करुणा से भरा Mark 1:41

दिन 10: करुणा से भरा हुआ—एक चंगा करने वाली छुअन

करुणा से भरा Mark 1:41

कल हमने ‘पापियों के मित्र’ के रूप में यीशु के अद्भुत अनुग्रह को देखा। आज हम उनके हृदय की उस कोमलता पर गौर करेंगे जो केवल हमारे पापों को ही नहीं, बल्कि हमारी शारीरिक और भावनात्मक पीड़ा को देखकर भी द्रवित हो जाती है।

यीशु के जीवन में ‘करुणा’ केवल एक भावना नहीं थी, बल्कि यह हमेशा एक शक्तिशाली ‘कार्य’ में बदल जाती थी।

मरकुस के सुसमाचार में एक कोढ़ी (leper) की कहानी आती है, जिसे उस समय समाज से पूरी तरह बहिष्कृत कर दिया गया था। जब उसने यीशु से मदद माँगी, तो यीशु की प्रतिक्रिया यह थी:

“उसने तरस खाकर (करुणा से भरकर) हाथ बढ़ाया, और उसे छूकर कहा, ‘मैं चाहता हूँ, तू शुद्ध हो जा’।” (मरकुस 1:41)


1. “तरस खाकर” (Moved with Compassion)

यहाँ मूल यूनानी शब्द का अर्थ है—”आँतों तक हिल जाना।” यह एक बहुत ही गहरी और तीव्र भावना है।

  • दुख में भागीदारी: यीशु हमारे दुखों को केवल दूर से नहीं देखते; वे उन्हें अपने भीतर महसूस करते हैं। जब वे आपको दर्द में देखते हैं, तो उनका हृदय आपके लिए व्याकुल हो जाता है।
  • अवरोधों को तोड़ना: उस समय कोढ़ी को छूना धार्मिक रूप से अशुद्ध माना जाता था, लेकिन यीशु की करुणा किसी भी नियम या परंपरा से बड़ी थी।

2. “हाथ बढ़ाया और उसे छुआ” (The Power of Touch)

यीशु चाहते तो केवल एक शब्द बोलकर भी उसे चंगा कर सकते थे। लेकिन उन्होंने उसे छुआ।

  • अकेलेपन का अंत: उस कोढ़ी को वर्षों से किसी ने नहीं छुआ होगा। यीशु की छुअन ने न केवल उसके शरीर को, बल्कि उसकी आत्मा और उसके अकेलेपन को भी चंगा कर दिया।
  • स्वीकृति: छूने का अर्थ था, “मैं तुझे स्वीकार करता हूँ, तू अब त्यागा हुआ नहीं है।”

3. “मैं चाहता हूँ” (The Will of Christ)

यीशु की करुणा हमेशा हमारी भलाई चाहती है।

  • इच्छा और सामर्थ्य: यीशु के पास केवल चंगा करने की ‘शक्ति’ ही नहीं, बल्कि चंगा करने की ‘इच्छा’ (Will) भी है। वे चाहते हैं कि आप बंधनों से मुक्त हों और एक भरपूरी का जीवन जीएं।

4. इसका आपके जीवन के लिए क्या अर्थ है?

  1. वह आपके करीब है: जब आप बीमार, उदास या टूटे हुए होते हैं, तो याद रखें कि यीशु आपके प्रति करुणा से भरा हुआ है। वह आपके आँसुओं को अनदेखा नहीं करता।
  2. प्रार्थना में भरोसा: हम एक ऐसे परमेश्वर के पास प्रार्थना करते हैं जो “हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके ऐसा नहीं” (इब्रानियों 4:15)। वह आपकी पीड़ा को समझता है।
  3. करुणा का वाहक बनना: यदि हमारे प्रभु का हृदय करुणा से भरा है, तो हमें भी दूसरों के दर्द के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। क्या हम किसी के दुख को देखकर केवल दुखी होते हैं या अपना हाथ बढ़ाकर उनकी मदद भी करते हैं?

निष्कर्ष

यीशु मसीह ‘करुणा से भरे हुए’ हैं, इसका अर्थ है कि आप कभी भी अपने दुखों में अकेले नहीं हैं। उनकी छुअन आज भी उपलब्ध है। चाहे आपका घाव शारीरिक हो या आत्मिक, वह ‘महान वैद्य’ अपना हाथ बढ़ाकर आपको चंगा करना चाहता है।


आज के लिए मनन और प्रार्थना

आज अपनी किसी ऐसी चोट या दर्द के बारे में सोचें जो आपको वर्षों से परेशान कर रही है। विश्वास करें कि यीशु का करुणा भरा हाथ आज भी आपकी ओर बढ़ा हुआ है।

प्रार्थना:

“हे प्रभु यीशु, तेरी उस अपार करुणा के लिए तेरा धन्यवाद जो तूने मेरे प्रति दिखाई है। प्रभु, जब मैं अपनी मुश्किलों में घिर जाता हूँ, तो मुझे याद दिला कि तेरा हृदय मेरे लिए द्रवित होता है। मुझे अपनी चंगा करने वाली छुअन का अनुभव करा। मुझे भी ऐसा हृदय दे कि मैं दूसरों के दुखों को देखकर अपना हाथ बढ़ा सकूँ और तेरी करुणा का गवाह बन सकूँ। आमीन।”

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