कलीसिया के दूसरे नाम: परमेश्वर के साथ कलीसिया के गहरे संबंध का प्रकटीकरण | Other Names of the Church – 03

कलीसिया के दूसरे नाम | Other Names of the Church – एक परिचय

Other Names of the Church कलीसिया के दूसरे नाम

परमेश्वर के वचन, बाइबल में, कलीसिया को केवल एक ही नाम से नहीं पुकारा गया है। बाइबल हमें कलीसिया के कई दूसरे नामों से परिचित कराती है, जो न केवल इसकी पहचान को दर्शाते हैं बल्कि परमेश्वर और उसके लोगों के बीच के असाधारण और अंतरंग संबंध को भी उजागर करते हैं। इस अध्ययन के भाग 03 में, हम कलीसिया के ऐसे ही अन्य नामों पर गहराई से विचार करेंगे।

आप अब तक के भागों में यह स्पष्ट रूप से सीख चुके हैं कि ‘कलीसिया ‘ शब्द का मूल अर्थ क्या है (‘बुलाए हुए लोग’) और संसार में इसके कौन-कौन से मुख्य प्रकार हैं (जैसे कि सार्वभौमिक, स्थानीय, और मसीही कलीसिया )। आज हम इस ज्ञान की नींव पर और अधिक निर्माण करेंगे, जिसमें हम उन प्रतीकात्मक नामों का अध्ययन करेंगे जो स्वयं पवित्र आत्मा ने कलीसिया को दिए हैं।

ठीक वैसे ही जैसे हमने पवित्र आत्मा के विभिन्न प्रतीकों (जैसे कबूतर, आग, तेल, जल) के माध्यम से उसके बहुआयामी चरित्र और कार्यों को समझा था, उसी तरह कलीसिया के ये विविध नाम हमें परमेश्वर कलीसिया को किस तरह देखता है और कलीसिया को किस महान उद्देश्य के लिए बुलाया गया है—इस सत्य को समझने में सहायता करेंगे। ये नाम मात्र पदवियाँ नहीं हैं; वे ईश्वरीय सत्य की खिड़कियाँ हैं जो हमें परमेश्वर  के प्रेम, सामर्थ्य और योजना की ओर झाँकने देती हैं।

बाइबल में कलीसिया के लिए इन नामों का उपयोग परमेश्वर के उद्देश्यपूर्ण मार्गदर्शन को दर्शाता है। प्रत्येक नाम यह बताता है कि परमेश्वर अपनी कलीसिया को कैसे संभालता है, उसकी सुरक्षा कैसे करता है, और कैसे उसे पोषण देता है। जिन नामों को आप आज सीखने जा रहे हैं, उनमें से कुछ तो आपने मसीही शिक्षा या उपदेशों में अवश्य ही सुने होंगे। आज का समय मात्र सुनने का नहीं, बल्कि उनके अर्थ की गहनता और बाइबिल के संदर्भों में उनका अध्ययन करने का है। हम केवल नामों को नहीं जानेंगे, बल्कि हम जानेंगे कि वे नाम कलीसिया के चरित्र और उसकी ईश्वरीय बुलाहट के बारे में क्या प्रकट करते हैं।

ये सभी महत्वपूर्ण नाम सीधे परमेश्वर  के प्रेरित वचन, बाइबल  से लिए गए हैं, जिसका अर्थ है कि वे अचूक और आधिकारिक हैं।

यदि आप प्रभु यीशु मसीह की देह, यानी कलीसिया से पूरी लगन के साथ जुड़े हुए हैं, तो यह लेख आपके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और आवश्यक है। यह आपकी आत्मिक समझ को एक नए स्तर पर खोल देगा। यह आपको यह स्पष्ट रूप से समझने में मदद करेगा कि कैसे हमारे सर्वशक्तिमान परमेश्वर  ने, अपनी अनंत बुद्धि में, कलीसिया के इस अद्भुत और पवित्र भेद (Mystery) को इतनी सुंदरता और भव्यता के साथ अपने वचन में प्रकट किया है। इस अध्ययन के माध्यम से, आप कलीसिया के प्रति अपने दृष्टिकोण और भागीदारी को मजबूत करने के लिए तैयार हो जाएँगे।

