दिन 30: समर्पण का जीवन—एक जीवित बलिदान

समर्पण का जीवन— Romans 12:1

अब तक हमने पवित्र आत्मा के बारे में जो कुछ भी सीखा—चाहे वह उसका फल हो, वरदान हो, या उसकी सामर्थ्य—उन सबका निचोड़ आज के इस शब्द में है: पूर्ण समर्पण। पवित्र आत्मा आपके जीवन में तब सबसे प्रभावी ढंग से कार्य करता है, जब वह केवल एक ‘अतिथि’ नहीं, बल्कि आपके जीवन का ‘स्वामी’ … Read more

दिन 29: मसीह का स्वरूप—महिमा से महिमा तक

मसीह का स्वरूप 2 Cor 3:18

दिन 29 असल में उस ‘अनंत प्रक्रिया’ की शुरुआत है जिसे “मसीह के स्वरूप में बदलना” (Christlikeness) कहते हैं। यही पवित्र आत्मा का अंतिम और सबसे महान लक्ष्य है—आपको एक बेहतर इंसान बनाना ही नहीं, बल्कि आपको यीशु जैसा बनाना। प्रेरित पौलुस उस अलौकिक परिवर्तन के बारे में बताता है जो हमारे भीतर तब होता … Read more

दिन 28: आत्मा के अनुसार चलना—एक निरंतर यात्रा

आत्मा के अनुसार चलना Walk in the Spirit Gal 5:16

आज हम उस ‘जीवनशैली’ पर गौर करेंगे जो इन सब बातों को एक साथ जोड़ती है—आत्मा के अनुसार चलना। यह कोई एक दिन की घटना नहीं, बल्कि मसीही जीवन का हर पल जीने का तरीका है।प्रेरित पौलुस गलातियों को वह रहस्य बताता है जिसके द्वारा हम पाप पर स्थायी विजय पा सकते हैं: “परन्तु मैं … Read more

दिन 27: आत्मा को न बुझाना—पवित्र अग्नि को प्रज्वलित रखना

आत्मा को न बुझाना Do not quench the Spirit

आज हम एक बहुत ही गंभीर चेतावनी और जिम्मेदारी पर गौर करेंगे। पवित्र आत्मा एक ‘व्यक्ति’ है, और वह हमारे भीतर एक ‘अग्नि’ की तरह वास करता है। जैसे एक आग को बुझाया जा सकता है, वैसे ही हमारे व्यवहार से आत्मा की सक्रियता हमारे जीवन में कम हो सकती है। प्रेरित पौलुस थिस्सलुनीकियों को … Read more

दिन 26: सताव में साहस—संकट के समय की वाणी

सताव में साहस courage in persecution Mark 13:11

हम उस सामर्थ्य की ओर बढ़ रहे हैं जो केवल शांति के समय ही नहीं, बल्कि तूफान और विरोध के समय भी हमारे साथ रहती है। कल हमने वचन की समझ के बारे में सीखा, लेकिन आज हम सीखेंगे कि जब दुनिया हमारे विश्वास का विरोध करती है, तब पवित्र आत्मा कैसे हमारी ढाल और … Read more

दिन 25: वचन की समझ—स्वर्गीय रहस्यों का उद्घाटन

वचन की समझ 1 Cor 2:10

आज हम उस दिव्य प्रकाश के बारे में सीखेंगे जो हमारी बुद्धि को खोलता है। बाइबल केवल एक किताब नहीं है; यह परमेश्वर का जीवित वचन है, और इसे समझने के लिए हमें उसी लेखक (पवित्र आत्मा) की सहायता चाहिए जिसने इसे लिखवाया है। प्रेरित पौलुस कुरिन्थियों को समझाता है कि मानवीय बुद्धि परमेश्वर की … Read more

दिन 24: प्रार्थना में सहायता—निःशब्द प्रार्थना की सामर्थ्य

प्रार्थना में सहायता Romans 8:26

आज हम पवित्र आत्मा के उस कार्य पर गौर करेंगे जो हमारी सबसे निजी और गहरी कमजोरी में हमारी सहायता करता है—हमारी प्रार्थना का जीवन। अक्सर हम ऐसी परिस्थितियों से गुजरते हैं जहाँ शब्द छोटे पड़ जाते हैं और हमारा मन व्याकुल होता है। ऐसे समय में, पवित्र आत्मा हमारे लिए ‘स्वर्गीय अनुवादक’ और ‘मध्यस्थ’ … Read more

दिन 23: आत्मिक वरदान—कलीसिया की उन्नति के लिए उपहार

आत्मिक वरदान Spiritual Gifts 1 Cor 12:7

 हम उस सामर्थ्य के व्यावहारिक स्वरूप को देखेंगे—आत्मिक वरदान। परमेश्वर ने आपको केवल बचाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी योजना में एक विशिष्ट भूमिका निभाने के लिए बुलाया है।प्रेरित पौलुस कुरिन्थियों की कलीसिया को समझाता है कि पवित्र आत्मा की उपस्थिति का प्रमाण केवल व्यक्तिगत शांति नहीं, बल्कि सेवा की योग्यता भी है: “किन्तु सब … Read more

दिन 22: गवाही के लिए सामर्थ्य—निडरता का अभिषेक

गवाही के लिए सामर्थ्य Acts 1:8

अब तक हमने पवित्र आत्मा के स्वभाव और हमारे चरित्र में उसके ‘फल’ को देखा। अब हम देखेंगे कि कैसे वह हमें अपने घेरे से बाहर निकालकर दुनिया को बदलने वाली सामर्थ्य देता है।यीशु मसीह ने स्वर्गारोहण से ठीक पहले अपने चेलों को एक ऐसी प्रतिज्ञा दी, जिसने इतिहास की धारा बदल दी: “परन्तु जब … Read more

दिन 21: नम्रता और संयम—नियंत्रित सामर्थ्य

नम्रता और संयम 2 Tim 1:7

हम ‘आत्मा के फल’ के उन दो मुकुटों पर गौर करेंगे जो एक परिपक्व मसीही जीवन की पहचान हैं—नम्रता और संयम। अक्सर दुनिया ‘शक्ति’ का अर्थ दूसरों पर अधिकार जमाना मानती है, लेकिन मसीहियत में असली शक्ति स्वयं पर नियंत्रण पाने और दूसरों के सामने झुकने में है।प्रेरित पौलुस युवा तीमुथियुस को उसके डर और … Read more