकी आशीषों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर देता था।
दिव्य और भविष्यवाणी का महत्व:
सप्ताहों का पर्व सिर्फ एक ऐतिहासिक या कृषिगत उत्सव नहीं था। यह पर्व इस गहरी सत्यता का स्मारक था कि जीवन, बढ़ोत्तरी, और सभी भौतिक प्रावधान केवल और केवल परमेश्वर की ओर से हैं, न कि मनुष्य के पुरुषार्थ, शक्ति या परिश्रम से।
नए नियम के संदर्भ में, सप्ताहों का पर्व एक महत्वपूर्ण भविष्यवाणी को पूरा करता है। पिन्तेकुस्त का पर्व, यीशु मसीह के पुनरुत्थान के बाद 50वें दिन मनाया गया, जब पवित्र आत्मा यरूशलेम में चेलों पर उतरा (प्रेरितों के काम 2:1-4)।
जिस तरह यह पर्व इस्राइल को भूमि की कटनी के ‘पहले फल‘ का स्मरण दिलाता था, उसी तरह पवित्र आत्मा का उतरना कलीसिया की ‘आत्मिक कटनी’ का पहला फल था।
इस घटना ने एक नई वाचा और एक नए युग की शुरुआत को चिह्नित किया, जहाँ परमेश्वर की व्यवस्था पत्थरों पर नहीं, बल्कि विश्वासियों के हृदयों पर लिखी गई थी। इस प्रकार, सप्ताहों का पर्व, फसल की कटनी से शुरू होकर, आत्मा की कटनी तक पहुँचने वाली परमेश्वर की महान योजना का एक सुंदर पुल था।
मसीहियों के लिए सप्ताहों के पर्व की महत्ता
सप्ताहों का पर्व (पिन्तेकुस्त): भविष्य की एक महान घटना का संकेत

जिस प्रकार पुराने नियम के अन्य पर्व—जैसे फसह और अखमीरी रोटी का पर्व—यीशु मसीह के बलिदानपूर्ण जीवन और मृत्यु की परछाईं थे, उसी प्रकार सप्ताहों का पर्व, जिसे यूनानी में ‘पिन्तेकुस्त’ (Pentecost) कहा जाता है, भी भविष्य में होने वाली एक असाधारण और महान घटना का संकेत था। यह पर्व, जो फसह के पचास दिन बाद मनाया जाता था, परमेश्वर की नई वाचा के अंतर्गत कार्य करने की एक नई रीति की शुरुआत का पूर्वाभास था।
1. पवित्र आत्मा का चमत्कारिक आगमन (प्रेरितों के काम 2:1-4):
प्रेरितों के काम के दूसरे अध्याय में, हम पाते हैं कि प्रभु यीशु मसीह के शिष्य, उनकी आज्ञा के अनुसार, पिन्तेकुस्त के दिन येरूशलेम में एक ही स्थान पर एकत्रित थे। यह वही निर्धारित समय था जिसका परमेश्वर ने पुराने नियम में संकेत दिया था। ठीक उसी दिन, एक भयंकर आंधी की आवाज़ के साथ और आग की लपटों जैसी दिखाई देने वाली चीज़ों के उनके ऊपर ठहरने के साथ, परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा को उन सब पर बड़ी सामर्थ्य के साथ उँडेला।
यह घटना पिन्तेकुस्त पर्व के मूल उद्देश्य को पूरा करती है। पुराने नियम में, सप्ताहों के पर्व पर, कटनी की ‘पहली उपज का पूला’ परमेश्वर को भेंट किया जाता था, जो दर्शाता था कि पूरी फसल अब परमेश्वर की है। इसी तरह, पवित्र आत्मा का यह दान उस महान आत्मिक कटनी की शुरुआत थी जिसके लिए प्रभु यीशु मसीह ने क्रूस पर अपनी जान दी और मरे हुओं में से जीवित हुए। पवित्र आत्मा का आगमन इस बात का प्रमाण था कि यीशु मसीह अब स्वर्ग में पिता के दाहिने हाथ विराजमान हैं और उन्होंने प्रतिज्ञा पूरी की है।
2. दो रोटियों का गूढ़ रहस्य (लेवीय 23:17):
सप्ताहों के पर्व में एक बहुत ही महत्वपूर्ण विधि थी—खमीर मिली हुई दो रोटियाँ परमेश्वर को भेंट चढ़ाना। ये दो रोटियाँ खमीर के साथ चढ़ाई जाती थीं, जो अक्सर बाइबल में पाप का प्रतीक होता है।
बाइबल के विद्वान इस विधि को एक गहरा भविष्यसूचक अर्थ देते हैं। यह दो रोटियाँ इस बात का सशक्त प्रतीक थीं कि परमेश्वर अब केवल इस्राएल (यहूदियों) को ही नहीं, बल्कि गैर-यहूदी (अन्यजाति या Gentiles) लोगों को भी अपनी उद्धार की योजना में शामिल करेगा, हालाँकि वे अभी भी पाप से दूषित (खमीर) हैं।
पवित्र आत्मा के पिन्तेकुस्त के दिन आने के बाद, ये दोनों समूह—यहूदी और अन्यजाति—यीशु मसीह में विश्वास करने के द्वारा एक नई आत्मिक वास्तविकता में एक हो गए। प्रेरित पौलुस समझाता है
