कलीसिया : मसीह की देह (The Body of Christ) – भाग 05

मसीह की देह the body of Christ  के बारे में आपने कलीसिया(Church) में अक्सर सुना होगा। यह एक गहन और महत्वपूर्ण बाइबल आधारित सिद्धांत है, जो विश्वासियों के आपस में और मसीह के साथ संबंध को दर्शाता है। जब हमने ‘पवित्र आत्मा के वरदान‘ (Gifts of the Holy Spirit) पर अध्ययन किया था,

तब भी हमने यह गहराई से समझा था कि ये वरदान किसी व्यक्तिगत दिखावे के लिए नहीं, बल्कि मसीह की देह की उन्नति, निर्माण और सशक्तिकरण के लिए ही दिए गए हैं (इफिसियों 4:11-16)। आज इस लेख में हम मसीह की देह के इस संपूर्ण सिद्धांत का विस्तार से अध्ययन करेंगे, ताकि हम अपनी पहचान और कलीसिया में अपने उद्देश्य को बेहतर ढंग से समझ सकें।

कलीसिया की दोहरी पहचान: देह और दुल्हन

पिछले लेख में आपने पढ़ा था कि कलीसिया ‘मसीह की दुल्हन  ‘ (Bride of Christ) है। वास्तव में कलीसिया की ये दोनों स्थितियाँ—’मसीह की देह’ और ‘मसीह की दुल्हन’—एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं और कलीसिया के अस्तित्व के दो अलग-अलग पहलुओं को दर्शाती हैं। आप इसे ऐसे समझ सकते हैं:

  1. मसीह की देह (Body of Christ): जब तक कलीसिया इस संसार में मौजूद है, वह मसीह के सांसारिक कार्य को जारी रखने के लिए एक ‘देह’ (Body) के रूप में कार्य करती है। मसीह सिर है, और विश्वासी उसके अंग हैं। इस रूप में, कलीसिया का उद्देश्य मसीह के प्रेम, सुसमाचार और शक्ति को संसार में प्रकट करना है। यह कलीसिया की कार्यशील, गतिशील और वर्तमान स्थिति को दर्शाती है।
  2. मसीह की दुल्हन (Bride of Christ): जब प्रभु यीशु मसीह बादलों पर कलीसिया को लेने के लिए आएंगे और कलीसिया उठा ली जाएगी (Rapture/उत्थान), तब वह स्वर्ग में प्रगट रूप में ‘मसीह की दुल्हन’ बन जाएगी। यह स्थिति कलीसिया के अंतिम और महिमामय भाग्य को दर्शाती है, जहाँ वह अपने दुल्हे, यीशु मसीह के साथ हमेशा के लिए संयुक्त हो जाएगी (प्रकाशितवाक्य 19:7-9)।

मसीह की देह की बाइबिल आधारित परिभाषा

प्रेरित पौलुस, जो कलीसिया के सिद्धांत का एक मुख्य शिक्षक था, स्पष्ट करता है कि कलीसिया कोई भौतिक इमारत या संस्था नहीं है, बल्कि उद्धार पाए हुए लोगों का समूह है।

The body of Christ मसीह की देह

इफिसियों 1:20-23 में वह यह सिद्धांत स्थापित करता है:“यह सामर्थ्य उसने मसीह में काम किया, जब उसने उसको मरे हुओं में से जिलाकर स्वर्गीय स्थानों में अपनी दाहिनी ओर बिठाया, और सब प्रकार की प्रधानता, और अधिकार, और सामर्थ्य, और प्रभुता के और हर एक नाम के ऊपर, जो न केवल इस लोक में, पर आनेवाले लोक में भी लिया जाएगा, बहुत ऊपर किया। और उस ने सब कुछ उसके पांवों के नीचे कर दिया, और उसे सब वस्तुओं पर कलीसिया का सिर ठहराया, जो उसकी देह है, और सब में सब कुछ भरनेवाले की परिपूर्णता है।

इस शास्त्र पद से मसीह की देह के बारे में तीन आवश्यक तथ्य उभरते हैं:

