झोपड़ियों का पर्व (Sukkot): अर्थ, इतिहास और भविष्य की आशा | Feast of Tabernacles Hindi – 07

विषय वस्तु

झोपड़ियों का पर्व (सुककोत) क्या है? एक विस्तृत विवरण | Feast of Tabernacles

झोपड़ियों का पर्व, Feast of Tabernacle जिसे इब्रानी भाषा में ‘सुककोत’ (Sukkot) कहा जाता है, इस्राइल के धार्मिक कैलेंडर के अनुसार मनाए जाने वाले सात मुख्य पर्वों की श्रृंखला में सबसे अंतिम और सबसे अधिक आनंदमय पर्व है। अपनी प्रकृति और महत्व के कारण इसे ‘तंबुओं का पर्व’ भी कहा जाता है। यह पर्व यहूदी धर्म के तीन ‘तीर्थयात्रा पर्वों’ (Pilgrimage Festivals) में से एक था, जिसमें फसह (Passover) और सप्ताहों का पर्व (Pentecost) शामिल हैं। इन तीनों पर्वों के दौरान, व्यवस्था के अनुसार, प्रत्येक सक्षम इस्राइली पुरुष को येरूशलेम के पवित्र मंदिर में उपस्थित होकर, परमेश्वर की आराधना करनी और भेंट चढ़ानी अनिवार्य थी।

पर्व को मनाने का मुख्य उद्देश्य और ऐतिहासिक संदर्भ

इस पर्व को मनाने का मुख्य उद्देश्य इस्राइल राष्ट्र के इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को याद करना है। यह उस समय की स्मृति है जब परमेश्वर ने उन्हें मिस्र की कठोर गुलामी से अद्भुत रीति से छुटकारा दिलाया था। इस मुक्ति के बाद, इस्राइलियों ने प्रतिज्ञा किए हुए देश (कनान) की ओर 40 वर्षों तक जंगल में यात्रा की थी। इस लंबी और कठिन यात्रा के दौरान, उन्होंने किसी स्थायी घर या भवन में नहीं, बल्कि अस्थाई तंबुओं या झोपड़ियों (Sukkahs) में निवास किया था।

अतः, यह पर्व इस्राएलियों को अपनी विस्मयकारी मुक्ति की कहानी को फिर से जीने का अवसर देता है। यह इस बात पर चिंतन करने का समय है कि उस उजाड़ और निर्जन जंगल में भी, उनके परमेश्वर ने उन्हें कभी नहीं त्यागा। जंगल के उस कठिन समय में भी, परमेश्वर ने उन्हें प्रतिदिन ‘मन्ना’ (स्वर्ग से भोजन) और चट्टान से जल प्रदान किया, और दिन में बादल के खंभे तथा रात में आग के खंभे के रूप में उनकी सुरक्षा और मार्गदर्शन किया।

धर्मशास्त्रीय महत्व: परमेश्वर की वफादारी और प्रावधान

झोपड़ियों का पर्व मूल रूप से परमेश्वर के अद्भुत प्रावधान (Providence) और अटूट वफादारी (Faithfulness) के प्रति गहरी कृतज्ञता प्रकट करने का समय है। तंबू में निवास करके, इस्राइली भौतिक सुख-सुविधाओं से दूर होकर, उस समय की विनम्र और अस्थाई जीवनशैली को याद करते हैं जब वे पूरी तरह से परमेश्वर पर निर्भर थे। यह उन्हें सिखाता है कि उनका सच्चा घर स्वर्ग में है और यह सांसारिक जीवन एक अस्थायी पड़ाव मात्र है। यह पर्व उनकी आने वाली पीढ़ियों को भी यह स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर ने उन्हें कैसे संभाला और विपत्ति में भी उनका मार्गदर्शन किया।

यह पर्व न केवल अतीत को याद करने का पर्व है, बल्कि यह भविष्य की आशा को भी व्यक्त करता है—मसीहाई युग की आशा जब परमेश्वर का राज्य पूरी पृथ्वी पर स्थापित होगा और सभी राष्ट्र परमेश्वर की उपस्थिति में आनंद मनाएँगे। इस प्रकार, सुककोत इतिहास, वर्तमान की कृतज्ञता और भविष्य की आशा का एक सुंदर संगम है।

