कलीसिया का वास्तविक स्वरूप: एक आत्मिक देह, न कि एक भौतिक भवन | True Nature of Church
आज दुनिया के कई हिस्सों में मसीही भाई-बहनों पर ज़बरदस्त सताव और अत्याचार हो रहा है। समाचारों में अक्सर हम दुखद खबरें सुनते हैं, जैसे कि “अमुक कलीसिया (इमारत) पर हमला हुआ,” या “चर्च को नष्ट कर दिया गया।” इन खबरों को सुनकर मसीही समुदाय में एक स्वाभाविक चिंता पैदा होती है, लेकिन ये घटनाएं एक गहरा और मूलभूत प्रश्न खड़ा करती हैं:
क्या वास्तव में कोई मनुष्य सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को नष्ट कर सकता है?
इस महत्वपूर्ण प्रश्न का निर्णायक उत्तर हमें स्वयं प्रभु यीशु मसीह के मुख से निकले शब्दों में मिलता है। उन्होंने अपनी सेवकाई के दौरान, मत्ती 16:18 में अपने प्रमुख शिष्य पतरस से एक अटल प्रतिज्ञा की थी, जो कलीसिया के स्वरूप को परिभाषित करती है:
“मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा, और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।”
यह छोटा-सा, परंतु शक्तिशाली वचन हमें कलीसिया के संबंध में दो शाश्वत और मूलभूत सत्यों की ओर ले जाता है, जो इसे किसी भी मानवीय प्रयास से परे रखते हैं:-
1. कलीसिया की अविनाशी प्रकृति (The Indestructible Nature of the Church)
यीशु का यह कथन कि ‘अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे’ कलीसिया की पहचान का सार है।
- मृत्यु पर विजय: ‘अधोलोक के फाटक’ (Gates of Hades/Hell) का शाब्दिक अर्थ मृत्यु की शक्ति और शैतान के राज्य की सेनाओं को दर्शाता है। यह प्रतिज्ञा करती है कि मृत्यु, अंधकार, या बुराई की कोई भी शक्ति – चाहे वह शारीरिक सताव हो, धार्मिक अत्याचार हो, या सांसारिक विचारधारा का दबाव हो – परमेश्वर की कलीसिया को हरा नहीं सकती, उसका अस्तित्व मिटा नहीं सकती।
- भौतिकता से परे: यदि कलीसिया मात्र ईंट-पत्थर, लकड़ी और सीमेंट से बनी एक भौतिक इमारत होती, तो उसे नष्ट करना बहुत आसान होता। एक तानाशाह, एक विरोधी समूह, या एक प्राकृतिक आपदा उसे क्षण भर में मिटा सकती थी। परंतु, प्रभु यीशु ने जिस कलीसिया की बात की, वह एक अविनाशी आत्मिक देह है। यह लोगों के हृदय में वास करती है और भौतिक सीमाओं से बंधी नहीं है। इसलिए, भवन नष्ट हो सकता है, लेकिन ‘कलीसिया’ कभी नहीं।

2. कलीसिया का अटल आधार (The Unshakeable Foundation of the Church)
यीशु के कथन में ‘इस पत्थर’ (This Rock) एक दूसरा निर्णायक सत्य है।
- मसीह स्वयं आधार: धर्मशास्त्रियों के बीच ‘इस पत्थर’ की पहचान को लेकर कई मत हैं, लेकिन सबसे मजबूत मत यही है कि यह या तो स्वयं मसीह को दर्शाता है, या पतरस द्वारा की गई मसीह की पहचान की महान स्वीकारोक्ति को (“तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है”)। किसी भी तरह से, कलीसिया का आधार कोई नाशवान इंसान, कोई मानवीय सिद्धांत, या कोई संस्थागत ढांचा नहीं है, बल्कि स्वयं प्रभु यीशु मसीह हैं।
- मसीह सिर है: नए नियम में कलीसिया को ‘मसीह की देह’ कहा गया है (इफिसियों 1:23)। इसका अर्थ है कि मसीह इस देह के सिर हैं, और विश्वासी उसके अंग हैं। जब तक सिर सुरक्षित है, देह का अस्तित्व नष्ट नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष यह है कि कलीसिया कोई भौतिक भवन नहीं है जिसे मनुष्य मिटा सके, बल्कि यह जीवित विश्वासियों का वह समूह है जिसका सिर स्वयं मसीह है।
