क्या आपको परमेश्वर का अस्तित्व के बारे में पता हैं?-परमेश्वर के गुण भाग 03 Existence of God-Hindi/ Kya Aapko Parmeshwar ke Astitv ke bare mein pta hain?

परमेश्वर का अस्तित्व

परमेश्वर का अस्तित्व का अर्थ क्या हैं?

परमेश्वर के अस्तित्व को समझना और समझाना एक गहन विषय है, जो न तो अत्यंत सरल है और न ही असंभव। परमेश्वर से प्रेम करने वाला और उसे जानने वाला व्यक्ति निश्चित रूप से परमेश्वर के विषय में जानने की इच्छा रखेगा।

परंतु इससे पहले, हमें ‘अस्तित्व’ (Existence) के मूल अर्थ को समझना आवश्यक है। अस्तित्व का सीधा अर्थ है किसी वस्तु या व्यक्ति का ‘होना’ या ‘विद्यमान रहना’। किसी व्यक्ति या वस्तु का होना ही उसके अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण है।

हम मानवजाति अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए हर पल किसी न किसी पर निर्भर रहते हैं। जन्म के समय हम माता-पिता पर, बड़े होने पर दोस्तों और जीवनसाथी पर, और अंततः बुढ़ापे में बच्चों या सहारे की चीज़ों पर निर्भर होते हैं। यदि हम सामाजिक दृष्टिकोण से देखें, तो आज के समय में हमारी निर्भरता हमारे मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट पर भी बहुत अधिक है।

हालांकि, परमेश्वर ने हमारी इस निर्भरता को देखते हुए, जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक कुछ चीज़ें हमें निःशुल्क प्रदान की हैं—जैसे हवा, पानी, और सूर्य का प्रकाश। दुर्भाग्य से, हम अक्सर इनकी परवाह नहीं करते। यह सब इस बात को दर्शाता है कि हम अपने जीवन को जीने के लिए कितने अधिक निर्भर हैं। ये सभी चीजें हमारे भौतिक अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं।

इसके विपरीत, परमेश्वर का अस्तित्व (The Existence of God) किसी बाहरी वस्तु, व्यक्ति, या प्रयास पर निर्भर नहीं है, जैसा कि हमारा अस्तित्व होता है। परमेश्वर का अस्तित्व स्वयं परमेश्वर से ही है।

परमेश्वर का अस्तित्व

परमेश्वर का अस्तित्व का होना किसी पर निर्भर नहीं हैं

क्या हमने कभी विचार किया है कि जिस परमेश्वर की हम आराधना करते हैं, क्या वह भी किसी पर निर्भर है? क्या उसे भी किसी चीज़ की आवश्यकता है? इस संसार में कई ऐसे लोग हैं जो यह गलती कर बैठते हैं कि परमेश्वर उन पर या उनके कार्यों पर निर्भर है, या वे परमेश्वर को भी मनुष्य की तरह समझते हैं।

यहाँ एक मूलभूत सत्य है जिस पर हमें सहमत होना चाहिए और यह हमें परमेश्वर के स्वयं-अस्तित्व (Self-Existence) के विषय में सोचने में सहायता करेगा:परमेश्वर, परमेश्वर है, चाहे आप उस पर विश्वास करें या न करें। उसे परमेश्वर होने के लिए आपके विश्वास की आवश्यकता नहीं है।

यह बात बिल्कुल सही है: हम नहीं हैं जो परमेश्वर को परमेश्वर बनाते हैं। परमेश्वर अनादि काल से स्वयं अस्तित्व में है। इसके विपरीत, हमारा अस्तित्व केवल और केवल परमेश्वर की इच्छा और उसकी सामर्थ्य के कारण है।

तो, बाइबिल के धर्मविज्ञानियों के अनुसार, परमेश्वर के स्वयं-अस्तित्व का अर्थ क्या है?