बाइबल के अनुसार कलीसिया के विविध और गहन नाम

बाइबल  में कलीसिया (चर्च) को कई उपनामों और प्रतीकात्मक रूपकों से पुकारा गया है, जो परमेश्वर के साथ उसके अटूट संबंध और पृथ्वी पर उसकी भूमिका को दर्शाते हैं। इन नामों का एक साथ अध्ययन करना, उनकी गहराई को समझना और कलीसिया के सही अर्थ को जानना हर विश्वासी के लिए महत्वपूर्ण है। ये नाम हमें बाइबल  पढ़ते समय उसके संदर्भ को समझने और कलीसिया के महत्व को महसूस करने में मदद करते हैं।

Other Names of the Church कलीसिया के दूसरे नाम

1. परमेश्वर का मंदिर (Temple of God) और उसका निवास स्थान

कलीसिया को दिए गए नामों में ‘परमेश्वर का मंदिर’ सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक है। यह केवल एक भौतिक संरचना नहीं, बल्कि आत्मिक वास्तविकता को दर्शाता है।

  • परमेश्वर की रचना (God’s Building/Field) (1 कुरिन्थियों 3:9): कलीसिया परमेश्वर के हाथों की बनाई हुई है। यह एक खेती के समान है, जिसकी देखरेख और विकास परमेश्वर करता है, और एक इमारत के समान है जिसका निर्माण वह स्वयं करता है। यह नाम बताता है कि कलीसिया किसी मनुष्य की कल्पना या प्रयास का परिणाम नहीं, बल्कि सीधे परमेश्वर  की संप्रभु इच्छा का फल है।
  • परमेश्वर का मंदिर (1 कुरिन्थियों 3:16): यह रूपक पुराने नियम के पवित्र स्थान—मिलापवाले तंबू और बाद में यरूशलेम के मंदिर—की ओर संकेत करता है। पुराने नियम में, परमेश्वर  का निवासस्थान इन भौतिक ढांचों में था, जहाँ उसकी महिमा प्रकट होती थी। नए नियम में, यह सत्य बदल गया है। अब कलीसिया , यानी विश्वासियों का समूह, स्वयं परमेश्वर का पवित्र मंदिर है। इसका अर्थ है कि परमेश्वर  का आत्मा, जो पहले मंदिर के गर्भगृह में रहता था, अब हर विश्वासी और पूरे कलीसियाई समूह में वास करता है। इसलिए, कलीसिया की पवित्रता और आराधना का महत्व अत्यंत बढ़ जाता है।
  • परमेश्वर का निवास स्थान (इफिसियों 2:22): प्रेरित पौलुस समझाता है कि विश्वासियों को मसीह यीशु में एक साथ जोड़ा जा रहा है ताकि वे परमेश्वर के लिए एक पवित्र निवास स्थान बनें, जहाँ पवित्र आत्मा के द्वारा परमेश्वर  निवास करता है। यह नाम कलीसिया के एकता के पहलू पर जोर देता है—कि अलग-अलग लोग मिलकर परमेश्वर के रहने की जगह बन रहे हैं।
  • परमेश्वर का घर (1 तीमुथियुस 3:15): यह रूपक परिवारिक संबंध और व्यवस्था को दर्शाता है। कलीसिया परमेश्वर  का घराना है, जिसका मुखिया स्वयं परमेश्वर है, और जिसके सदस्य आपस में आत्मिक भाई-बहन हैं। यह नाम कलीसिया के भीतर अनुशासन, प्रेम, और परमेश्वर के सत्य का पालन करने की आवश्यकता को स्थापित करता है।

ये नाम कलीसिया और परमेश्वर  के बीच के अटूट, आंतरिक और पवित्र संबंध को दर्शाते हैं। आगे बढ़ने से पहले, हमें प्रार्थना और बाइबल  अध्ययन के साथ इस गहराई को समझने के लिए खुद को तैयार करना चाहिए।

2. परमेश्वर की रचना (God’s Building) और उसका आधार

कलीसिया को एक ‘रचना’ या ‘इमारत’ के रूप में देखना हमें उसके निर्माण, बनावट और उसके आधारभूत सिद्धांत को समझने में मदद करता है।