कलीसिया का अर्थ और परिभाषा: यूनानी मूल शब्द “एक्कलीसिया” कलीसिया शब्द के वास्तविक और गहरे अर्थ को समझने के लिए हमें इसके मूल यूनानी शब्द “एक्कलीसिया” (Ekklesia – ἐκκλησία) को समझना होगा, जिसका इस्तेमाल नए नियम की मूल भाषा में किया गया था। यह शब्द एक साधारण अनुवाद से कहीं अधिक गहन अर्थ रखता है।
“एक्कलीसिया” दो महत्वपूर्ण यूनानी शब्दों से मिलकर बना है:
- Ek (ἐκ): जिसका अर्थ है ‘बाहर’ या ‘से अलग’ (Out of, Away from)।
- Kaleo (καλέω): जिसका अर्थ है ‘बुलाना’ (To call)।
इस प्रकार, एक्कलीसिया (कलीसिया) का शाब्दिक अर्थ है: “बुलाए गए लोगों का समूह” या “एक विशेष उद्देश्य के लिए संसार से अलग किए गए लोगों की सभा”। यह शब्द प्राचीन यूनान में भी एक नागरिक सभा या इकट्ठे हुए लोगों के समूह के लिए इस्तेमाल होता था।बाइबल के अनुसार कलीसिया की पहचान
बाइबल के संदर्भ में, कलीसिया का अर्थ न तो कोई धार्मिक संस्था है और न ही कोई भव्य बिल्डिंग। जब प्रभु यीशु कलीसिया की बात करते हैं, तो वे उन लोगों के समूह की बात करते हैं जो दोहरी प्रक्रिया से गुज़रे हैं:
- संसार से अलग किए गए हैं: वे केवल संसार में रहते हैं, लेकिन वे संसार की पापमय जीवनशैली, भौतिकवादी विचारधारा और आत्मिक अंधकार से अलग किए गए हैं। उनका जीवन-ध्येय और नागरिकता स्वर्गीय है (फिलिप्पियों 3:20)।
- परमेश्वर की इच्छा के अनुसार बुलाए गए हैं: उन्हें मात्र समाज सेवा के लिए नहीं, बल्कि मुक्ति (Redemption) और परमेश्वर की सेवा (Service) के लिए स्वयं परमेश्वर ने चुना और बुलाया है। वे एक नए उद्देश्य के लिए इकट्ठे हुए हैं।
बाइबल के निर्णायक उदाहरण: लोग, न कि स्थान
नए नियम के उपयोग से यह पूर्ण रूप से स्पष्ट होता है कि कलीसिया शब्द का अर्थ हमेशा लोग होते हैं, न कि कोई भौतिक स्थान या इमारत:
- कलीसिया एक घर में: प्रेरित पौलुस रोमियों 16:5 में लिखते हैं, “उस कलीसिया को भी नमस्कार जो उनके घर में है।” यहाँ कलीसिया से तात्पर्य घर की इमारत नहीं, बल्कि उस घर में नियमित रूप से इकट्ठा होने वाले विश्वासी (Believers) हैं।
- शारीरिक रूप से एकत्रित लोग: 1 कुरिन्थियों 14:23 में पौलुस एक विशेष स्थान पर भौतिक रूप से इकट्ठे हुए लोगों को संबोधित करता है, “सो यदि सारी कलीसिया एक जगह इकट्ठी हो…”। यहाँ ‘कलीसिया’ स्पष्ट रूप से शारीरिक रूप से एकत्रित लोगों की सभा को इंगित करता है।
- कलीसियाएं बहुवचन में: गलातियों 1:2 में पौलुस गलातिया प्रांत की कलीसियाओं (बहुवचन – Churches) को पत्र लिखता है। इसका अर्थ वहां के अलग-अलग शहरों और स्थानों में रहने वाले ‘विश्वासी लोग’ हैं, न कि वहां की एक से अधिक इमारतें।
संक्षेप में, कलीसिया = जीवित विश्वासी (The People), न कि ईंट-पत्थर (The Building)।
कलीसिया की शुरुआत: एक रहस्योद्घाटन