परमेश्वर के स्वयं-अस्तित्व का अर्थ है कि परमेश्वर स्वयं के लिए स्वयं ही पर्याप्त है (Self-Sufficient)। वह किसी भी चीज़ से बंधा हुआ नहीं है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर समय से परे है और वह समय का भी स्वामी है। वह अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र है। संक्षेप में,परमेश्वर स्वयं पर्याप्त है, वह किसी पर निर्भर नहीं है, और वह समय की सीमाओं से बाहर है।परमेश्वर का अस्तित्व किसी पर निर्भर नहीं है – आत्म-पर्याप्तता

परमेश्वर का अस्तित्व उसके समस्त गुणों को समाहित करता है। परमेश्वर का प्रेम, उसकी अनंतता (Infinitude), उसका अपरिवर्तनीय स्वभाव (Unchanging Nature), और उसके बाकी सभी गुण उसके अस्तित्व से गहरे संबंध रखते हैं। परमेश्वर की कोई शुरुआत नहीं है और न ही कोई अंत है। परमेश्वर रचने वाला है, और हम सब उसकी रचना हैं।

हम सब की शुरुआत और अंत परमेश्वर ही है। हम सब अपने जीवन के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहते हैं (जैसा कि प्रेरितों 17:28 में कहा गया है)। परमेश्वर को हमसे किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं है, न ही हम उसे कुछ दे सकते हैं जो उसका न हो। क्योंकि परमेश्वर ने ही सब कुछ बनाया और रचा है; सब कुछ उसी का है।

परमेश्वर को कुछ देना ऐसा है जैसे आप मेरे पैसे मुझे ही लौटा रहे हों। जो चीज़ पहले से ही मेरी है, उसे आप मुझे कैसे लौटा सकते हैं? (प्रेरितों 17:25; भजन 50:10-11)। परमेश्वर ही सभी वस्तुओं का स्रोत है। परमेश्वर को छोड़कर हमारे जीवन का कोई अन्य स्रोत नहीं है (यशायाह 46:9)।

परमेश्वर का अस्तित्व स्वयं परमेश्वर से है – उत्पत्ति का स्रोत

हम बाइबल की शुरुआत में ही इस सत्य को देख सकते हैं। उत्पत्ति 1:1 कहता है, “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी को बनाया।” परमेश्वर ही वह है जिसने ज़मीन और आसमान को बनाया, और यह सब परमेश्वर की रचना है। आगे हम पाते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप और अपनी समानता में बनाया।

हमारी रचना भी परमेश्वर ने ही की है। हम सब का मूल स्रोत (Source) वही है। बहुत से बुद्धिमान लोग यह तर्क देते हैं कि यह सारा ब्रह्मांड “कुछ नहीं” (Nothing) से आया है। परंतु, क्षण भर के लिए विचार करें कि ‘कुछ नहीं’ से ‘कुछ’ कैसे आ सकता है?

यदि परमेश्वर का स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं होता, तो वह मानवजाति को उसके अस्तित्व में कैसे ला सकता था? हम सब का अस्तित्व में आना किसी न किसी कारण से है, और वह कारण परमेश्वर को छोड़कर और कुछ हो ही नहीं सकता। यही कारण है कि हम बिग बैंग सिद्धांत को नकार सकते हैं, जो कहता है कि यह सारा संसार एक बड़े विस्फोट से आया है। यह पूरी तरह से परमेश्वर के स्वयं-अस्तित्व के विपरीत है।

एक और महत्वपूर्ण बात जो हमें जाननी चाहिए: परमेश्वर को अस्तित्व में होने के लिए किसी कारण (Cause) की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर का अस्तित्व अनादि काल से ही मौजूद है (भजन 90:2)।

परमेश्वर का अस्तित्व तब शुरू नहीं हुआ जब आपने उसे जानना शुरू किया; बल्कि वह तो बहुत पहले से ही है। यहाँ तक कि इस संसार की रचना से पहले भी परमेश्वर का अस्तित्व था।