  • नींव और आधार—यीशु मसीह (1 कुरिन्थियों 3:10-11): यदि कलीसिया एक इमारत है, तो उसकी नींव अत्यंत महत्वपूर्ण है। बाइबल  स्पष्ट करती है कि इस आत्मिक इमारत की एकमात्र और अविचल नींव यीशु मसीह है। प्रेरित पौलुस दृढ़ता से कहता है कि मसीह के अलावा कोई दूसरी नींव नहीं डाली जा सकती। कलीसिया का अस्तित्व, उसकी शिक्षा, उसका कार्य और उसकी आशा केवल और केवल यीशु मसीह के बलिदान और पुनरुत्थान पर टिकी है।
  • कोने के सिरे का पत्थर (The Cornerstone) (इफिसियों 2:20; 1 पतरस 2:6): प्राचीन निर्माण कला में, कोने का पत्थर (Cornerstone) वह पहला पत्थर होता था जो दो दीवारों को जोड़ता था और पूरी इमारत की मज़बूती, सीधाई और सुंदरता को निर्धारित करता था। यह सबसे बड़ा और सबसे मज़बूत पत्थर होता था। इसी तरह, यीशु मसीह कलीसिया के कोने के सिरे का पत्थर हैं। वह न केवल नींव हैं, बल्कि वह उस बिंदु को भी परिभाषित करते हैं जहाँ से सब कुछ मापा जाता है।
    • पुराने नियम की भविष्यवाणी: यशायाह नबी ने भविष्यवाणी की थी कि परमेश्वर सिय्योन में एक परखा हुआ, अनमोल और दृढ़ नींव के योग्य पत्थर रखेगा (यशायाह 28:16-17)।
    • नए नियम में पुष्टि: पतरस (1 पतरस 2:6) इस भविष्यवाणी को यीशु मसीह पर लागू करता है। कलीसिया को खड़ा करने में मसीह ही केंद्र बिंदु हैं।
    • महत्वपूर्ण चेतावनी: इस आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि जिन समूहों का आधार यीशु मसीह की पूर्ण शिक्षा और उनके कार्य पर नहीं है (जैसे यहोवा विटनेस, रोमन कैथोलिक, मॉर्मोनिज्म, आदि के कुछ विशिष्ट सिद्धांत), वे बाइबल  के अनुसार सही कलीसिया ई स्वरूप से भटक गए हैं।
  • नींव डालने वाले—प्रेरित और भविष्यवक्ता: परमेश्वर ने नींव डालने के लिए प्रेरितों और भविष्यवक्ताओं को भेजा, जिन्होंने लिखित वचन (बाइबल) के माध्यम से नींव डाली। यह वचन आज हमारे पास सुरक्षित है और इमारत के निर्माण में मार्गदर्शन करता है।
  • जीवित पत्थर—विश्वासी (1 पतरस 2:4-5):कलीसिया में शामिल होने वाले विश्वासी लोग स्वयं ‘जीवित पत्थर’ हैं। वे मसीह, जो जीवित पत्थर हैं, से जुड़कर एक आत्मिक भवन का निर्माण करते हैं।
    • दोहरी जिम्मेदारी: विश्वासी न केवल इमारत का हिस्सा हैं, बल्कि उन्हें एक ‘पवित्र याजक समूह’ के रूप में आत्मिक बलिदान (स्तुति, सेवा, समर्पण) भी चढ़ाना है।
    • भविष्य का हिसाब: पौलुस चेतावनी देता है कि हर किसी के काम की परीक्षा होगी (1 कुरिन्थियों 3:9-15)। हम इस इमारत के जीवित पत्थर हैं, और इसकी देखभाल करना, इसे शुद्ध रखना और मसीह के अनुसार निर्माण करना हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक जिम्मेदारी है।

3. परमेश्वर का मंदिर (The Temple) और आत्मिक बलिदान

कलीसिया का मंदिर होना मुख्य रूप से आराधना, समर्पण और परमेश्वर की उपस्थिति पर जोर देता है।