कलीसिया का विचार पुराने नियम के लोगों के लिए एक रहस्य था, जो उन्हें स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं किया गया था। परमेश्वर ने इसे एक ‘भेद’ (Mystery) के तौर पर छिपा कर रखा था (1 कुरिन्थियों 2:7; इफिसियों 5:32)। यह भेद मुख्य रूप से यह था कि कैसे यहूदी (परमेश्वर के चुने हुए लोग) और गैर-यहूदी (अन्यजाति) दोनों मसीह में एक ही नए ‘मनुष्य’ (कलीसिया) और एक ही आत्मिक देह का हिस्सा बनेंगे, बिना किसी भेद-भाव के।

1. भविष्यवाणी और समय-सीमा (Prophecy and Timing)
कलीसिया की वास्तविक शुरुआत मसीह के स्वर्गारोहण के बाद पेंटाकोस्त के दिन (प्रेरितों के काम 2) हुई, जब पवित्र आत्मा उंडेला गया, लेकिन इसकी भविष्यवाणी स्वयं प्रभु यीशु ने अपने पृथ्वी की सेवकाई के दौरान कर दी थी।
- भविष्य काल का उपयोग: मत्ती 16:18 में यीशु ने कहा, “मैं अपनी कलीसिया बनाऊंगा*।”* यहाँ ‘बनाऊंगा’ (Will Build) शब्द भविष्य काल (Future Tense) को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि जब यीशु यह कह रहे थे, तब तक कलीसिया की स्थापना नहीं हुई थी, लेकिन यह उनके भावी कार्य (पवित्र आत्मा भेजने) का एक निश्चित और आवश्यक हिस्सा था। यह दर्शाता है कि कलीसिया मसीह के क्रूस पर बलिदान, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के पूरा होने के बाद अस्तित्व में आई।
कलीसिया न केवल एक आत्मिक देह है जो मसीह पर आधारित है, बल्कि यह वह समूह है जिसे परमेश्वर ने संसार से अपने लिए बुलाया है, और जिसे अधोलोक की शक्तियाँ कभी नष्ट नहीं कर सकतीं। इसकी पहचान इमारतों से नहीं, बल्कि जीवित विश्वासियों से है।
स्थापना का दिन (The Day of Pentecost)
कलीसिया का जन्म: पिन्तेकुस्त का दिन
मसीही कलीसिया का वास्तविक जन्म और उसकी औपचारिक स्थापना प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के दस दिन बाद हुई। यह ऐतिहासिक घटना पिन्तेकुस्त का दिन (The Day of Pentecost) कहलाती है। पिन्तेकुस्त का यह दिन न केवल यहूदी फसल का त्योहार था, बल्कि यह परमेश्वर की ओर से एक नए युग, यानी कलीसिया के युग की शुरुआत का भी प्रतीक बना।
पवित्र आत्मा का सामर्थ्यपूर्ण आगमन
पिन्तेकुस्त के दिन, यीशु के चेले और अनुयायी यरूशलेम में एक ही जगह पर, एक मन होकर प्रार्थना में इकट्ठे थे। तभी, अचानक, स्वर्ग से एक बड़े आँधी के चलने की सी आवाज़ आई और जिस घर में वे बैठे थे, वह भर गया। इसके बाद, आग की सी जीभें फटकर उन पर उतर आईं और उनमें से हरेक पर ठहर गईं। इस अविस्मरणीय घटना के फलस्वरूप, वे सब पवित्र आत्मा से भर गए और अन्य भाषाएँ बोलने लगे, जैसा कि पवित्र आत्मा ने उन्हें बोलने की शक्ति दी (प्रेरितों के काम 2:1-4)।
- कलीसिया की आधारशिला: पवित्र आत्मा का यह आगमन ही कलीसिया की स्थापना का मूल आधार बना। प्रभु यीशु ने स्वर्ग जाने से पहले अपने चेलों से वादा किया था कि वह उन्हें सहायक, यानी पवित्र आत्मा भेजेगा। इसी आत्मा के द्वारा, विश्वास करने वाले लोग मसीह की एक ही देह—अर्थात्, कलीसिया—में बपतिस्मा पाते हैं (1 कुरिन्थियों 12:13)। यह घटना दर्शाती है कि कलीसिया केवल एक मानव-संगठन नहीं, बल्कि पवित्र आत्मा द्वारा संचालित एक आत्मिक देह है, जिसका सिर स्वयं मसीह है।
- सामर्थ्य और गवाही: पवित्र आत्मा के उतरने से चेलों को वह सामर्थ्य मिली जिसकी प्रतिज्ञा यीशु ने उनसे की थी (प्रेरितों के काम 1:8)। यह सामर्थ्य उन्हें यीशु मसीह के पुनरुत्थान के साक्षी होने और सुसमाचार का प्रचार करने के लिए आवश्यक थी।