  1. यीशु मसीह सिर है: कलीसिया का सिर (Head) स्वयं यीशु मसीह है। इसका अर्थ है कि मसीह ही कलीसिया का अधिकार, नियंत्रण और जीवन का स्रोत है।
  2. विश्वासी अंग हैं: हर एक विश्वासी, जिसने उद्धार पाया है, इस देह का एक अंग (Member) है (1 कुरिन्थियों 12:12)।
  3. देह उसकी परिपूर्णता है: कलीसिया मसीह की वह अभिव्यक्ति है, जिसके द्वारा वह इस संसार में अपनी महिमा और कार्य को पूरा करता है। कलीसिया, जो उसकी देह है, ‘सब में सब कुछ भरनेवाले की परिपूर्णता’ है।

देह का उद्देश्य और कार्य

मसीह की देह होने के नाते, कलीसिया का उद्देश्य केवल एक स्थान पर इकट्ठे होना नहीं है, बल्कि मसीह के कार्य को आगे बढ़ाना है। यह देह सामंजस्य और एकता में कार्य करती है, जैसा कि 1 कुरिन्थियों 12:27 में पौलुस सिखाता है: “अब तुम सब मिलकर मसीह की देह हो, और अलग-अलग उसके अंग हो।”

इस देह के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:

  • सेवा और वरदानों का उपयोग: देह का हर अंग महत्वपूर्ण है और उसे मिले पवित्र आत्मा के वरदानों का उपयोग पूरी देह की सेवा और उन्नति के लिए करता है (रोमियों 12:4-8)।
  • मसीह जैसा बनना: देह का उद्देश्य बढ़कर हर बात में अपने सिर, मसीह के समान हो जाना है (इफिसियों 4:15)।
  • सुसमाचार का प्रसार: देह का सबसे महत्वपूर्ण कार्य सुसमाचार को पृथ्वी के छोर तक ले जाना है (मत्ती 28:19-20)।
  • एकता और प्रेम: देह के अंगों को आपस में प्रेम और एकता बनाए रखने की आवश्यकता है, जिससे संसार मसीह को जाने (यूहन्ना 13:35)।

इस प्रकार, ‘मसीह की देह’ का सिद्धांत हमें बताता है कि हम, विश्वासी, आपस में केवल दोस्त नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक इकाई का अविभाज्य हिस्सा हैं, जिसका सिर महिमामय प्रभु यीशु मसीह है।

कलीसिया : मसीह की आत्मिक देह का गहरा रहस्य

यह सत्य कि कलीसिया मसीह की देह है,  धर्मविज्ञान (Theology) के सबसे गहरे और सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। यह केवल एक रूपक नहीं, बल्कि एक आत्मिक वास्तविकता है जिसका रहस्य परमेश्वर ने प्रेरित पौलुस पर प्रगट किया था। बाइबल सिखाती है कि कलीसिया उन सभी विश्वासियों का सार्वभौमिक (Universal) समूह है, जिन्होंने यीशु मसीह को अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता स्वीकार किया है।

कलीसिया मसीह की देह कैसे बनी? (The Mystical Union)

परमेश्वर ने प्रेरित पौलुस को इस ‘भेद’ (Mystery) का प्रबंधन सौंपा था। पौलुस स्पष्ट रूप से सिखाता है:

  • पहचान: कुलुसियों 1:24 में, पौलुस घोषित करता है, “उस की देह के लिये, अर्थात कलीसिया के लिये।” यह बेझिझक स्थापित करता है कि कलीसिया ही पृथ्वी पर मसीह की आत्मिक देह है।
  • नेतृत्व: इसी अध्याय की 18वीं आयत (कुलुसियों 1:18) में, मसीह को इस देह का ‘सिर’ (Head) बताया गया है। जैसे मानव शरीर सिर के निर्देशन में काम करता है, वैसे ही कलीसिया मसीह के पूर्ण अधिकार और नियंत्रण में कार्य करती है।
  • सदस्यता: यह देह उन सभी लोगों से बनी है जिन्होंने यह विश्वास किया कि यीशु उनके पापों के लिए क्रूस पर मरे, गाड़े गए, और तीसरे दिन जिलाए गए। यह विश्वास ही मसीह के साथ आत्मिक बंधन की नींव है। एफिसियों 5:23 में पौलुस लिखता है कि मसीह कलीसिया का उद्धारकर्ता भी है।

