दिन 11: प्रार्थनापूर्ण जीवन—पिता के साथ अटूट संबंध

प्रार्थनापूर्ण जीवन Prayer life of Jesus

 कल हमने यीशु की ‘करुणा’ के बारे में सीखा कि कैसे वे हमारे दुखों से द्रवित होते हैं। आज हम उनके जीवन के उस गुप्त स्रोत पर गौर करेंगे जहाँ से उन्हें यह सारी करुणा और सामर्थ्य प्राप्त होती थी—उनका प्रार्थनापूर्ण जीवन। यीशु, जो स्वयं परमेश्वर के पुत्र थे, उन्होंने इस पृथ्वी पर रहते हुए … Read more

दिन 10: करुणा से भरा हुआ—एक चंगा करने वाली छुअन

करुणा से भरा Mark 1:41

कल हमने ‘पापियों के मित्र’ के रूप में यीशु के अद्भुत अनुग्रह को देखा। आज हम उनके हृदय की उस कोमलता पर गौर करेंगे जो केवल हमारे पापों को ही नहीं, बल्कि हमारी शारीरिक और भावनात्मक पीड़ा को देखकर भी द्रवित हो जाती है। यीशु के जीवन में ‘करुणा’ केवल एक भावना नहीं थी, बल्कि … Read more

दिन 9: पापियों का मित्र—अदभुत अनुग्रह का हाथ

पापियों का मित्र Matthew 11:19

मसीह पर केंद्रित हमारी यात्रा के नौवें दिन में आपका स्वागत है। कल हमने यीशु की नम्रता और उनके कोमल हृदय के बारे में सीखा। आज हम उनके स्वभाव के एक ऐसे पहलू पर गौर करेंगे जिसने उनके समय के धार्मिक नेताओं को हैरान और परेशान कर दिया था, लेकिन हमारे लिए वह ‘अतुलनीय अनुग्रह’ … Read more

दिन 8: नम्र और मन में दीन—विश्राम देने वाला हृदय

नम्र और मन में दीन matthew 11:29

अक्सर शक्तिशाली लोग कठोर होते हैं, लेकिन ब्रह्मांड का स्वामी, जिसके हाथ में सारा अधिकार है, अद्भुत रूप से कोमल है। आज हम उस निमंत्रण पर गौर करेंगे जो थके हुए हृदयों के लिए मरहम की तरह है। यीशु ने अपने पीछे चलने वालों को यह अनोखा आश्वासन दिया: “मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, … Read more

दिन 7: वह जो ‘मैं हूँ’ है—अपरिवर्तनीय परमेश्वर

जो 'मैं हूँ' है John 8:58

मसीह पर केंद्रित हमारी यात्रा के पहले सप्ताह के अंतिम दिन में आपका स्वागत है। अब तक हमने यीशु को वचन, ज्योति, चरवाहा और मेमने के रूप में देखा। आज हम उस शिखर पर पहुँच गए हैं जहाँ यीशु ने अपनी पहचान के बारे में सबसे शक्तिशाली और चौंकाने वाला दावा किया। यह दावा इतना … Read more

दिन 5: अल्फा और ओमेगा—आदि और अंत की संप्रभुता

अल्फा और ओमेगा Revelation 22:13

मसीह पर केंद्रित हमारी यात्रा के पांचवें दिन में आपका स्वागत है। कल हमने यीशु को एक ‘अच्छे चरवाहे’ के रूप में देखा, जो हमारी व्यक्तिगत देखभाल करता है। आज हम अपनी दृष्टि को थोड़ा और ऊपर उठाएंगे और यीशु के उस स्वरूप को देखेंगे जो समय और सृष्टि की सीमाओं से परे है—अल्फा और … Read more

दिन 4: अच्छा चरवाहा—प्रेम और सुरक्षा का बलिदान

अच्छा चरवाहा John 10:11

मसीह पर केंद्रित हमारी यात्रा के चौथे दिन में आपका स्वागत है। कल हमने देखा कि कैसे यीशु ‘जगत की ज्योति’ बनकर हमारे जीवन के अंधकार को दूर करता है। आज हम यीशु के एक बहुत ही कोमल और सुरक्षा देने वाले रूप पर विचार करेंगे—अच्छा चरवाहा। पुराने समय में, एक चरवाहा अपनी भेड़ों के … Read more

दिन 3: जगत की ज्योति—अंधकार पर विजय

जगत की ज्योति john 8:12

मसीह पर केंद्रित हमारी यात्रा के तीसरे दिन में आपका स्वागत है। पहले दो दिनों में हमने यीशु को अनादि ‘वचन’ और एकमात्र ‘मार्ग’ के रूप में देखा। आज हम उस गुण पर गौर करेंगे जो हमारी दिशा और दृष्टि को बदल देता है—ज्योति। अंधेरे में चलना डरावना और अनिश्चित होता है, लेकिन जब प्रकाश … Read more

दिन 2: मार्ग, सत्य और जीवन—एकमात्र द्वार

मार्ग, सत्य और जीवन John 14:6 Explain in hindi

मसीह पर केंद्रित हमारी यात्रा के दूसरे दिन में आपका स्वागत है। कल हमने जाना कि यीशु अनादि ‘वचन’ और स्वयं परमेश्वर है। आज हम उस सुस्पष्ट और क्रांतिकारी दावे पर गौर करेंगे जो यीशु ने खुद के बारे में किया। संसार में बहुत से लोग ईश्वर तक पहुँचने के अलग-अलग ‘रास्तों’ की बात करते … Read more

दिन 1: आदि में वचन—यीशु की दिव्यता

आदि में वचन

हम अपनी शुरुआत समय की शुरुआत से भी पहले से करेंगे। यीशु केवल 2000 साल पहले पैदा हुआ एक महापुरुष नहीं था, बल्कि वह अनादि काल से अस्तित्व में है। यूहन्ना का सुसमाचार हमें यीशु के जन्म की कहानी से नहीं, बल्कि उसकी अनंत प्रकृति से परिचित कराता है: “आदि में वचन था, और वचन … Read more