कलीसिया की पहली फसल और उसका विस्तार
पवित्र आत्मा से भर जाने के बाद, पतरस, जो कुछ ही सप्ताह पहले डरपोक था, ने साहस के साथ खड़े होकर यरूशलेम में इकट्ठे हुए यहूदियों और अन्य देशों के भक्तों को मसीह का पहला प्रभावशाली प्रचार किया। उसने ज़ोर देकर बताया कि यीशु ही वह मसीहा है जिसे उन्होंने क्रूस पर चढ़ाया था, परन्तु जिसे परमेश्वर ने जिला उठाया है।
- 3,000 आत्माओं का मन फिराव: पतरस के संदेश ने सुनने वालों के हृदयों को बेध दिया। जब उन्होंने पूछा कि “हम क्या करें?”, तो पतरस ने उन्हें मन फिराने और यीशु मसीह के नाम से अपने पापों की क्षमा के लिए बपतिस्मा लेने का आह्वान किया (प्रेरितों के काम 2:37-38)। उस दिन, उसके वचन को ग्रहण करने वाले लगभग 3,000 लोगों ने विश्वास किया और वे विश्वासियों के इस नए समूह में जुड़ गए (प्रेरितों के काम 2:41)।
- प्रारंभिक कलीसिया की शुरुआत: 3,000 नए सदस्यों का यह जुड़ना ही प्रारंभिक कलीसिया (Early Church) की वास्तविक शुरुआत थी। ये विश्वासी प्रेरितों की शिक्षा, सहभागिता, रोटी तोड़ने (पवित्र यूखरिस्त) और प्रार्थना में निरंतर लगे रहते थे। यह कलीसिया अब यरूशलेम से शुरू होकर, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में, पूरे संसार में मसीह के सुसमाचार का प्रसार करने के लिए तैयार थी।
कलीसिया का विस्तार (Expansion)
कलीसिया: परमेश्वर की वैश्विक योजना का अनावरण
कलीसिया की शुरुआत, जैसा कि बाइबल में दर्ज है, पिन्तेकुस्त के दिन हुई थी (प्रेरितों के काम 2), जब पवित्र आत्मा सामर्थ्य के साथ विश्वासियों पर उतरा। शुरुआत में, यह अद्भुत आत्मिक देह येरूशलेम के यहूदी विश्वासियों तक सीमित थी। ये वे लोग थे जिन्होंने प्रभु यीशु को मसीहा के रूप में स्वीकार किया था और वे यहूदी रीति-रिवाजों का पालन करते थे।
मगर, परमेश्वर की स्वर्गीय योजना में कलीसिया का दायरा केवल येरूशलेम की सीमाओं तक सिमटा नहीं रहना था। यीशु ने अपने चेलों को आज्ञा दी थी कि वे “यहूदिया और सामरिया, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होंगे” (प्रेरितों के काम 1:8)। इस आज्ञा के अनुसार, कलीसिया का विस्तार दो मुख्य चरणों में हुआ, जिससे इसकी सार्वभौमिक प्रकृति निर्णायक रूप से स्थापित हुई:
१. सामरिया में सुसमाचार का फैलाव
अत्याचार के कारण जब विश्वासी येरूशलेम से तितर-बितर हुए, तो फिलिप्पुस नामक एक प्रचारक सामरिया पहुंचा।
- प्रेरितों के काम 8 में यह वर्णन है कि फिलिप्पुस के द्वारा सामरिया में सुसमाचार का प्रचार हुआ। सामरी, जो आंशिक रूप से यहूदी माने जाते थे लेकिन यहूदियों द्वारा घृणित थे, ने विश्वास किया और बपतिस्मा लिया।
- यह घटना येरूशलेम के बाहर, एक ऐसे समूह में कलीसिया के स्वागत का एक महत्वपूर्ण कदम था जो यहूदी नहीं थे, लेकिन फिर भी उन्हें परमेश्वर की दया प्राप्त हुई।
२. अन्यजातियों (गैर-यहूदियों) को पूर्ण स्वीकृति
कलीसिया के विस्तार में सबसे निर्णायक मोड़ तब आया जब सुसमाचार पूरी तरह से गैर-यहूदियों तक पहुंचा।