झोपड़ियों का पर्व का इतिहास और विधान

झोपड़ियों का पर्व (सुककोत): परमेश्वर के अनुग्रह और प्रावधान का स्मरणोत्सव

मुख्य शास्त्रपद: निर्गमन 23:16; 34:22; लैव्यव्यवस्था 23:33-44; गिनती 29; व्यवस्थाविवरण 16:13-15; नहेमायाह 8:12-18

झोपड़ियों का पर्व, जिसे इब्रानी भाषा में ‘सुककोत’ (Sukkot – “झोपड़ियों”) कहा जाता है, यहूदी कैलेंडर के सबसे महत्वपूर्ण और हर्षोल्लास भरे पर्वों में से एक है। यह सातवें महीने (तिशरी) के 15वें दिन से शुरू होता था, जो आमतौर पर सितंबर के अंत या अक्टूबर की शुरुआत में पड़ता है। 

यह पर्व उस समय मनाया जाता था जब इज़राइल की कृषि वर्ष की अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण कटनी (अंगूर, अंजीर, जैतून, खजूर आदि) पूरी हो चुकी होती थी। परमेश्वर ने इस पर्व को वार्षिक तीन महान तीर्थयात्रा पर्वों (फसह, पिन्तेकुस्त और सुककोत) में से एक के रूप में स्थापित किया था, जहाँ सभी पुरुषों को यरूशलेम में परमेश्वर के सामने उपस्थित होना अनिवार्य था।

झोपड़ियों का पर्व के दोहरे अर्थ: कृषि और इतिहास

सुककोत का पर्व इज़राइलियों के लिए दो गहरे अर्थों को समाहित करता था:

1. कृषि और धन्यवाद का पहलू: आनन्द की ऋतु

सुककोत ‘कटनी के पर्व‘ (Festival of the Ingathering) के रूप में भी जाना जाता था। यह वह समय था जब लोग अपनी मेहनत का फल देख रहे थे।

  • उत्सव का कारण: यह पर्व इज़राइल के लोगों को उनकी वार्षिक खेती की सफलता और परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई भौतिक आशीषों के लिए धन्यवाद देने का अवसर देता था। वे विशेष रूप से गेहूँ, जौ, अंगूर, अनार, जैतून और शहद जैसे ‘उत्तम देश’ की उपज की बहुतायत के लिए परमेश्वर की स्तुति करते थे (व्यवस्थाविवरण 8:8)।
  • अवधि और अर्थ: यह उत्सव रविवार से शनिवार तक पूरे सात दिन तक चलता था। सात की संख्या परमेश्वर के सृष्टि-रचना के सात दिनों की याद दिलाती है, जो इस बात का प्रतीक है कि परमेश्वर ही उनके जीवन और सृष्टि का एकमात्र स्रोत है। यह पर्व इतना आनन्ददायक होता था कि इसे केवल ‘पर्व’ (The Feast) के नाम से भी जाना जाता था, क्योंकि इसका आनन्द अन्य सभी पर्वों से बढ़कर होता था।

2. ऐतिहासिक पहलू: जंगल में परमेश्वर का प्रावधान

1झोपड़ियों का पर्व (Sukkot) Feast of Tabernacles
1झोपड़ियों का पर्व (Sukkot) Feast of Tabernacles

झोपड़ियों का पर्व का सबसे अनूठा और यादगार पहलू इसका ऐतिहासिक महत्व था।

  • अस्थाई निवास: परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार, इस्राइलियों को अपने आरामदायक, पक्के घरों को छोड़कर सात दिनों के लिए अस्थाई झोपड़ियों या तम्बुओं में रहना पड़ता था, जिन्हें ‘सुक्का’ (Sukkah) कहा जाता है। ये सुक्का अनिवार्य रूप से ऐसी संरचनाएँ होती थीं जिनकी छत पेड़ों की डालियों या पत्तों से बनी होती थी ताकि अंदर से आसमान और तारे दिखाई दें।
  • स्मरण: यह शारीरिक क्रिया इज़राइलियों को 40 साल की लंबी जंगल यात्रा की याद दिलाने के लिए थी। यह याद दिलाता था कि कैसे उनके पूर्वज मिस्र से निकलने के बाद जंगल में अस्थाई निवासों में रहे थे। सुक्का में रहना एक शक्तिशाली प्रतीक था कि कैसे परमेश्वर ने उन्हें जंगल में भयानक जंगली जानवरों, शत्रु राजाओं और रेगिस्तान की कठोर परिस्थितियों से सुरक्षित रखा और उन्हें भोजन (मन्ना) और पानी प्रदान किया। यह उन्हें सिखाता था कि उनका सच्चा घर स्वर्ग में है और इस पृथ्वी पर वे केवल यात्री हैं।