कलीसिया (The Church) का अस्तित्व पिन्तेकुस्त के दिन (प्रेरितों के काम 2) पवित्र आत्मा के आगमन के साथ शुरू हुआ, जब विश्वासियों का पहला समूह मसीह की देह में जोड़ा गया।

मसीह की देह में शामिल कैसे हों? (The Spirit Baptism)

कई लोग सोचते हैं कि मसीह की इस आत्मिक देह का हिस्सा बनने के लिए किसी धार्मिक रीति या सदस्यता फॉर्म को भरने की आवश्यकता है। बाइबल इसका स्पष्ट और आत्मिक उत्तर देती है, जो किसी भी मानवीय प्रयास से परे है:

The body of Christ मसीह की देह
  • पवित्र आत्मा का बपतिस्मा: 1 कुरिन्थियों 12:13 में पौलुस समझाता है, “क्योंकि हम सब ने एक ही आत्मा के द्वारा एक देह होने के लिये बप्तिस्मा लिया।”
    • यहाँ पर पौलुस शारीरिक पानी के बपतिस्मे (Water Baptism) की बात नहीं कर रहा, बल्कि पवित्र आत्मा के बपतिस्मे‘ (Baptism of the Holy Spirit) की बात कर रहा है।
    • यह बपतिस्मा एक आत्मिक क्रिया है, जो मसीही बनने के क्षण ही होती है। जब कोई व्यक्ति सच्चे मन से अपने पापों का पश्चाताप करता है और यीशु को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता स्वीकार करता है, तो उसी क्षण पवित्र आत्मा उसे लेकर मसीह की देह में ‘गाड़’ देता है।
  • परिणाम: इस आत्मिक जोड़ के लिए किसी विशेष अनुष्ठान, चर्च की सदस्यता, या किसी अन्य रीति-रिवाज की आवश्यकता नहीं है। मसीह की देह में शामिल होने का एकमात्र साधन पापों की क्षमा और यीशु मसीह में विश्वास है। एक बार जुड़ने के बाद, विश्वासी उसी आत्मा के द्वारा मसीह की देह के एक सदस्य, यानी अंग बन जाते हैं (1 कुरिन्थियों 12:27)।

मसीह की देह के विषय में गलत शिक्षाएं और बाइबल की सच्चाई (Addressing Misconceptions)

समाज में मसीह की देह की प्रकृति को लेकर कुछ भ्रम या गलत शिक्षाएं फैलाई जाती हैं। बाइबल की स्पष्ट शिक्षा इन भ्रमों को दूर करती है:

