दिन 21: मध्यस्थ और वकील—स्वर्गीय न्यायालय में हमारा पक्ष

आज हम एक ऐसे सत्य की गहराई में उतरेंगे जो हमारे ‘सुरक्षा के आश्वासन’ (Assurance of Salvation) की नींव है। जब हम विश्वास में आने के बाद भी गिर जाते हैं या पाप कर बैठते हैं, तब हमारा क्या होता है? क्या परमेश्वर हमें त्याग देता है? आज का वचन इन सभी डरों का उत्तर […]
दिन 20: हमारा महायाजक—सहानुभूति रखने वाला मध्यस्थ Our High Priest Hindi

कल हमने यीशु की ‘मृत्यु पर विजय’ और उनकी खाली कब्र का उत्सव मनाया। आज हम एक बहुत ही सांत्वना देने वाले सत्य पर गौर करेंगे: जी उठने के बाद यीशु स्वर्ग में चुपचाप नहीं बैठे हैं, बल्कि वे वहाँ हमारे महायाजक (High Priest) के रूप में सक्रिय हैं। पुराने समय में, महायाजक वह व्यक्ति […]
दिन 19: मृत्यु पर विजय—वह जीवित है! Victory over Death Hindi

कल हमने क्रूस के उस गंभीर दृश्य को देखा जहाँ यीशु ने “पूरा हुआ” कहकर अपने प्राण त्यागे थे। यदि कहानी वहीं खत्म हो जाती, तो हमारा विश्वास केवल एक शोक सभा बनकर रह जाता। लेकिन आज हम उस सत्य का उत्सव मनाएंगे जिसने मृत्यु के डंक को तोड़ दिया और इतिहास को दो भागों […]
दिन 18: क्रूस पर अंतिम शब्द—उद्धार का पूर्ण होना

आज हम उस घड़ी में पहुँच गए हैं जो मानव इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है। क्रूस पर अपनी अंतिम साँस लेने से पहले, यीशु ने एक ऐसा शब्द कहा जिसने स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल की नींव हिला दी। यह हार की चीख नहीं, बल्कि एक विजेता की गर्जना थी। यूहन्ना के सुसमाचार में यीशु […]
दिन 17: अंधों को दृष्टि देना—एक नई पहचान और दृष्टि

कल हमने जाना कि कैसे यीशु हमारी बीमारियों और दुर्बलताओं को अपने ऊपर ले लेते हैं। आज हम उनके एक ऐसे चमत्कार पर गौर करेंगे जो न केवल चिकित्सा विज्ञान से परे है, बल्कि यह हमारे जीवन के सबसे बड़े अंधेरे—आत्मिक अंधकार—को दूर करने का प्रतीक है। यीशु केवल बाहरी आँखों को ठीक करने नहीं […]
दिन 16: चंगाई देने वाला—पीड़ा का भार उठाने वाला

कल हमने सीखा कि कैसे यीशु ने हमें पापों के दंड से ‘छुटकारा’ दिलाया। आज हम उनके कार्य के एक और महत्वपूर्ण पहलू को देखेंगे जो हमारे शरीर और प्राण की चंगाई से जुड़ा है।यीशु केवल हमारी आत्मा को स्वर्ग ले जाने के लिए नहीं आए, बल्कि वे हमारे इस पृथ्वी के जीवन के दुखों […]
दिन 15: पापों की क्षमा—बंधनों से मुक्ति

पिछले दो हफ्तों में हमने जाना कि यीशु कौन हैं और उनका हृदय कैसा है। अब हम उस ‘मिशन’ पर गौर करेंगे जिसे पूरा करने के लिए वे इस पृथ्वी पर आए। आज का विषय हमारे मसीही विश्वास की नींव है। बिना क्षमा के, हमारा परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं हो सकता था। प्रेरित […]
दिन 14: दुख उठाने वाला सेवक—हमारा बोझ उठाने वाला

अब तक हमने यीशु की नम्रता, उनकी करुणा, उनके प्रार्थनापूर्ण जीवन और उनके अधिकार को देखा। आज हम उनके स्वभाव के उस सबसे गहरे और मर्मस्पर्शी पहलू पर गौर करेंगे, जिसने हमें उद्धार दिलाया—उनका दुख उठाना। यीशु केवल एक विजेता राजा या महान शिक्षक के रूप में नहीं आए, बल्कि वे एक ऐसे ‘सेवक’ के […]
दिन 13: महान शिक्षक—अधिकार और सामर्थ्य की वाणी

कल हमने यीशु की ‘आज्ञाकारिता’ के गहरे समर्पण को देखा। आज हम उनके जीवन के उस पहलू पर गौर करेंगे जिसने हज़ारों लोगों को आकर्षित किया और हज़ारों सालों से मानव इतिहास को दिशा दे रहा है—उनका शिक्षण।दुनिया में बहुत से महान दार्शनिक और शिक्षक हुए हैं, लेकिन यीशु की शिक्षाएँ अलग थीं। वे केवल […]
दिन 12: आज्ञाकारी पुत्र—क्रूस तक का समर्पण

कल हमने यीशु के प्रार्थनापूर्ण जीवन और उनके पिता के साथ गहरे संबंध को देखा। आज हम उस गुण पर गौर करेंगे जो उस संबंध का सबसे बड़ा प्रमाण है—आज्ञाकारिता। संसार में ‘आज्ञाकारिता’ को अक्सर मजबूरी या कमजोरी माना जाता है, लेकिन यीशु के जीवन में यह उनकी सबसे बड़ी शक्ति और गरिमा थी। उन्होंने […]