- प्रेरितों के काम 10 में यह ऐतिहासिक घटना दर्ज है कि पतरस ने कैसरिया में कुरनेलियुस, जो एक रोमी सूबेदार था, के घर में प्रचार किया।
- पतरस के संदेश देते समय ही पवित्र आत्मा कुरनेलियुस और उसके घर के अन्यजाति सदस्यों पर उतर आया। यहूदी विश्वासियों के लिए यह एक अचूक प्रमाण था कि परमेश्वर ने अन्यजातियों को भी स्वीकार किया है।
- इस घटना ने अटल रूप से स्थापित किया कि गैर-यहूदियों (अन्यजातियों) को अब कलीसिया में शामिल होने के लिए यहूदी रीति-रिवाजों (जैसे खतना या आहार संबंधी नियम) को अपनाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। उन्हें केवल मसीह पर विश्वास करने की आवश्यकता थी।
इस प्रकार, कलीसिया की शुरुआत पिन्तेकुस्त के दिन हुई और यह एक आत्मिक देह है जिसमें यहूदी और अन्यजाति—बिना किसी भेद के, सभी मसीह में एक हो जाते हैं। प्रेरित पौलुस इस गहन सत्य को स्पष्ट करता है, कि यीशु ने क्रूस पर अपनी देह में शत्रुता को समाप्त कर दिया और दोनों को (यहूदी और अन्यजाति को) एक नई देह, अर्थात् कलीसिया में मिला दिया (इफिसियों 2:14-16)।
कलीसिया की प्रकृति, उद्देश्य और विशेषताएँ
आज हमने सीखा कि कलीसिया (The Church) कोई भौतिक भवन, कोई सामाजिक क्लब, या केवल एक मानव निर्मित संगठन नहीं है। बाइबल के अनुसार, यह उससे कहीं अधिक गहरा और आत्मिक है।
यह परमेश्वर द्वारा संसार से बुलाए गए लोगों का समूह है (यूनानी शब्द ‘एकलेशिया’ का अर्थ है ‘बुलाए हुए लोग’)। यह पुराने नियम का वह “छिपा हुआ भेद” है जिसे नए नियम में प्रभु यीशु के बलिदान, पुनरुत्थान, और पवित्र आत्मा के दान के द्वारा प्रगट किया गया।
कलीसिया (मसीह की देह) की बुनियादी विशेषताएँ:
- सर्वसमावेशी एकता:
- कलीसिया में अब कोई राष्ट्रीय, सांस्कृतिक, या सामाजिक भेद नहीं है।
- यहूदी, सामरी, और अन्यजाति (गैर-यहूदी) सभी मसीह में एक हैं।
- जैसा कि गलातियों 3:28 कहता है, “न कोई यहूदी रहा, न यूनानी; न कोई दास, न स्वतंत्र; न कोई नर, न नारी; क्योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो।”
- अविनाशी संस्था:
- प्रभु यीशु ने पतरस से कहा था, “मैं अपनी कलीसिया बनाऊंगा, और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे” (मत्ती 16:18)।
- यह घोषणा कलीसिया की अविनाशी प्रकृति को सुनिश्चित करती है। इसका अर्थ है कि मृत्यु की शक्तियां या शैतान की कोई भी चाल कलीसिया को नष्ट नहीं कर सकती।
- मसीह ही सिर है:
- कलीसिया का सिर स्वयं प्रभु यीशु मसीह हैं (कुलुस्सियों 1:18)।
- वह ही कलीसिया के एकमात्र मार्गदर्शक, अधिकार और जीवन का स्रोत हैं।
- हर विश्वासी उस देह का एक अंग है (रोमियों 12:4-5), और मसीह के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है, जिससे देह में सामंजस्यपूर्ण कार्य होता है।
मैं विश्वास करता हूँ कि इस गहन लेख के माध्यम से आप कलीसिया के बुनियादी, बाइबल आधारित अर्थ—अर्थात्, मसीह में विश्वासियों की आत्मिक देह, उसकी स्थापना, और उसके स्वर्गीय उद्देश्य को स्पष्ट रूप से समझ गए होंगे। यह एक आत्मिक परिवार है जो मसीह के आने तक इस दुनिया में उसके कार्य को आगे बढ़ा रहा है।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
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