  1. “केवल हमारी स्थानीय कलीसिया ही मसीह की देह है”: यह एक संकीर्ण और गैर-बाइबल दृष्टिकोण है। कुछ समूह यह सिखाते हैं कि मसीह की देह केवल उनके चर्च, संप्रदाय, या समूह तक सीमित है, और यदि कोई उनसे नहीं जुड़ा है, तो वह उद्धार नहीं पा सकता।
    • बाइबलिक सत्य: इफिसियों 4:4 कहता है, “देह एक ही है और आत्मा एक ही…” मसीह की देह (The Church) एक सार्वभौमिक देह है, जिसमें दुनिया भर के सभी सच्चे विश्वासी शामिल हैं, चाहे वे किसी भी स्थानीय चर्च में जाते हों या न जाते हों। कोई भी स्थानीय चर्च मसीह की सार्वभौमिक देह नहीं हो सकता, बल्कि वह इस देह का एक स्थानीय प्रदर्शन या हिस्सा मात्र है।
  2. “मसीह की देह की शुरुआत केवल पौलुस से हुई”: कुछ लोग इस सिद्धांत को मानते हैं कि कलीसिया के रहस्य को जानने वाले पहले व्यक्ति पौलुस थे, इसलिए देह का अस्तित्व उनके मिशन के साथ ही शुरू हुआ।
    • बाइबलिक सत्य: यह सिद्धांत बाइबल के अन्य तथ्यों के विरुद्ध है। पौलुस स्वयं इस बात की पुष्टि करता है कि मसीह में विश्वासी उससे पहले भी थे।
      • रोमियों 16:7 में वह “अपने कुटुम्बियों और मेरे साथ क़ैद रहे हुए अन्द्रोनिकुस और यूनियास को नमस्कार; जो प्रेरितों में नामी हैं; और मुझ से पहिले मसीह में हो चुके हैं।”
      • गलातियों 1:13 में, वह बताता है कि वह पहले ‘परमेश्वर की कलीसिया ‘ को सताता था। यह स्पष्ट करता है कि पौलुस के उद्धार से पहले ही एक स्थापित कलीसिया मौजूद थी।
  3. “पुराने नियम के सभी संत मसीह की देह में हैं”: कुछ लोग मानते हैं कि नूह, हाबिल, अब्राहम, और पुराने नियम के अन्य विश्वासी भी कलीसिया (मसीह की देह) का हिस्सा हैं।
    • बाइबलिक सत्य: यीशु मसीह ने मत्ती 16:18 में भविष्य काल में कहा था, “मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा।” यहाँ ‘बनाऊँगा’ शब्द भविष्य में होने वाली एक नई चीज की ओर संकेत करता है।
    • कलीसिया मसीह की देह का समय एक विशिष्ट कालखंड है, जिसकी शुरुआत पवित्र आत्मा के पिन्तेकुस्त के दिन आने से हुई और इसका अंत कलीसिया के उठाए जाने (Rapture) पर होगा। पुराने नियम के संतों का उद्धार विश्वास के माध्यम से हुआ था (रोमियों 4:3), लेकिन वे राष्ट्र इस्राएल के हिस्से थे, न कि मसीह की देह कलीसिया के।