झोपड़ियों का पर्व की प्रमुख धार्मिक विशेषताएँ और अनुष्ठान

सुककोत के दौरान कई विशिष्ट अनुष्ठान किए जाते थे जो इसकी पवित्रता और महत्त्व को दर्शाते हैं:

  • जल उण्डेलने का अनुष्ठान (Simchat Bet HaSho’evah): हालांकि इसका उल्लेख मूसा की व्यवस्था में नहीं है, लेकिन मंदिर काल में यह एक केंद्रीय अनुष्ठान बन गया था। महायाजक शिलोह के कुंड से जल भरकर सोने के पात्र में लाता था और वेदी पर उण्डेलता था। इस अनुष्ठान को बड़े हर्ष और संगीत के साथ मनाया जाता था। यह आने वाले समय के लिए ‘प्रचुर वर्षा’ की प्रार्थना का प्रतीक था, और बाद में, मसीही संदर्भ में, इसे पवित्र आत्मा के उण्डेलने (यूहन्ना 7:37-38) की भविष्यवाणी के रूप में देखा गया।
  • चार प्रकार की उपज (The Four Species – Arba Minim): इस पर्व के दौरान इज़राइली चार विशिष्ट प्रकार की पौधों की उपज (खजूर की डालियाँ – लूलावी, विलो की डालियाँ – अरावोत, मर्टल की डालियाँ – हदासिम, और एक नींबू जैसा फल – इट्रोग) को एक साथ पकड़कर हिलाते थे। यह कार्य चारों दिशाओं में और ऊपर-नीचे करके परमेश्वर की स्तुति को दर्शाता था और उस देश की विविधतापूर्ण उपज के लिए धन्यवाद प्रकट करता था।
  • बलिदान की बहुतायत: गिनती 29:12-38 में इस पर्व पर विशेष और बहुमूल्य बलिदानों की माँग की गई है। आठ दिनों के दौरान कुल 71 बछड़ों का बलिदान चढ़ाया जाता था (पहले दिन 13 से शुरू होकर प्रतिदिन एक बछड़ा कम होता जाता था)। ये बलिदान परमेश्वर के साथ एक अत्यंत पवित्र, गंभीर और गहन संगति का समय स्थापित करते थे।

झोपड़ियों का पर्व का अंत और पुनरुद्धार

पर्व का आठवां दिन, जिसे ‘शमिनी अत्ज़ेरेट’ (Shemini Atzeret) कहा जाता है, मुख्य झोपड़ियों का पर्व से अलग और पवित्र ठहराव का दिन माना जाता था। यह परमेश्वर के साथ विशेष व्यक्तिगत संगति का दिन होता था।

  • ऐतिहासिक पुनरुद्धार: बेबीलोन की गुलामी से लौटने के बाद, एज्रा और नहेमायाह के समय में, इज़राइल ने लगभग 700 वर्षों के अंतराल के बाद इस पर्व को बड़े हर्षोल्लास के साथ पुनः मनाया। नहेमायाह 8:17 कहता है कि, “निश्चय, नून के पुत्र यहोशू के दिनों से उस दिन तक इस्राएलियों ने ऐसा नहीं किया था।” यह पर्व उनके आत्मिक पुनरुद्धार, व्यवस्था के प्रति आज्ञाकारिता और परमेश्वर के साथ वाचा के नवीनीकरण का एक शक्तिशाली प्रतीक था।

झोपड़ियों का पर्व परमेश्वर की विश्वासयोग्यता का शाश्वत स्मरण है—वह जिसने जंगल में अपने लोगों को पाला-पोसा, उन्हें आशीष दी, और उन्हें उनके वायदे के देश में ले आया। यह अतीत के प्रावधान के लिए धन्यवाद, वर्तमान के आनन्द का उत्सव और भविष्य की महिमापूर्ण आशा का पर्व है।


