दिन 20: भलाई और विश्वास—सक्रिय धार्मिकता का जीवन

भलाई और विश्वास 2 Thess 1:11

भलाई और विश्वास’ हमें मैदान में उतरकर परमेश्वर के लिए कार्य करना सिखाते हैं।प्रेरित पौलुस थिस्सलुनीकियों की कलीसिया के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली प्रार्थना करता है, जो आज हमारे लिए भी एक ब्लूप्रिंट (नीला नक्शा) है: “इसी लिये हम सदा तुम्हारे लिये प्रार्थना भी करते हैं, कि हमारा परमेश्वर तुम्हें इस बुलाहट के योग्य समझे, … Read more

दिन 18: आनंद और शांति—परिस्थितियों से परे का राज्य

आनंद और शांति Romans 14:17

आज हम उस आत्मिक फल के अगले दो महत्वपूर्ण हिस्सों पर गौर करेंगे—आनंद और शांति। दुनिया अक्सर खुशी और सुकून को बाहरी परिस्थितियों में ढूँढती है, लेकिन एक मसीही के लिए ये दोनों चीजें एक ‘राज्य’ का हिस्सा हैं जो हमारे भीतर है।प्रेरित पौलुस रोम के विश्वासियों को समझाता है कि मसीही जीवन केवल नियमों, … Read more

दिन 19: धीरज और कृपा—कठिन समय और कठिन लोगों पर जय

धीरज और कृपा Gala 5:22

 आज हम पवित्र आत्मा के उन गुणों पर गौर करेंगे जो हमारे संबंधों और व्यवहार को निखारते हैं—धीरज और कृपा। अक्सर हमारे जीवन में ऐसे ‘कठिन’ लोग और परिस्थितियाँ आती हैं जो हमारे धैर्य की परीक्षा लेती हैं। ऐसे समय में हमारा मानवीय स्वभाव झल्लाहट या क्रोध से भर जाता है। लेकिन पवित्र आत्मा हमें … Read more

दिन 17: प्रेम (अगापे)—परमेश्वर का उंडेला हुआ प्रेम

आज हम उस फल के सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण अंश पर गौर करेंगे—प्रेम। बाइबल के अनुसार, प्रेम केवल एक भावना नहीं है, बल्कि यह मसीही जीवन का आधार है। बिना प्रेम के, हमारे अन्य सभी गुण और कार्य व्यर्थ हैं। प्रेरित पौलुस रोमियों को लिखे अपने पत्र में एक बहुत ही सुंदर और गहरी … Read more

दिन 16: फल बनाम कार्य—स्वभाव का परिवर्तन

फल बनाम कार्य Work vs Fruit Gala 5:19-22

एक मसीही जीवन की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि वह क्या ‘कहता’ है, बल्कि इस बात से होती है कि उसके जीवन में क्या ‘पैदा’ हो रहा है।प्रेरित पौलुस गलातियों की कलीसिया को दो बहुत ही स्पष्ट सूचियों के माध्यम से हमारे जीवन के ‘उत्पादन’ को समझाता है: “शरीर के काम तो … Read more

दिन 15: आत्मा से भरते जाओ—एक निरंतर प्रक्रिया

आत्मा से भरते जाओ Filled with Holy Spirit Ephesian 5:18

अक्सर मसीही जीवन में हम एक बड़ी गलती करते हैं—हम सोचते हैं कि एक बार पवित्र आत्मा पा लेना ही काफी है। लेकिन प्रेरित पौलुस हमें एक गहरा रहस्य बताता है जो हमारे आत्मिक जीवन की ‘ताजगी’ को बनाए रखता है। “और दाखमधु से मतवाले न बनो, क्योंकि इससे लुचपन होता है, पर आत्मा से … Read more

दिन 14: अविश्वास पर जय—सच्चे विश्वास का साहस

अविश्वास पर जय John 16:9

हम उस महान विजय पर गौर करेंगे जो पवित्र आत्मा हमारे जीवन में लाता है। कल हमने ‘पाप के बोध’ के बारे में सीखा, लेकिन आज हम उस ‘मूल पाप’ (Root Sin) के बारे में सीखेंगे जिसे पवित्र आत्मा जड़ से उखाड़ फेंकता है—अविश्वास। यीशु मसीह ने पवित्र आत्मा के कार्य को समझाते हुए एक … Read more

दिन 13: पाप का बोध—पवित्र आत्मा की प्रेमभरी ताड़ना

जब पवित्र आत्मा हमें नया जीवन देता है, तो वह हमें केवल जीवित ही नहीं करता, बल्कि वह हमारे भीतर एक आत्मिक अलार्म (Spiritual Alarm) भी लगा देता है। आज हम पवित्र आत्मा के उस कार्य को समझेंगे जो सुनने में शायद थोड़ा कड़वा लगे, लेकिन यह हमारे उद्धार और पवित्रता के लिए सबसे अनिवार्य … Read more

यीशु मसीह के क्रूस पर आखिरी 7 वचन: एक विस्तृत परिचय

यीशु मसीह के क्रूस पर आख़िरी वचन

यीशु मसीह के आख़िरी वचन यीशु मसीह के क्रूस पर कहे गए आखिरी वचन न केवल ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि गहन आत्मिक और धार्मिक अर्थ भी रखते हैं। यह एक सर्वमान्य मानवीय समझ है कि जब कोई व्यक्ति मृत्यु के कगार पर होता है, तो उसके मुख से निकले शब्द उसके हृदय की … Read more

दिन 12: नया जन्म—मृत से जीवित की ओर

नया जन्म (Regeneration Titus 3:5

 हमने ‘छाप’, ‘बपतिस्मा’ और ‘बयाने’ के बारे में गहराई से समझा। आज हम उस बुनियादी और चमत्कारी कार्य पर गौर करेंगे, जिसके बिना कोई भी व्यक्ति मसीही जीवन की शुरुआत नहीं कर सकता—नया जन्म (Regeneration)।प्रेरित पौलुस तीतूस को लिखे अपने पत्र में उद्धार की उस सुंदर प्रक्रिया को समझाता है, जहाँ हमारी अपनी ‘भलाई’ का … Read more