  • आत्मिक मंदिर और आत्मिक बलिदान (1 पतरस 2:5): अब कलीसिया एक आत्मिक मंदिर है, जिसका अर्थ है कि यहाँ आत्मिक बलिदान चढ़ाए जाते हैं। पुराने नियम के पशु बलिदानों के स्थान पर, विश्वासी यीशु मसीह के महायाजकीय कार्य के द्वारा स्तुति, सेवा और अपने जीवन का बलिदान चढ़ाते हैं।
  • मसीह का महायाजकीय कार्य: यीशु मसीह कलवरी के क्रूस पर अपना जीवन देकर महायाजक बन गए। उनका बलिदान ही हमें पाप के दंड से मुक्त करके कलीसिया का भाग बनने योग्य बनाता है। वह आज भी हमारे लिए स्वर्ग में महायाजक के रूप में मध्यस्थता कर रहे हैं (इब्रानियों 6:19-20)।
  • परमेश्वर की उपस्थिति (2 कुरिन्थियों 6:16): मंदिर का सबसे बड़ा महत्व यह है कि वहाँ परमेश्वर की मौजूदगी होती है। जब बाइबल  कलीसिया को मंदिर कहती है, तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर  का आत्मा उसमें निवास करता है। पुराने नियम का ‘मिलापवाला तंबू’ का विशेषाधिकार अब नए नियम के हर विश्वासी को मिला है।
  • पवित्रता और समर्पण: हमें अपने शरीरों को ‘जीवित बलिदान’ के रूप में परमेश्वर  को भेंट करना है (रोमियों 12:1-2)। हमारी आराधना, सेवा, और दसवाँ अंश देना (फिलिप्पियों 4:18) इसी आत्मिक बलिदान का हिस्सा है।
  • पवित्रता की चेतावनी (1 कुरिन्थियों 3:16-17): पौलुस कलीसिया की पवित्रता को लेकर गंभीर चेतावनी देता है: “क्या तुम नहीं जानते कि तुम परमेश्वर का मंदिर हो और परमेश्वर  का आत्मा तुम में बसा हुआ है? यदि कोई परमेश्वर के मंदिर को नष्ट करेगा, तो परमेश्वर उसे नष्ट करेगा, क्योंकि परमेश्वर का मंदिर पवित्र है, और वह तुम ही हो।” यह कलीसिया की देखभाल और उसके सम्मान की आवश्यकता पर बल देता है। इसका अर्थ है कि हमें आत्मिक रूप से शुद्ध रहना है और कलीसिया में फूट, पाप या गलत शिक्षा को नहीं आने देना है।
Other Names of the Church कलीसिया के दूसरे नाम

निष्कर्ष

आज आपने परमेश्वर  की कलीसिया  के विभिन्न नामों और पहलुओं के विषय में गहराई से सीखा और यह जाना कि इन सब का परमेश्वर के साथ कितना अटूट और गहरा संबंध है। कलीसिया केवल एक इमारत या लोगों का समूह नहीं है, बल्कि यह परमेश्वर की महान और अद्भुत रचना है।

कलीसिया का आधार और स्वरूप:

इस कलीसिया का अटल आधार स्वयं प्रभु यीशु मसीह हैं, जैसा कि बाइबल  में स्पष्ट रूप से बताया गया है। वह ‘कोने का पत्थर’ हैं जिस पर पूरा ढाँचा टिका हुआ है। हम विश्वासी, जो मसीह में हैं, इस आत्मिक रचना के ‘जीवित पत्थर’ हैं। हर एक विश्वासी की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका है, और हम सब मिलकर एक पवित्र भवन का निर्माण करते हैं जो परमेश्वर की महिमा के लिए है।

कलीसिया : परमेश्वर की उपस्थिति का मंदिर:

कलीसिया वह पवित्र स्थान है, वह आत्मिक मंदिर है, जहाँ परमेश्वर की पवित्र उपस्थिति और महिमा निवास करती है। यह वह स्थान है जहाँ विश्वासी आराधना, संगति और वचन सीखने के लिए एकत्र होते हैं, और जहाँ परमेश्वर का आत्मा सक्रिय रूप से कार्य करता है। यह एक ऐसा स्थान है जहाँ हमें संसार की भीड़ से अलग होकर परमेश्वर के सम्मुख आने का सौभाग्य मिलता है। इसलिए, कलीसिया को पवित्रता और आदर के साथ देखना अत्यंत आवश्यक है।

कलीसियाके प्रति हमारा दृष्टिकोण और जिम्मेदारी:

जब भी आप परमेश्वर की इस पवित्र कलीसिया में प्रवेश करें, तो आपको यह बात सदैव ध्यान में रखनी चाहिए कि परमेश्वर स्वयं अपनी इस विशेष रचना का बहुत ख्याल रखता है। वह अपनी कलीसिया से प्रेम करता है, इसकी सुरक्षा करता है, और इसे शुद्ध करता है। इसलिए, कलीसिया में किसी भी प्रकार की अव्यवस्था, अनादर, या पापपूर्ण व्यवहार, जो इसकी पवित्रता को ठेस पहुँचाता हो, परमेश्वर के लिए अस्वीकार्य है।

परमेश्वर अपनी कलीसिया के विरुद्ध किए गए किसी भी कार्य या अपमान को सहन नहीं करेगा। हमें परमेश्वर के भवन में डर और आदर के साथ आना चाहिए, उसकी पवित्रता का सम्मान करना चाहिए, और उस प्रेम और एकता को बनाए रखना चाहिए जिसके लिए मसीह ने हमें बुलाया है। कलीसिया में आपका आना केवल एक सामाजिक मिलन नहीं, बल्कि परमेश्वर की उपस्थिति में एक पवित्र कार्य है।

कलीसिया के दूसरे नाम: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

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