झोपड़ियों का पर्व और यीशु मसीह का संबंध

झोपड़ियों का पर्व (पर्व-ए-सुक़्क़ोत/तम्बूओं का पर्व) और प्रभुयीशु मसीह के बीच एक गहरा और अर्थपूर्ण आत्मिक संबंध है, जिसकी नींव हमें यूहन्ना के सुसमाचार में स्पष्ट रूप से मिलती है। यह पर्व, जो इस्राएल के लोगों के जंगल में 40 वर्षों के भटकाव और परमेश्वर द्वारा उनकी देखभाल की याद दिलाता है, यीशु मसीह में अपनी अंतिम पूर्ति पाता है।

1. परमेश्वर का डेरा (परमेश्वर का हमारे बीच वास)

मूल आधार: यूहन्ना 1:14 में एक गहन धर्मशास्त्रीय सत्य निहित है: “और वचन देहधारी हुआ और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया।”

विस्तार: यहाँ जिस यूनानी शब्द का अनुवाद ‘डेरा किया’ गया है, वह है स्केनोओ (skenoo), जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘तंबू लगाना’ या ‘झोपड़ी डालना’। यह शब्द सीधे तौर पर झोपड़ियों का पर्व (पर्व-ए-सुक़्क़ोत) से जुड़ा है, जहाँ लोग सात दिनों के लिए अस्थाई झोपड़ियों (सुक़्क़ोत) में रहते थे। यह उस तम्बू-ए-मिलाप (Tabernacle) की याद दिलाता है, जिसे परमेश्वर ने जंगल में इस्राएलियों के बीच अपना वासस्थान बनाया था।

यीशु मसीह के देहधारी होने का अर्थ था कि परमेश्वर ने एक बार फिर – लेकिन इस बार एक मानवीय रूप में – अपने लोगों के बीच अपना ‘तंबू’ गाड़ दिया। यीशु केवल एक पैगंबर या शिक्षक नहीं थे; वह स्वयं ‘वचन’ थे जो भौतिक शरीर में आए। वह मानव जाति के साथ परमेश्वर की उपस्थिति (शकीनाह) का चरमोत्कर्ष थे, जो अब ईंट-पत्थर के मंदिर में नहीं, बल्कि यीशु के व्यक्ति में वास करती थी।

2. जीवन का जल (पवित्र आत्मा का अभिषेक)

मूल आधार: झोपड़ियों का पर्व की विशेष रस्मों में, मंदिर के याजक रोज़ शिलोह के कुंड से पानी लाकर वेदी पर उंडेलते थे। यह जंगल में चट्टान से पानी निकलने और भविष्य में मसीहा द्वारा जल के आशीर्वाद की ओर संकेत करता था।

विस्तार: यूहन्ना अध्याय 7 में, जब झोपड़ियों का पर्व अपनी चरम सीमा पर था (सातवें दिन, जिसे ‘महान दिन’ भी कहा जाता था), यीशु मसीह ने मंदिर में खड़े होकर पुकार कर कहा: “यदि कोई प्यासा हो, तो मेरे पास आकर पीए। जो मुझ पर विश्वास करता है, जैसा पवित्रशास्त्र में आया है, उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी।” (यूहन्ना 7:37-38)

यीशु ने स्वयं को उस आध्यात्मिक जल का सोता घोषित किया जिसकी ओर पर्व की रस्में इशारा कर रही थीं। जंगल में, परमेश्वर ने चमत्कारी ढंग से चट्टान से पानी निकालकर इस्राएल की प्यास बुझाई थी (निर्गमन 17:6)। यीशु ने यह दावा किया कि वह स्वयं वह आध्यात्मिक ‘चट्टान’ हैं (जैसा कि पौलुस 1 कुरिन्थियों 10:4 में पुष्टि करता है) और वह ‘जल’ भी हैं जो आत्मा की अनंत प्यास को बुझाते हैं। यूहन्ना आगे स्पष्ट करता है कि यह “जीवन का जल” वास्तव में पवित्र आत्मा था, जो यीशु के महिमावान होने के बाद विश्वासियों को मिलना था। इस प्रकार, पर्व का अस्थायी जल मसीह के माध्यम से मिलने वाले स्थायी आत्मिक जीवन में बदल गया।

3. अस्थाई शरीर बनाम स्थाई महिमा (पुनरुत्थान की आशा)

