आज हम उस चमत्कारी शक्ति को देखेंगे जिससे यह संपूर्ण ब्रह्मांड अस्तित्व में आया।

बाइबल हमें बताती है कि परमेश्वर ने संसार बनाने के लिए किसी औजार या सामग्री का उपयोग नहीं किया, बल्कि उसने केवल कहा, और सब कुछ हो गया।

भजनकार परमेश्वर की सृजन शक्ति का वर्णन इन गहरे शब्दों में करता है:

“आकाश मण्डल यहोवा के वचन से, और उसके सारे तारागण उसके मुँह की श्वास से बने।” (भजन संहिता 33:6)

1. “यहोवा के वचन से” (By the Word of the LORD)

उत्पत्ति के पहले अध्याय में हम बार-बार एक वाक्यांश पढ़ते हैं: “परमेश्वर ने कहा…”

2. “मुँह की श्वास” (The Breath of His Mouth)

यहाँ ‘श्वास’ (Breath) शब्द का संबंध फिर से पवित्र आत्मा से है।

3. व्यवस्था और स्थिरता

परमेश्वर ने न केवल वचन से दुनिया बनाई, बल्कि वह आज भी अपने सामर्थ्य के वचन से सब कुछ थामे हुए है (इब्रानियों 1:3)।

4. इसका आपके जीवन के लिए क्या अर्थ है?

  1. शून्य में सृजन: क्या आपका जीवन आज खालीपन (Void) या अंधकार जैसा महसूस हो रहा है? वही परमेश्वर जिसने शून्य से ब्रह्मांड रचा, वह अपने वचन से आपके जीवन में नई चीज़ें पैदा कर सकता है। वह ‘मरे हुए’ सपनों और परिस्थितियों में फिर से जान फूँक सकता है।
  2. वचन पर भरोसा: जब आप बाइबल के किसी वादे को पढ़ते हैं, तो याद रखें कि यह वही शब्द है जिसने आकाश मंडल को बनाया। यदि वह आकाश को थाम सकता है, तो वह आपके जीवन के वादों को भी पूरा कर सकता है।
  3. हमारे शब्दों का मूल्य: चूँकि हम परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए हैं, हमारे शब्दों में भी ‘बनाने’ या ‘बिगाड़ने’ की शक्ति होती है। हमें अपने मुख से ऐसे शब्द बोलने चाहिए जो जीवन और निर्माण लेकर आएं।

निष्कर्ष

परमेश्वर का वचन केवल सूचना (Information) नहीं है, यह रचनात्मक शक्ति (Creative Power) है। जिस परमेश्वर ने अरबों तारागणों को केवल अपनी श्वास से रच दिया, उसके लिए आपकी समस्या का समाधान करना असंभव नहीं है। आज उसके रचनात्मक वचन को अपने जीवन की परिस्थितियों पर बोलने दें।

आज के लिए मनन और प्रार्थना

आज उत्पत्ति 1:1-3 और यूहन्ना 1:1-3 को एक साथ पढ़ें। देखें कि कैसे “वचन” ही सृष्टि का मूल आधार है।

प्रार्थना:

“हे महान सृष्टिकर्ता परमेश्वर, मैं तेरी अद्भुत सामर्थ्य के सामने झुकता हूँ। तेरा वचन कितना शक्तिशाली है कि उसने आकाश और पृथ्वी को जन्म दिया! प्रभु, मेरे जीवन के उन क्षेत्रों में जहाँ आज अंधकार या शून्यता है, तू अपना रचनात्मक वचन बोल। मेरे भीतर एक नया हृदय और एक नया उत्साह पैदा कर। मुझे सिखा कि मैं तेरे सामर्थ्य के वचन पर वैसा ही भरोसा करूँ जैसा तारागण करते हैं। आमीन।”

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