मसीह की देह के बारे में 6 मुख्य बातें

बाइबल के अनुसार, नए नियम के सभी सच्चे विश्वासी मिलकर एक आध्यात्मिक और अदृश्य इकाई का निर्माण करते हैं, जिसे ‘मसीह की देह’ (Body of Christ) कहा गया है। यह एक गहन और सुंदर सत्य है जो कलीसिया (Church) के स्वरूप, कार्य और उद्देश्य को परिभाषित करता है। इसकी मुख्य और विस्तारित विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. अखंड और अद्वितीय एकता (Unity):
    • मूल तथ्य: हम सब एक ही पवित्र आत्मा के बपतिस्मे के द्वारा एक देह बनाए गए हैं (1 कुरिन्थियों 12:13)।
    • विस्तार: यह एकता मानव निर्मित या किसी संगठन की सदस्यता से उत्पन्न नहीं होती, बल्कि यह पवित्र आत्मा का ईश्वरीय कार्य है। आत्मा के बपतिस्मे के द्वारा, हर विश्वासी (चाहे उसकी पृष्ठभूमि, जाति, या सामाजिक स्थिति कुछ भी हो) मसीह की देह का एक अंग बन जाता है। इस एकता में कोई विभाजन नहीं है—यह मौलिक और आत्मिक है। यह बाहरी रूप से विविधता होते हुए भी आंतरिक रूप से मसीह में समाहित होने का प्रमाण है।
  2. साझा और बहता हुआ जीवन (One Life):
    • मूल तथ्य: कलीसिया में पवित्र आत्मा के द्वारा दिया गया मसीह का जीवन बहता है।
    • विस्तार: जिस प्रकार मानव शरीर में रक्त पूरे अंगों को जीवन और पोषण देता है, उसी प्रकार पवित्र आत्मा द्वारा दिया गया मसीह का ईश्वरीय, शाश्वत जीवन कलीसिया के हर सदस्य में निरंतर प्रवाहित होता है। यह जीवन न केवल हमारी पहचान का स्रोत है बल्कि हमें मसीह के स्वभाव में बढ़ने और फल लाने की शक्ति भी देता है। यह जीवन हमें संसार से अलग करता है और हमें स्वर्गीय आशा से भरता है।
  3. ईश्वरीय पद और नियुक्ति (Divine Appointment):
    • मूल तथ्य: परमेश्वर ने हर अंग (विश्वासी) को अपनी इच्छा से एक खास स्थान पर रखा है (1 कुरिन्थियों 12:18)। अंग देह के बाहर रहकर जीवित नहीं रह सकता।
    • विस्तार: देह के हर अंग का एक निश्चित, ईश्वरीय रूप से सौंपा गया कार्य और स्थान होता है। यह हमारी अपनी पसंद या योग्यता पर आधारित नहीं है, बल्कि परमेश्वर की संप्रभु इच्छा पर निर्भर करता है। कोई अंग छोटा या महत्वहीन नहीं होता। जैसे आँख या कान एक-दूसरे का कार्य नहीं कर सकते, वैसे ही हर विश्वासी को देह की संपूर्णता और स्वास्थ्य के लिए अपने विशिष्ट स्थान पर स्थिर रहना आवश्यक है। देह से अलग होना मृत्यु के समान है, क्योंकि जीवन का स्रोत (मसीह) और पोषण (अन्य अंग) देह में ही पाए जाते हैं।
  4. आत्मिक वरदानों की बहुतायत (Spiritual Gifts):
    • मूल तथ्य: हर अंग के पास कोई न कोई आत्मिक वरदान अवश्य है (रोमियों 12:3)।
    • विस्तार: मसीह ने कलीसिया के निर्माण और सेवा के लिए अपने हर सदस्य को पवित्र आत्मा के माध्यम से विशिष्ट क्षमताएँ और वरदान प्रदान किए हैं। ये वरदान अलग-अलग हो सकते हैं, जैसे सिखाना, सेवा करना, दान देना, अगुआई करना, दया दिखाना, या भविष्यवाणी करना, लेकिन वे सभी आत्मा के एक ही स्रोत से आते हैं। किसी भी विश्वासी को स्वयं को वरदान रहित नहीं समझना चाहिए। ये वरदान हमें देह की सामूहिक सेवकाई में भागीदारी करने के लिए दिए गए हैं।
  5. सेवा का उत्कृष्ट उद्देश्य (Purpose of Service):
    • मूल तथ्य: वरदान खुद के लिए नहीं, बल्कि कलीसिया की उन्नति के लिए दिए गए हैं।
    • विस्तार: आत्मिक वरदानों का प्राथमिक उद्देश्य व्यक्तिगत महिमा या लाभ नहीं है, बल्कि ‘संतों को सिद्ध करने’ (इफिसियों 4:12) और मसीह की देह को प्रेम में मजबूत करने के लिए है। हर विश्वासी का वरदान तब तक अपना उद्देश्य पूरा नहीं करता जब तक वह दूसरों की सहायता, प्रोत्साहन और निर्माण के लिए उपयोग न किया जाए। यह परोपकारी और मसीह-केंद्रित सेवा ही देह के स्वस्थ विकास का प्रमाण है।
  6. गहन और अनिवार्य परस्पर निर्भरता (Mutual Interdependence):
    • मूल तथ्य: जैसे शरीर के अंग एक-दूसरे का ख्याल रखते हैं, वैसे ही हमें एक-दूसरे की जरूरत है। कोई भी विश्वासी अकेला पूर्ण नहीं है (इफिसियों 4:16)।
    • विस्तार: मानव शरीर का हर अंग दूसरे पर निर्भर करता है; एक उंगली का दर्द पूरे शरीर को प्रभावित करता है। इसी तरह, मसीह की देह में कोई भी सदस्य आत्मनिर्भर नहीं है। सबसे मजबूत दिखने वाले विश्वासी को भी सबसे कमजोर दिखने वाले सदस्य की आवश्यकता होती है। यह परस्पर निर्भरता हमें नम्रता सिखाती है और प्रेम में एक-दूसरे की देखभाल करने, सहानुभूति रखने और एक-दूसरे के बोझ उठाने के लिए प्रेरित करती है। मसीह रूपी सिर द्वारा हर जोड़ (अंग) को प्रदान की गई सहायता से ही पूरी देह सुगठित होती है और प्रेम में अपनी वृद्धि करती है।