मूल आधार: झोपड़ियों का पर्व (सुक़्क़ाह) स्वयं एक अस्थाई वास का प्रतीक है, जो इस जीवन की क्षणभंगुरता को दर्शाता है।

विस्तार: प्रेरित पौलुस इस प्रतीकात्मकता को मसीही धर्मशास्त्र में आगे बढ़ाता है। वह हमारे वर्तमान भौतिक शरीर को एक अस्थाई ‘डेरा’ या ‘तंबू’ (2 कुरिन्थियों 5:1) मानता है। जिस तरह झोपड़ी कुछ दिनों बाद हटा दी जाती है, उसी तरह हमारा यह पार्थिव शरीर भी नश्वर और क्षणभंगुर है। यह जीवन, झोपड़ियों का पर्व की तरह, केवल एक पड़ाव है।

परंतु, यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कारण, हमें एक महान और स्थायी आशा प्राप्त हुई है। पौलुस कहता है कि जब यह सांसारिक ‘तंबू’ नष्ट हो जाएगा, तो हमें “स्वर्ग से एक घर” मिलेगा (2 कुरिन्थियों 5:2)। यह एक स्थायी, अविनाशी, पवित्र और महिमावान शरीर होगा। झोपड़ियों का पर्व की अस्थाई प्रकृति हमें यह याद दिलाती है कि हमारा अंतिम और स्थायी निवास स्वर्गीय है, जहाँ हम हमेशा के लिए अपने प्रभु के साथ वास करेंगे। इस प्रकार, मसीह झोपड़ियों का पर्व के अस्थाईपन को अनंत महिमा की स्थायी वास्तविकता में बदल देते हैं।


झोपड़ियों का पर्व का भविष्यपरक पहलू

इस पर्व का एक गहरा और भविष्यसूचक अर्थ भी निहित है। व्यवस्थाविवरण और लैव्यव्यवस्था 23:33-43 में दिए गए इस पर्व के आरंभिक संकेत, परमेश्वर के लोगों के साथ जंगल में अस्थायी निवास और अंत में प्रतिज्ञा किए हुए विश्राम में प्रवेश करने की याद दिलाते हैं। हालाँकि, इसकी पूर्ण आध्यात्मिक और भौतिक पूर्णता प्रकाशितवाक्य 20 और 21 में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

ये अध्याय परमेश्वर के अंतिम और शाश्वत राज्य की स्थापना का वर्णन करते हैं, जिसे “नए स्वर्ग और नई पृथ्वी” के रूप में जाना जाता है। प्रकाशितवाक्य 21:3 में यह भविष्यवाणी की गई है: “देखो, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच है; वह उनके साथ डेरा डालेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्वर होगा।”

यह “झोपड़ियों का पर्व” (सुक्कोत) के अंतिम और पूर्ण सत्य को दर्शाता है। आने वाले युग में, जब मसीह अपनी महिमा में लौटेंगे और अपने राज्य को पृथ्वी पर पूरी तरह और शाश्वत रूप से स्थापित करेंगे, तब यह पर्व आत्मिक और वास्तविक दोनों रूपों में पूर्णता को प्राप्त करेगा।

इस महिमापूर्ण समय में:

  1. परमेश्वर का वास्तविक डेरा डालना: परमेश्वर अपने लोगों के बीच ‘डेरा डालेंगे’ (तम्बू लगाएंगे)। यह केवल एक प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं होगी, बल्कि एक वास्तविक, अंतरंग और स्थायी संगति होगी। परमेश्वर की उपस्थिति से पृथ्वी आलोकित होगी।
  2. संपूर्ण सृष्टि पर प्रभुत्व: संपूर्ण सृष्टि अपने मूल और निर्दोष स्वरूप में बहाल हो जाएगी। सभी चीज़ें परमेश्वर के अधीन होंगी, और उनका संप्रभु शासन निर्विवाद रूप से स्थापित होगा।
  3. दुख और मृत्यु का अंत: प्रकाशितवाक्य 21:4 के अनुसार, “वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद न मृत्यु रहेगी, न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; क्योंकि पहली बातें जाती रहीं।” यह परमेश्वर के वास्तविक और परिपूर्ण राज्य की स्थापना का परिणाम होगा, जहाँ पाप और उसके सभी परिणाम समाप्त हो जाएंगे।

