कलीसिया Church -परिचय
क्या आप जानते हैं कि कलीसिया क्या है?what is Church यह प्रश्न जितना सरल प्रतीत होता है, इसका उत्तर उतना ही गहरा और आत्मिक सत्यों से भरा हुआ है। दुर्भाग्य से, आधुनिक समय में, ‘कलीसिया’ (या ‘चर्च’, जो मूल यूनानी शब्द ‘एक्कलेसिया’ – Ekklesia से आया है, जिसका अर्थ है ‘बुलाए गए लोगों का समूह’) शब्द का इस्तेमाल अक्सर केवल एक भवन, एक धार्मिक संगठन, एक सामाजिक क्लब, या एक साप्ताहिक सभा के रूप में किया जाता है। ये धारणाएँ इसके गहरे, बाइबल आधारित और आत्मिक अर्थ को पूरी तरह से ढक लेती हैं।
कलीसिया: एक आत्मिक सच्चाई और स्वर्गीय रहस्य (A Spiritual Reality and Heavenly Mystery)
कलीसिया केवल ईंटों और गारे से बनी एक इमारत या मनुष्यों द्वारा स्थापित एक सामाजिक संस्था नहीं है। बाइबल के अनुसार, यह परमेश्वर की महान मुक्ति योजना का केंद्र बिंदु है और एक गहन आत्मिक सच्चाई (Spiritual Reality) है। यह एक ऐसा रहस्य था जो सदियों तक छिपा रहा और अब मसीह यीशु में प्रकट किया गया है (इफिसियों 3:3-6)। यह मसीह में विश्वास करने वाले उन सभी लोगों का समूह है जिन्हें परमेश्वर ने संसार से बाहर बुलाया है ताकि वे उसके पवित्र लोग बनें।

कलीसिया की पहचान, इसका उद्देश्य, इसकी संरचना और इसके स्वर्गीय नियम हमारी सामान्य समझ से कहीं ज़्यादा गहरे हैं। जो लोग सोचते हैं कि कलीसिया के बारे में तो उन्हें सब पता है, उन्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि बाइबल इसे मसीह की देह, परमेश्वर का मंदिर, और सत्य का खंभा एवं नींव कहती है।
कलीसिया की बाइबल आधारित परिभाषा और शुरुआत
कलीसिया की स्थापना किसी मनुष्य ने नहीं, बल्कि स्वयं प्रभु यीशु मसीह ने की थी। मत्ती 16:18 में, यीशु ने पतरस से कहा, “मैं तुझ से भी कहता हूँ कि तू पतरस है; और मैं इस चट्टान पर अपनी कलीसिया बनाऊँगा, और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।” यहाँ ‘चट्टान’ स्वयं यीशु मसीह का ईश्वरीय व्यक्तित्व और उनके बारे में पतरस का अंगीकार (“तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है”) है।
कलीसिया की वास्तविक शुरुआत पेंटेकोस्ट के दिन (प्रेरितों के काम 2) हुई, जब पवित्र आत्मा सामर्थ्य के साथ शिष्यों पर उतरा। उस दिन, पवित्र आत्मा ने विश्वासियों को एक देह में बपतिस्मा दिया (1 कुरिंथियों 12:13), जिससे वे मसीह की देह बन गए। इस प्रकार, कलीसिया की पहचान एक भवन से नहीं, बल्कि पवित्र आत्मा से भरे हुए विश्वासियों के समूह से है।
कलीसिया के निर्माण का ईश्वरीय कारण: उद्देश्य और मकसद
प्रभु यीशु मसीह ने कलीसिया की स्थापना निम्नलिखित निर्णायक उद्देश्यों के लिए की:

- मसीह की देह के रूप में कार्य करना: कलीसिया पृथ्वी पर मसीह की देह है, जिसके माध्यम से वह अपना कार्य जारी रखता है। हर विश्वासी इस देह का एक आवश्यक अंग है (इफिसियों 1:22-23)।
- परमेश्वर के ज्ञान का प्रकाशन: परमेश्वर ने कलीसिया को चुना ताकि स्वर्गिक स्थानों में प्रधानताओं और अधिकारियों को उसके “तरह-तरह के बुद्धि” (बहुआयामी ज्ञान) का प्रकाशन उसके द्वारा हो (इफिसियों 3:10)। कलीसिया परमेश्वर की महिमा का प्रदर्शन करती है।
- सुसमाचार का प्रचार: कलीसिया का प्राथमिक मिशन यह है कि वह ‘सारी दुनिया में जाकर सारे सृष्ट लोगों को सुसमाचार का प्रचार करे’ (मरकुस 16:15)। यह उद्धार और पश्चात्ताप का संदेश देती है।
- विश्वास के भवन का निर्माण और संतों को सिद्ध करना: कलीसिया विश्वासियों को परमेश्वर के वचन द्वारा मसीह की पूर्णता तक बढ़ने में सहायता करती है, उन्हें सेवा के कार्य के लिए तैयार करती है (इफिसियों 4:11-12)।
सत्य का खंभा और नींव बनना: कलीसिया पृथ्वी पर वह संरचना है जो परमेश्वर के सत्य (बाइबल) को थामे रखती है और उसकी रक्षा करती है (1 तीमुथियुस 3:15)।
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