जब परमेश्वर ने मूसा पर जलती हुई झाड़ी में स्वयं को प्रकट किया, और मूसा ने परमेश्वर के नाम के विषय में पूछा, तब परमेश्वर ने उत्तर दिया था, “मैं जो हूँ सो हूँ” (निर्गमन 3:14)। यह कथन एक बार फिर परमेश्वर के स्वयं-अस्तित्व को दृढ़ता से स्थापित करता है—वह जो था, जो है, और जो हमेशा रहेगा।

परमेश्वर का स्वयं-अस्तित्व उसकी स्वतंत्रता से संबंध रखता है। परमेश्वर स्वयं में पूर्ण (Complete) है। उसे स्वयं को पूर्ण करने के लिए किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं है।

हमें यह समझने की आवश्यकता है कि परमेश्वर ने हमें इसलिए नहीं बनाया कि वह अकेलापन महसूस कर रहा था या उसे हमारी आवश्यकता थी। यह धारणा बिल्कुल गलत है (रोमियों 11:34-35)। परमेश्वर को किसी ने भी मजबूर नहीं किया, और न ही कोई कर सकता है। यहाँ तक कि हमारी आज्ञाकारिता से भी परमेश्वर को कोई लाभ नहीं होता (लूका 17:10)। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें उसकी आज्ञाओं को नहीं मानना चाहिए। यह सब परमेश्वर ने अपनी सिद्ध इच्छा (Perfect Will) से किया है (इफिसियों 1:5, 11)।

परमेश्वर का अस्तित्व

परमेश्वर का अस्तित्व सदा काल से है – अनंत महिमा

1 तीमुथियुस 6:16 में, प्रेरित पौलुस बताते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व सदा काल से है। परमेश्वर ने स्वयं को अपनी इच्छा के अनुसार हम पर प्रकट किया है। सिर्फ वही आदर और आराधना के योग्य है। हम अपनी सीमित मानवीय समझ से ऐसे महान परमेश्वर को नहीं ढूंढ सकते।

परमेश्वर ने स्वयं को हम पर इस प्रकार प्रकट किया है कि वह हमारी समझ के स्तर पर आकर, जितना हम उसे समझ सकते हैं, उतना ही हमें बताया। इसका उद्देश्य यह था कि हम परमेश्वर के वास्तविक अस्तित्व के बारे में जान सकें और व्यर्थ की मूर्तियाँ बनाकर उसकी पूजा न करें। सचमुच, ऐसे महान परमेश्वर को जानना अद्भुत है। चूंकि हमने पहले देखा था कि परमेश्वर आत्मा है, इसलिए हम उसे अपनी भौतिक समझ से नहीं जान सकते।

परमेश्वर को जानने के लिए हमें भी आत्मिक होना पड़ेगा। परंतु मानवजाति पाप के कारण आत्मिक नहीं है; वह घोर अंधकार में है। केवल मसीह यीशु को अपना परमेश्वर और उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करके ही हम परमेश्वर को जान सकते हैं, क्योंकि यीशु मसीह ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हमारी पहुँच पिता परमेश्वर के पास होती है।

परमेश्वर का स्वयं-अस्तित्व हमें इस बात का पूर्ण निश्चय दिलाता है कि हम उस पर निर्भर रह सकते हैं। परमेश्वर ने जो कुछ भी सोचा है, वह पूरा होकर ही रहेगा। उसे कोई भी टाल नहीं सकता (यशायाह 46:10)। परमेश्वर अपने वचन और अपनी प्रकृति में अटल है, और उसकी अनंतकालीन योजनाएँ निश्चित रूप से पूरी होंगी।

परमेश्वर का अस्तित्व और उनकी ‘स्वयं-पर्याप्तता’ (Self-Sufficiency) मसीही धर्मशास्त्र के सबसे गहरे और महत्वपूर्ण विषयों में से एक है। आपने जो ‘मैं जो हूँ सो हूँ’ (निर्गमन 3:14) के माध्यम से परमेश्वर की स्वतंत्रता और उनके अनादि स्वभाव को स्पष्ट किया है, वह पाठकों को यह समझने में मदद करेगा कि परमेश्वर मनुष्य की तरह किसी जरूरत से बंधा हुआ नहीं है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ): परमेश्वर का अस्तित्व

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