इस प्रकार, यह पर्व इस बात का पूर्वाभास देता है कि परमेश्वर का अंतिम उद्देश्य क्या है: मनुष्यों के साथ अपने स्वर्गीय निवास को साझा करना, जहाँ संपूर्ण मानवता और सृष्टि एक शाश्वत विश्राम और आनंद में उनकी महिमा में वास करेंगे।

1झोपड़ियों का पर्व (Sukkot) Feast of Tabernacles
1झोपड़ियों का पर्व (Sukkot) Feast of Tabernacles

निष्कर्ष

झोपड़ियों का पर्व (Festival of Tabernacles/Sukkot) न केवल एक ऐतिहासिक स्मरणोत्सव है, बल्कि यह गहन आत्मिक सत्य और भविष्य की आशा को भी समाहित करता है। यह पर्व हमें मुख्य रूप से यह अटल विश्वास सिखाता है कि हमारा परमेश्वर, यहोवा, अपने लोगों की आवश्यकताओं और सुरक्षा का सदैव ध्यान रखता है और उनका प्रबन्ध करता है।

पुराने नियम में एक परछाईं:

पुराने नियम में, यह पर्व इस्राएलियों के रेगिस्तानी सफर की याद दिलाता था, जहाँ परमेश्वर ने उन्हें बादलों के खंभे में दिन में और आग के खंभे में रात में मार्गदर्शन दिया और उन्हें झोपड़ियों में निवास करने की आज्ञा दी। ये झोपड़ियाँ (या निवास स्थान) परमेश्वर की उपस्थिति (शकीना) का एक दृश्यमान प्रतीक थीं, जो उनके बीच वास करती थी। इस प्रकार, यह पर्व आने वाले उस महान सत्य की एक परछाईं या पूर्व-चित्रण था: कि परमेश्वर एक दिन अपने लोगों के भीतर और उनके साथ हमेशा के लिए वास करेगा।

नए नियम में पवित्र आत्मा का निवास:

आज, उस परछाईं का सार नए नियम में पूरा हो गया है। परमेश्वर ने हमें अपने आप से अलग नहीं छोड़ा है, बल्कि उसने हमें अपना पवित्र आत्मा दिया है। पवित्र आत्मा स्वयं परमेश्वर की उपस्थिति है जो विश्वासियों के जीवन में निवास करती है। यह निवास केवल एक भावनात्मक अनुभव नहीं है, बल्कि एक वास्तविक सामर्थ्य और मार्गदर्शन का स्रोत है:

  1. हर पहलू में मदद: पवित्र आत्मा हमारे जीवन के हर पहलू—हमारी कमजोरियों, हमारी प्रार्थनाओं, हमारे निर्णयों, और हमारे आत्मिक संघर्षों में—हमारी मदद करता है, हमें सांत्वना देता है और हमें मसीह के स्वरूप में बदलता है।
  2. परमेश्वर के राज्य की तैयारी: पवित्र आत्मा हमें वह सामर्थ्य देता है जिसकी हमें परमेश्वर के राज्य की बढ़ोत्तरी के लिए आवश्यकता है। यह हमें सुसमाचार सुनाने, सेवा करने और एक पवित्र जीवन जीने के लिए तैयार करता है, ताकि हम उस महान राजा के आगमन के लिए एक योग्य प्रजा बन सकें।

अनंत राज्य की आशा:

इन सबसे बढ़कर, झोपड़ियों का पर्व हमें एक गौरवशाली भविष्य की ओर इंगित करता है। यह हमें उस दिन की याद दिलाता है जब हमारा उद्धारकर्ता यीशु मसीह वापस आएगा और हम सदा के लिए उसके अनंत और सिद्ध राज्य में निवास करेंगे। 

प्रकाशितवाक्य की पुस्तक इस अंतिम वास्तविकता को दर्शाती है, जहाँ यह कहा गया है कि “देखो, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच है; वह उनके साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्वर होगा।” (प्रकाशितवाक्य 21:3)।

इस प्रकार, यह पर्व एक शक्तिशाली अनुस्मारक है कि हमारा वर्तमान मार्गदर्शन, ऐतिहासिक विश्वासयोग्यता, और भविष्य की महिमा—ये सब परमेश्वर के अपने लोगों के साथ निवास करने की इच्छा में निहित हैं।


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