कि मसीह ने अपने शरीर के द्वारा बैर की दीवार को ढाकर, इन दोनों समूहों को एक नया मनुष्यत्व बनाकर, यानी एक कलीसिया (चर्च) के रूप में, एक कर दिया है (इफिसियों 2:14-16)। इस प्रकार, ये दो रोटियाँ मसीह की देह—कलीसिया—का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो सभी जातियों के विश्वासियों से बनी है।
3. कलीसिया की पहली महान कटनी:

पवित्र आत्मा के आने के बाद, शिष्यों को एक नई सामर्थ्य मिली। प्रेरित पतरस, जो पहले डरपोक था, पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर निर्भीकता से येरूशलेम की भीड़ के सामने खड़ा हुआ और उसने यीशु मसीह के जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान के सुसमाचार का शक्तिशाली प्रचार किया।
परिणाम आश्चर्यजनक था। उसी दिन, पतरस के संदेश से प्रभावित होकर और अपने पापों का पश्चाताप करके, लगभग 3000 लोगों ने विश्वास किया और यीशु मसीह के नाम पर बपतिस्मा लिया।
यह घटना कलीसिया के इतिहास में एक मील का पत्थर थी। यह पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से काटी गई वह ‘पहली फसल’ थी, जो परमेश्वर के राज्य के विस्तार और कलीसिया के जन्म की घोषणा करती थी। पिन्तेकुस्त का पर्व इस बात का प्रमाण है कि परमेश्वर ने अपने लोगों को अपनी महान कटनी के लिए आवश्यक शक्ति और सामर्थ्य प्रदान की है।
निष्कर्ष
उत्पत्ति और महत्व
सप्ताहों का पर्व, जिसे पिन्तेकुस्त (पेंटेकोस्ट) के नाम से भी जाना जाता है, केवल एक ऐतिहासिक या वार्षिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह परमेश्वर की संपूर्ण और सिद्ध योजना का एक महत्वपूर्ण और मूलभूत हिस्सा है। यह पर्व हमें गहराई से सिखाता है कि महान, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मानव जाति के अनमोल उद्धार के लिए सब कुछ पहले से ही निश्चित और तैयार कर रखा था।
यह उस समय की ओर इशारा करता है जब परमेश्वर ने अपनी पवित्र आत्मा को विशेष रूप से उंडेल कर अपनी नई वाचा और अपने राज्य के युग की शुरुआत की। पेंटेकोस्ट एक स्पष्ट प्रमाण है कि परमेश्वर अपनी वाचाओं को पूरा करने और अपने लोगों को अपनी उपस्थिति और शक्ति से सशक्त बनाने में सच्चा और विश्वासयोग्य है।
आत्मिक कटनी और हमारा परम कर्तव्य
आज, जब हम विश्वास के माध्यम से उस अद्भुत आत्मिक कटनी का एक सक्रिय और आशीषित भाग बन चुके हैं—अर्थात् हम परमेश्वर के अनुग्रह से उद्धार पाए हुए लोग हैं, तो यह केवल एक व्यक्तिगत वरदान तक ही सीमित नहीं रहता। यह हम पर एक परम और गंभीर कर्तव्य डालता है। जिस तरह एक किसान अपनी फसल की कटाई के बाद उसे दूसरों के लिए उपलब्ध कराता है, उसी तरह हमारा परम कर्तव्य यह बन जाता है कि हम उद्धार के इस जीवनदायक, शक्तिशाली संदेश को उन सभी लोगों तक भी ले जाएँ जो अभी भी अंधकार और निराशा में जी रहे हैं।
सुसमाचार का प्रचार – परमेश्वर के राज्य का विस्तार
हमें उत्साह, प्रेम और निडरता के साथ सुसमाचार (खुशखबरी) का प्रचार करना चाहिए। यह प्रचार केवल शब्दों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि हमारे जीवन, हमारे कार्यों और हमारे प्रेम में भी प्रतिबिंबित होना चाहिए। हमें यह सुनिश्चित करने के लिए लगन से काम करना चाहिए कि अन्य लोग भी परमेश्वर की इस महान और बहुमूल्य कटनी का हिस्सा बन सकें। पिन्तेकुस्तका पर्व हमें याद दिलाता है कि पवित्र आत्मा की शक्ति हमारे साथ है, जो हमें इस महान कार्य को प्रभावी ढंग से पूरा करने में सक्षम बनाती है।
हमारा लक्ष्य स्पष्ट है: अधिक से अधिक लोगों को परमेश्वर के प्रेम, क्षमा और अनन्त जीवन के निमंत्रण के बारे में बताना ताकि वे भी उसके अद्भुत और चिरस्थायी राज्य में शामिल हो सकें और अनन्त आशीष के भागी बनें। इस तरह, हम न केवल परमेश्वर की सिद्ध योजना का सम्मान करते हैं, बल्कि उसके प्रेम और उद्देश्य को भी संसार के कोने-कोने तक पहुँचाने में उसके सहयोगी बनते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Resources:
Pentecost (Britannica Encyclopedia)