निष्कर्ष का विस्तार: मसीह की देह, कलीसिया की गहराई

परिचय: कलीसिया की पहचान

आज के अध्ययन से हमने यह अत्यंत महत्वपूर्ण और मूलभूत सत्य सीखा कि कलीसिया (चर्च) केवल एक इमारत या संगठन नहीं है, बल्कि वह स्वयं मसीह की जीवित और गतिशील देह है। यह एक आध्यात्मिक वास्तविकता है जिसे मानव निर्मित संरचनाओं से कहीं अधिक समझा जाना चाहिए। पवित्र आत्मा ने इस देह को बड़ी सावधानी और उद्देश्य के साथ संसार में बुलाया और एक-दूसरे से जोड़ा है, जिससे यह एकता, प्रेम और उद्देश्य का एक सशक्त प्रतीक बन सके।

कलीसिया के अनिवार्य तत्व

कलीसिया के सफल और प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए कुछ सिद्धांत अनिवार्य हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

  1. प्रेम (Love): मसीह की देह का प्राथमिक और सबसे बड़ा चिन्ह आपसी प्रेम है। जैसा कि बाइबल सिखाती है, यह प्रेम ही है जो संसार को यह बताएगा कि हम उसके शिष्य हैं। यह निस्वार्थ, क्षमाशील और त्यागपूर्ण होना चाहिए, जैसा कि मसीह ने हमसे प्रेम किया।
  2. विश्वासयोग्यता (Faithfulness): परमेश्वर के वचन और शिक्षाओं के प्रति अटूट विश्वासयोग्यता कलीसिया की नींव है। हमें न केवल सिद्धांतों पर दृढ़ रहना है, बल्कि अपने बुलाहट और सेवकाई में भी निरंतर विश्वसनीय बने रहना है।
  3. एकता (Unity): अनेक सदस्य, एक देह। पवित्र आत्मा ने हमें भले ही विभिन्न पृष्ठभूमि, भाषाओं और संस्कृतियों से बुलाया हो, लेकिन मसीह में हमारी एक पहचान है। यह एकता आत्मा की एकता को बनाए रखने में परिश्रम करने से आती है, जो परमेश्वर के प्रेम और उद्देश्य का प्रमाण है।

कलीसिया का समय और उद्देश्य

कलीसिया का इस पृथ्वी पर एक स्पष्ट समय-सीमा और उद्देश्य है:

  • समय-सीमा: कलीसिया का समय तब तक है जब तक कि प्रभु यीशु मसीह स्वयं बादलों पर हमें लेने के लिए उठाए (Rapture) नहीं जाते। यह आशा हमें हमारे वर्तमान जीवन में पवित्रता, तत्परता और उत्साह के साथ जीने के लिए प्रेरित करती है।
  • कर्तव्य और सेवकाई: इस उठाए जाने की महान घटना तक, हमारा सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है कि हम अपने वरदानों (Spiritual Gifts) के द्वारा इस देह की उन्नति करें। परमेश्वर ने कलीसिया के प्रत्येक सदस्य को आत्मा द्वारा कोई न कोई विशेष वरदान दिया है – चाहे वह सिखाने का हो, सेवा करने का हो, दान देने का हो, अगुआई करने का हो, या दया दिखाने का हो। इन वरदानों का उपयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि पूरी देह की वृद्धि और मसीह में सिद्धता के लिए होना चाहिए।

अंतिम आह्वान

निष्कर्षतः, कलीसिया परमेश्वर की महान योजना का केंद्र है। हमें इस जीवित देह के एक भाग होने के विशेषाधिकार को गंभीरता से लेना चाहिए। प्रेम, विश्वासयोग्यता और एकता में बढ़ते हुए, और अपने वरदानों का सक्रिय रूप से उपयोग करते हुए, हमें मसीह के द्वितीय आगमन तक उसकी देह की उन्नति और महिमा करने के लिए समर्पित रहना चाहिए।


मसीह की देह: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)


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